क्या आपकी दवा सुरक्षित है? 159 दवाइयां टेस्ट में फेल

क्या भारतीय फार्मा सेक्टर मुनाफे के फेर में सुरक्षा को भूल रहा है? जानिए सीडीएससीओ (CDSCO) की इस चौंकाने वाली रिपोर्ट के पीछे का पूरा सच, जिसमें 159 घटिया दवाओं की लिस्ट ने देश में हड़कंप मचा दिया है।

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नई दिल्ली: भारत, जिसे दुनिया भर में ‘विश्व की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) कहा जाता है, इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और गंभीर स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रहा है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ (CDSCO – Central Drugs Standard Control Organization) की हालिया मासिक ड्रग अलर्ट रिपोर्ट ने पूरे देश के चिकित्सा जगत और आम नागरिकों के बीच हड़कंप मचा दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के अलग-अलग राज्यों से लिए गए सैंपल्स में से कुल 159 दवाइयां अपनी गुणवत्ता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाईं और लैब टेस्टिंग के दौरान ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) यानी घटिया और मानक स्तर से कम पाई गई हैं।

यह कोई मामूली तकनीकी खामी नहीं है; यह सीधे तौर पर करोड़ों भारतीयों की जिंदगी से खिलवाड़ का मामला है। जब एक बीमार व्यक्ति डॉक्टर के पर्चे को लेकर मेडिकल स्टोर पर जाता है, तो वह केवल एक गोली या सिरप नहीं खरीदता, बल्कि वह अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की उम्मीद और भरोसा खरीदता है। लेकिन अगर वही दवा खुद ‘बीमार’ हो, तो मरीज की सेहत सुधरने के बजाय और बिगड़ सकती है। आइए इस विस्तृत और खोजी रिपोर्ट में समझते हैं कि आखिर भारतीय दवा उद्योग में यह लापरवाही किस स्तर पर हो रही है, कौन-कौन सी जरूरी दवाइयां इस लिस्ट में शामिल हैं, और एक सजग नागरिक होने के नाते आपको इस खतरे से खुद को कैसे बचाना है।

क्या है सीडीएससीओ (CDSCO) और कैसे होता है दवाओं का यह टेस्ट?

सीडीएससीओ (CDSCO) भारत की मुख्य राष्ट्रीय नियामक संस्था है, जो देश में दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और सौंदर्य प्रसाधनों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावकारिता की निगरानी करती है।

हर महीने, संस्था के ड्रग इंस्पेक्टर (औषधि निरीक्षक) देश भर के विभिन्न अस्पतालों, थोक बाजारों, और रिटेल मेडिकल स्टोर्स से औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) के दौरान दवाओं के रैंडम सैंपल्स इकट्ठा करते हैं। इन सैंपल्स को सरकारी केंद्रीय प्रयोगशालाओं (जैसे कोलकाता, मुंबई, चंडीगढ़ या हैदराबाद की सेंट्रल ड्रग लैब्स) में भेजा जाता है। वहां वैज्ञानिक इन दवाओं की रासायनिक संरचना, घुलनशीलता, शुद्धता और स्टेरिलिटी (कीटाणुरहित होने की स्थिति) की जांच करते हैं।

जब कोई दवा इन कड़े मानकों को पूरा नहीं कर पाती, तो उसे NSQ (Not of Standard Quality) घोषित कर दिया जाता है। इस बार की जांच में एक या दो नहीं, बल्कि पूरी 159 दवाइयां फेल हुई हैं, जो भारतीय फार्मास्युटिकल रेगुलेशन के इतिहास में एक बड़ा और चिंताजनक आंकड़ा है।

कौन-कौन सी दवाइयां हुई हैं फेल?

इस व्यापक लिस्ट में केवल मामूली कफ सिरप या विटामिन की गोलियां शामिल नहीं हैं, बल्कि इनमें ऐसी जीवनरक्षक दवाइयां (Life-saving Drugs) शामिल हैं जिनका इस्तेमाल हर दूसरा भारतीय परिवार रोजमर्रा की जिंदगी में करता है। इन 159 दवाओं को मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों की दवाएं (Cardiovascular Drugs)

