नई दिल्ली: वैज्ञानिक जगत से एक झकझोर देने वाली रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन के खतरे को और गहरा कर दिया है। ‘क्लाइमेट साइंस में 10 नई जानकारियां 2025-26’ शीर्षक वाली इस ताजा अध्ययन में विशेषज्ञों ने कहा है कि धरती के प्राकृतिक कार्बन भंडार जैसे जंगल, मिट्टी और महासागर अब अपनी अधिकतम क्षमता के कगार पर खड़े हैं। ये तत्व, जो सालों से मानवजनित कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने का काम कर रहे थे, अब उतनी ही मात्रा में इसे समेटने से चूक रहे हैं। लंबे समय से जारी ग्लोबल वार्मिंग ने इनकी ताकत को चुपचाप कुतर लिया है। रिपोर्ट चेताती है कि न सिर्फ ये प्राकृतिक तंत्र कमजोर हो चुके हैं, बल्कि प्रकृति-केंद्रित कार्बन शोषण योजनाएं भी जोखिमों से घिरी हुई हैं। बड़े स्तर पर इन योजनाओं को बढ़ावा देने से खेती-बाड़ी और वन्य जीवन पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए, सिर्फ हरे-भरे उपायों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। अब तकनीकी हस्तक्षेप और ‘नए जमाने’ के कार्बन हटाव तरीकों को भी अपनाना होगा।
प्राकृतिक कार्बन अवशोषक अब थकान महसूस कर रहे
उत्तरी गोलार्ध के घने जंगल और उपजाऊ मिट्टियां, जो कभी कार्बन के बड़े संग्रहकर्ता थे, अब पीछे हट रही हैं। ये पहले जितना कार्बन सोखने में सक्षम नहीं रह गईं। वहीं, महासागर जो न सिर्फ कार्बन बल्कि अतिरिक्त गर्मी भी समाहित करते हैं, अब कमजोर पड़ रहे हैं। समुद्र में लहरों जैसी गर्मी की लहरें (मरीन हीटवेव) तेज और बार-बार आ रही हैं, जिससे समुद्री जीवन और तटवासी इलाकों में रहने वाले लोग बुरी तरह प्रभावित हो रहे। एक प्रमुख शोधकर्ता ने रिपोर्ट में कहा, हमने दशकों तक सोचा कि हमारे जंगल और जमीनें हमारे प्रदूषण को संभाल लेंगी, लेकिन अब उनकी सीमा साफ दिख रही है। इससे हम उत्सर्जन का असली अंतर कम आंक रहे हैं, और आने वाले वर्षों में तापमान चढ़ने की रफ्तार और भयानक हो सकती है।
प्रकृति-आधारित उपायों की सीमाएं साफ
रिपोर्ट साफ बताती है कि विशाल पैमाने पर पेड़रोपण या जमीन बचाव जैसी प्रकृति-केंद्रित कार्बन हटाव परियोजनाएं सीमित कार्बन ही समेट पाएंगी। इनका दायरा बढ़ाने से अनाज उत्पादन घट सकता है और जैव विविधता को झटका लग सकता है। मतलब, सिर्फ वनरोपण या संरक्षण पर दांव लगाना अब पुरानी सोच है, इसके लिए ज्यादा व्यापक रणनीति चाहिए।
कार्बन बाजारों में विश्वास की कमी
स्वैच्छिक कार्बन क्रेडिट बाजारों को जलवायु समाधान का बड़ा हथियार माना जाता है, लेकिन इनकी भरोसेमंदी पर सवालों का सिलसिला थम नहीं रहा। रिपोर्ट जोर देती है कि इन बाजारों में पारदर्शिता लानी होगी और सख्त मानदंड बनाने होंगे, ताकि कार्बन हटाव प्रोजेक्ट्स वाकई पर्यावरण को फायदा पहुंचाएं, न कि सिर्फ कागजी कारोबार बनें।
गर्म होती धरती के चौंकाने वाले असर
2023 और 2024 के रिकॉर्ड तोड़ तापमान ने चेतावनी के संकेत दे दिए हैं। समुद्रों का तापमान चढ़ रहा है, लू की तीव्रता बढ़ रही है। यह सब मानव स्वास्थ्य, फसलें और रोजमर्रा की जिंदगी को नुकसान पहुंचा रहा। जलवायु बदलाव से जमीन और पानी के स्रोतों पर बोझ बढ़ा है। मिसाल के तौर पर, ऊंचे तापमान से भूजल स्तर गिर रहा है, जो किसानों और शहरवासियों दोनों के लिए मुसीबत है। ऊपर से, गर्म मौसम मच्छरों के फैलाव को बढ़ावा दे रहा, जिससे डेंगू जैसे रोगों का वैश्विक प्रकोप तेज हो गया। हाल के सबसे बड़े डेंगू हमले ने स्वास्थ्य सेवाओं को हांफा दिया।
गर्मी का श्रमिकों पर काला साया
चरम तापमान न सिर्फ बीमारियां फैला रहा, बल्कि कामकाज को भी ठप कर रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, महज एक डिग्री की बढ़ोतरी से उष्णकटिबंधीय इलाकों में करीब 8 करोड़ मजदूर अत्यधिक गर्मी की मार झेल सकते हैं। नतीजा? उनके काम के घंटे आधे रह जाएंगे, जिससे अर्थव्यवस्था को गहरा घाव लगेगा।
जलवायु और वन्य जीवन का घातक चक्र
जलवायु संकट और जैव विविधता का क्षय एक-दूसरे को हवा दे रहे हैं, जो पूरे संकट को और जटिल बना रहा। एक समस्या को सुलझाने से दूसरी खत्म नहीं होती—इसलिए बहुआयामी नजरिया अपनाना जरूरी।
क्या करें सरकारें? तीन रणनीतियां जो बदलाव ला सकती हैं
रिपोर्ट नीति निर्माताओं से अपील करती है कि अब फैसले लेने का वक्त है। मुख्य सुझाव ये हैं:
- उत्सर्जन पर ब्रेक: हर राष्ट्र को तुरंत कार्बन उत्सर्जन घटाने के सख्त कदम उठाने होंगे।
- प्रकृति का संरक्षण: जंगलों, मिट्टियों और समुद्रों की शक्ति को बचाना-पुनर्जीवित करना अनिवार्य।
- मिश्रित रास्ता: प्राकृतिक तरीकों के साथ तकनीकी कार्बन हटाव और मजबूत नीतियों का संतुलन।
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रिपोर्ट के 10 प्रमुख संकेत जो चिंता बढ़ाते हैं
- रिकॉर्ड गर्मी का दौर (2023-24): वैश्विक तापमान अब अनियंत्रित।
- समुद्रों का उबलना: मरीन जीवन खतरे में।
- जमीन के कार्बन संग्रह पर संकट: जंगल-मिट्टी कमजोर।
- जलवायु-जैव विविधता का चक्र: एक संकट दूसरे को जन्म दे रहा।
- भूजल का सूखना: खेती और शहरों को चुनौती।
- गर्मी-डेंगू का कनेक्शन: रोगों का प्रसार तेज।
- कामकाज पर गर्मी का प्रहार: उत्पादकता गिरावट।
- कार्बन हटाव का विस्तार: सावधानी से लागू करें।
- कार्बन बाजारों का भरोसा: पारदर्शिता पहले।
- नीतियों का संतुलन: एकतरफा उपाय नाकाफी।



