जामिया में रहीम पर एक दिवसीय संगोष्ठी, विद्वानों की शिरकत

 प्रो. इक़्तेदार मोहम्मद ख़ान ने कहा कि “रहीम भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, किंतु आधुनिक वर्गीकृत समाज में हम उन्हें ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं।” उन्होंने बताया कि “रहीम की बहुमुखी प्रतिभा, विविध भाषाओं पर अधिकार और उनकी साहित्यिक विशिष्टता उन्हें अद्वितीय बनाती है। उनके काव्य में तसव्वुफ की गहरी छाप दिखाई देती है।”

Share This Article:

नई दिल्ली: जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा “हमारा समय और रहीम” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों ने इस विषय पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. नीरज कुमार ने आज के समय में रहीम की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उनके पुनर्पाठ पर बल दिया। इसके बाद भाषा एवं मानविकी संकाय के डीन प्रो. इक्तेदान मोहम्मद खान ने कहा कि रहीम भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, किंतु आधुनिक वर्गीकृत समाज में हम उन्हें ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रहीम की बहुमुखी प्रतिभा, विविध भाषाओं पर अधिकार और उनकी साहित्यिक विशिष्टता उन्हें अद्वितीय बनाती है। उनके काव्य में तसव्वुफ की गहरी छाप दिखाई देती है।

इसी क्रम में संगोष्ठी के मुख्य अतिथि कुलसचिव प्रो. मोमहताब आलम रिज़वी ने कहा कि रहीम केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि वह एक निपुण कूटनीतिज्ञ थे। अकबर के काल में उन्होंने कूटनीति द्वारा अनेक विद्रोहों को भी विफल किया। उनके दोहे आज भी व्यावहारिक जीवन की प्रेरणा हैं और 450 वर्ष पूर्व कहे गए उनके विचार आज अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ ने कहा कि रहीम को समझने के लिए तीन तत्वों- उनके काल, इस्लाम और भारतीयता का अध्ययन आवश्यक है। रहीम जैसे चिंतक केवल भारत में ही संभव थे। वे अपनी संवेदना में हमसे सौ वर्ष आगे है और हम आज भी उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। उनका काव्य समय का आईना है, जो युगों-युगांतर के सत्य को उद्घाटित करता है।

कार्यक्रम के संयोजक प्रो. चंद्रदेव यादव ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा की तथा कुलपति इस संगोष्ठी के आयोजन हेतु सभी प्रकार के सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

कार्यक्रम के पहले सत्र सामाजिक परिवेश और रहीम में हिंदी विभाग, जामिया के प्रो. दिलीप शाक्य  ने कहा कि रहीम की कविता मानवीय गरिमा का महाकाव्य है। रीतिकाल में महाकाव्य न होने की जो शिकायत की जाती है, उसके अनेक रंग रहीम की कविता में मिलते हैं। प्रो. अजय बिसारिया (हिंदी विभाग, ए.एम.यू.) ने रहीम के जीवन और रचनाओं में निहित साझा संस्कृति पर जोर देते हुए कहा कि रहीम पहली पीढ़ी के भारतीय थे और उनके सूक्ष्म अवलोकन उनकी कविता में स्पष्ट झलकते हैं।

सत्र के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय (डीन, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि वे कक्षा तीन से रहीम को पढ़ते आए हैं और उनकी कविता में संसार का गहन अनुभव मिलता है। रहीम भक्तिकाल में जन्म लेते हैं, किंतु रीतिकाल में लेखन करते हैं। वे सांप्रदायिकता के विरुद्ध खड़े होते हैं और कबीर की परंपरा से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने रहीम के दोहे- “चित्रकूट में रमि रहे, ‘रहिमन’ अवध-नरेस। जा पर बिपदा परत है, सो आवत यहि देस।” का उल्लेख करते हुए कहा कि रहीम के राम जुल्म और वंचना के शिकार लोगों के साथ खड़े होने वाले राम हैं। रहीम 5000 के मनसबदार थे और उन्होंने गरीबों-मजलूमों पर उदारतापूर्वक धन लुटाया। उनकी कविता प्रेम और समर्पण का स्तोत्र है तथा गंगा-जमुनी संस्कृति की वाहिका भी। सत्र का संचालन डॉ. आसिफ़ उमर ने की।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र साझी संस्कृति और रहीम” के अंतर्गत डॉ. हैदर अली ने रहीम को समझने के लिए ‘आईन-ए-अकबरी’ और ‘तुजुक-ए-बाबरी’ जैसे ऐतिहासिक स्रोतों पर चर्चा की। प्रो. शंभुनाथ तिवारी (ए.एम.यू.) ने कहा कि भारत सांस्कृतिक रूप से एक है- अवतारों की कल्पना उत्तर भारत में हुई और उनके व्याख्याकार दक्षिण भारत में; इसी से संपूर्ण भारत बनता है। रहीम इसी सामासिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि जो कवि परंपरा से अधिक ग्रहण करता है, वही कालजयी होता है। रहीम ने नीति, भक्ति और श्रृंगार- तीन प्रकार के दोहे रचे, जो भर्तृहरि की परंपरा की याद दिलाते हैं। उन्होंने भारत को एक गुलदस्ता बताया, जिसके चार मुख्य रूप- राम, कृष्ण, गंगा और हिमालय- रहीम की कविता में स्पष्ट दिखाई देते हैं। प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्ता (जेएमई) ने कहा कि रहीम मृत्यु के बाद गंगा में विलीन होना चाहते थे; वे ब्रह्म का रूप नहीं, बल्कि शिव की जटा में प्रवाहित गंगा के समीप रहना चाहते थे।

प्रो. वशिष्ठ अनूप द्विवेदी (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) ने रहीम के जीवन को विरोधों का समन्वय बताते हुए कहा कि समूचे भक्तिकाल की तरह रहीम की कविता के केंद्र में भी प्रेम ही है। इस सत्र के अध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अंग्रेज़ी कथन “Everything is political” का उल्लेख करते हुए कहा कि रहीम राजनीति-चिंतन को भलीभांति समझते थे। इसलिए उन्होंने जीवन और कविता दोनों में प्रेम और मानवता को सर्वोपरि रखा। सत्र का संचालन प्रो. रहमान मुसव्विर ने किया।

संगोष्ठी का अंतिम सत्र रीतिनीति और राजनीति” पर केंद्रित था। प्रो. अब्दुल माजिद काज़ी (अरबी विभाग, जेएमई) ने रहीम की फ़ारसी शायरी की ओर हिंदी जगत का ध्यान आकर्षित किया। रहीम की कविता के समग्र मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. सरवदुल हुदा ने रहीम पर हुए उर्दू के महत्वपूर्ण कार्यों से हिंदी जगत को अवगत कराते हुए इनके अनुवाद की आवश्यकता की ओर संकेत किया।

डॉ. मुकेश कुमार मिरोठा ने कहा कि कवि संसार का शिक्षक होता है और रहीम की कविता में इसकी स्पष्टता है। वे तर्क और बुद्धि से संचालित सत्ता के सुसंस्कृत कवि हैं। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. हेमलता महेश्वर ने की। उन्होंने रहीम की कविता में निहित राजनीति और नीति पर चर्चा की तथा उनकी सांकेतिक प्रासंगिकता पर बल दिया। कार्यक्रम का समापन प्रो. कहकशां ए. साद के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन, अतिथिगण, सभी संकाय सदस्य, शोधार्थियों, विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

https://x.com/DjSanjayrai

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.