दिल के मरीजों और हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) से पीड़ित लोगों के लिए दवा की एक-एक खुराक का सही होना बेहद जरूरी होता है। इस लिस्ट में टेल्मिसार्टन (Telmisartan), एम्लोडिपाइन (Amlodipine) और एटेनोलोल (Atenolol) के कुछ विशेष बैच शामिल हैं। अगर इन दवाओं में एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) यानी मुख्य रासायनिक तत्व की मात्रा कम होगी, तो मरीज का ब्लड प्रेशर अचानक अनियंत्रित हो सकता है, जिससे हार्ट अटैक या ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

डायबिटीज (मधुमेह) नियंत्रण की दवाएं (Anti-Diabetic Medications)

भारत को ‘दुनिया की डायबिटीज राजधानी’ कहा जाता है। देश में करोड़ों लोग हर सुबह मेटफॉर्मिन (Metformin) और ग्लिमेपिरिड (Glimepiride) जैसी गोलियां खाकर अपने ब्लड शुगर को नियंत्रित रखते हैं। इस जांच में इन दवाओं के भी कई बैच मानक स्तर से नीचे पाए गए हैं। इंसुलिन और शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव सीधे मरीज की किडनी और आंखों की रोशनी पर असर डालता है।

एंटीबायोटिक्स और एंटी-इन्फेक्टिव्स (Antibiotics)

संक्रमण से लड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली एमोक्सिसिलिन (Amoxicillin), एज़िथ्रोमाइसिन (Azithromycin) और सेफैलेक्सिन (Cephalexin) जैसी बेहद आम एंटीबायोटिक दवाएं भी क्वालिटी टेस्ट पास नहीं कर पाईं। घटिया एंटीबायोटिक्स का सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि ये बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म नहीं कर पातीं, जिससे शरीर में ‘रोगाणुरोधी प्रतिरोध’ (Antimicrobial Resistance – AMR) विकसित हो जाता है। इसका मतलब है कि भविष्य में उस मरीज पर अच्छी से अच्छी एंटीबायोटिक दवा भी बेअसर हो जाएगी।

दर्द निवारक और गैस की दवाएं (Analgesics & Antacids)

आमतौर पर लोग बिना डॉक्टर की सलाह के (Over the Counter) पैरासिटामोल (Paracetamol), डिक्लोफेनाक (Diclofenac) और पेट की गैस के लिए पैंटोप्राजोल (Pantoprazole) या ओमेप्राजोल (Omeprazole) खरीद लेते हैं। रिपोर्ट में इन रोजमर्रा की दवाओं के कई सैंपल्स में भारी कमियां पाई गई हैं, जैसे कि गोली का पानी में तय समय के भीतर न घुलना।

दवाइयां टेस्ट में फेल क्यों होती हैं? मुख्य कारणों की पड़ताल

कोई भी दवा फैक्ट्री से निकलने के बाद लैब टेस्ट में क्यों फेल हो जाती है? इसके पीछे सिर्फ एक वजह नहीं है, बल्कि यह पूरी विनिर्माण (Manufacturing) और सप्लाई चेन की कमियों को उजागर करता है:

  1. सस्ते और घटिया कच्चे माल (API) का इस्तेमाल: कई दवा कंपनियां अपनी उत्पादन लागत को कम करने और मुनाफा बढ़ाने के लिए घटिया क्वालिटी के एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स का आयात करती हैं या स्थानीय स्तर पर कम कीमत वाले रसायनों का इस्तेमाल करती हैं।
  2. गलत फॉर्मूलेशन और विनिर्माण दोष: फैक्ट्रियों में मिक्सिंग मशीनों के सही तरीके से काम न करने के कारण कभी-कभी एक ही बैच की कुछ गोलियों में दवा की मात्रा बहुत ज्यादा हो जाती है, तो कुछ में बिल्कुल शून्य।
  3. खराब पैकेजिंग और भंडारण (Storage Context): भारत में गर्मियों के दिनों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है। यदि दवाओं की पैकेजिंग अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न हो, या उन्हें बिना एयर-कंडीशनिंग वाले ट्रकों और गोदामों में रखा जाए, तो दवा की रासायनिक संरचना टूट जाती है और वह एक्सपायरी डेट से पहले ही बेअसर या जहरीली हो जाती है।
  4. फर्जी या नकली दवा निर्माताओं का नेटवर्क: इस 159 दवाओं की लिस्ट में कुछ ऐसे सैंपल्स भी हैं, जो नामी कंपनियों के नाम पर बाजार में बेचे जा रहे थे, लेकिन असल में वे अवैध फैक्ट्रियों में बनाए गए नकली (Spurious) प्रॉडक्ट्स थे।

इस संकट का आम जनता और भारतीय स्वास्थ्य तंत्र पर क्या असर होगा?

