नई दिल्ली: आज के दौर में जब हम ‘विकसित भारत’ के सपने को हकीकत में बदलने की ओर अग्रसर हैं, तब एक सवाल हमारे सामने दीवार बनकर खड़ा है: क्या हमारी आर्थिक विकास की गाड़ी, तेल की अस्थिर कीमतों के ईंधन पर सुरक्षित दौड़ सकती है?
ऊर्जा का इतिहास: डिगबोई से 90% की निर्भरता तक
भारत का पेट्रोलियम सफर 1889 में असम के डिगबोई में शुरू हुआ था। उस समय का भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर होने का सपना देख रहा था। दशकों तक हमने अपने सीमित संसाधनों के साथ तालमेल बिठाया। लेकिन, 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद, जैसे-जैसे भारत की औद्योगिक गति तेज हुई, हमारी ऊर्जा मांग बेतहाशा बढ़ गई।
इतिहास गवाह है कि हमने 1999 में केवल 55% तेल आयात किया था। उस समय हमारी खपत 90.6 MMT थी। आज 2026 में, यह आंकड़ा 243.2 MMT को पार कर गया है और आयात निर्भरता 90% से ऊपर है। यह पतन रातों-रात नहीं हुआ; यह बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की मांग का परिणाम है।
एक तुलनात्मक विश्लेषण: कल बनाम आज
| पैमाना | वित्त वर्ष 1999 | वित्त वर्ष 2026 |
| आयात निर्भरता | 55% | 90% से ऊपर |
| घरेलू उत्पादन | कम (बढ़ता हुआ) | 26.0 MMT (घटता हुआ) |
| पेट्रोलियम खपत | 90.6 MMT | 243.2 MMT |
| रिफाइनिंग दक्षता | 0.95 | 1.27 |
वर्तमान संकट और ईवाई (EY) रिपोर्ट की चेतावनी
ईवाई की ताजा शोध रिपोर्ट, ‘India’s petroleum economy: Coping with vulnerabilities’, हमें एक आईना दिखाती है। रिपोर्ट के अनुसार, हमारी रिफाइनिंग क्षमता एक ‘शक्ति’ है, लेकिन हमारी आयात निर्भरता एक ‘गंभीर भेद्यता’ (Vulnerability) है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमारा रणनीतिक तेल भंडार (SPR) महज 5 दिन का है। इसकी तुलना चीन से करें, जिसके पास 1,397 मिलियन बैरल तेल का सुरक्षित भंडार है। हम एक भू-राजनीतिक झटके के प्रति असुरक्षित हैं।
आम नागरिक के लिए इसका क्या मतलब है?
इसे आसान भाषा में समझें: जब भी खाड़ी देशों में तनाव बढ़ता है या डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं। इसका असर केवल आपकी बाइक या कार पर नहीं पड़ता, बल्कि ट्रक के जरिए आने वाली हर चीज (सब्जी, राशन, कपड़ा) महंगी हो जाती है। यह सीधे आपकी जेब पर डाका है।
ऊर्जा सुरक्षा की ओर हमारा मार्ग (The Road Ahead)
हमें अब पुरानी ढर्रे वाली नीतियों से बाहर निकलना होगा:
- रणनीतिक भंडार का विस्तार: हमें अपने बफर को कम से कम 90 दिनों के उपभोग के बराबर ले जाना होगा।
- हरित हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा: हमें कोयले और तेल से हटकर ‘ग्रीन गोल्ड’ यानी हरित हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा को प्राथमिकता देनी होगी। 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है।
- अन्वेषण (Exploration): हमें अपने घरेलू बेसिनों में खुदाई तेज करनी होगी ताकि आयात बिल में कटौती हो सके।
निष्कर्ष: ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही असली आजादी है
आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, भारत का लक्ष्य केवल जीडीपी बढ़ाना नहीं, बल्कि उस जीडीपी को सुरक्षित करना होना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा ही हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता का दूसरा नाम है। यदि हमने आज अपनी ऊर्जा आदतों में बदलाव नहीं किया, तो कल की वैश्विक अस्थिरता हमारी प्रगति को रोक सकती है। हमें ‘लिक्विड गोल्ड’ की गुलामी छोड़कर ‘ग्रीन गोल्ड’ की शक्ति को अपनाना होगा।