जब इतनी बड़ी तादाद में दवाइयां बाजार में असुरक्षित पाई जाती हैं, तो इसके परिणाम दूरगामी और विनाशकारी होते हैं:

  • मरीजों का डॉक्टरों और दावों से भरोसा उठना: एक आम नागरिक जब यह सुनता है कि उसकी रोज खाई जाने वाली दवा ही सब-स्टैंडर्ड है, तो वह पूरे एलोपैथिक सिस्टम पर संदेह करने लगता है।
  • इलाज के खर्च में बढ़ोतरी: घटिया दवा खाने से जब मरीज ठीक नहीं होता, तो उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है, जिससे उसका आर्थिक बोझ बढ़ता है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान: भारत दुनिया के 200 से अधिक देशों को जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है। घरेलू बाजार में दवाओं का इस तरह फेल होना वैश्विक स्तर पर हमारी साख को कमजोर करता है।

सरकार और नियामकों ने क्या कदम उठाए हैं?

सीडीएससीओ की रिपोर्ट सामने आने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य दवा नियंत्रण विभागों ने तुरंत एक्शन मोड में काम शुरू कर दिया है:

  • बिक्री पर तत्काल रोक और रिकॉल: सभी राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि इन 159 दवाओं के प्रभावित बैच नंबरों को तुरंत बाजार, सरकारी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स से वापस (Recall) लिया जाए।
  • कंपनियों को कारण बताओ नोटिस: संबंधित फार्मा कंपनियों को ‘शो-कॉज नोटिस’ जारी कर पूछा गया है कि उनके मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस को हमेशा के लिए रद्द क्यों न कर दिया जाए।
  • फैक्ट्रियों को बंद करने के आदेश: जिन फैक्ट्रियों में बार-बार नियमों का उल्लंघन पाया गया है, उन्हें ‘स्टॉप प्रोडक्शन’ (उत्पादन बंद करने) के आदेश दिए गए हैं।

एक सजग उपभोक्ता के रूप में आपको क्या करना चाहिए?

जब तक सिस्टम पूरी तरह दुरुस्त नहीं हो जाता, तब तक आपको खुद अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होगी। इन जरूरी बातों का हमेशा ध्यान रखें:

  • बैच नंबर की जांच करें: जब भी आप कोई जरूरी दवा (विशेषकर बीपी, शुगर या दिल की) खरीदें, तो इंटरनेट पर सीडीएससीओ (CDSCO) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर इस महीने की ड्रग अलर्ट लिस्ट से उसका बैच नंबर जरूर मैच कर लें।
  • पक्के बिल की मांग करें: हमेशा रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट से ही दवाएं खरीदें और पक्का कैश मेमो (बिल) जरूर लें। अगर भविष्य में दवा में कोई खराबी निकलती है, तो यह बिल कानूनी कार्रवाई के लिए आपका सबसे बड़ा सबूत होगा।
  • दवा के रंग और स्वाद पर नजर रखें: अगर आपकी नियमित दवा का रंग, पैकेजिंग की प्रिंटिंग या उसका स्वाद बदला हुआ लगे, तो उसे तुरंत खाना बंद कर दें और अपने डॉक्टर को सूचित करें।
  • दवाओं का सही भंडारण: दवाओं को घर में सीधे धूप, नमी या अत्यधिक गर्मी वाली जगहों (जैसे किचन या गाड़ी के डैशबोर्ड) पर रखने से बचें।

निष्कर्ष: मुनाफे से ऊपर होनी चाहिए इंसानी जिंदगी

भारत में 159 दवाओं का एक साथ क्वालिटी टेस्ट में फेल होना हमारे लिए एक वेक-अप कॉल (चेतावनी की घंटी) है। फार्मास्यूटिकल कंपनियों को यह समझना होगा कि वे कोई कपड़े या जूते नहीं बना रहे हैं, बल्कि इंसानी जिंदगी को बचाने का जरिया बना रहे हैं। सरकार को रेगुलेटरी सिस्टम को और अधिक पारदर्शी, सख्त और आधुनिक बनाने की जरूरत है ताकि कोई भी दोषी कंपनी चंद पैसों के लालच में देश के नागरिकों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न कर सके। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, और इसकी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

Meenu Rautela

Meenunewwork@gmail.com

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