नई दिल्ली: यह कहानी सिर्फ दो देशों के बीच सैन्य सहयोग की नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति के उस शतरंज की है जहां मोहरे कहीं और चलते हैं और चालें कहीं और से नियंत्रित होती हैं। हाल ही में अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक ‘मिडिल ईस्ट फोरम’ की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों और नीति निर्माताओं के बीच हलचल मचा दी है। रिपोर्ट का सीधा और स्पष्ट दावा है: चीन अपने रणनीतिक हितों को साधने और दुनिया के उन हिस्सों में अपने हथियार बेचने के लिए पाकिस्तान को एक ‘गेटवे’ (प्रवेश द्वार) की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जहां वह खुद सीधे तौर पर सामने नहीं आना चाहता।
इस रणनीति का सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण पाकिस्तान और ‘लीबियाई नेशनल आर्मी’ (LNA) के बीच हुआ एक विशाल रक्षा सौदा है। यह सौदा 4 अरब डॉलर (लगभग 33,000 करोड़ रुपये से अधिक) का है, जिसके तहत पाकिस्तान लीबिया को 16 जेएफ-17 (JF-17) थंडर लड़ाकू विमान, प्रशिक्षण विमान और अन्य अत्याधुनिक सैन्य उपकरण सप्लाई करने जा रहा है। दिखने में यह सौदा पाकिस्तान और लीबिया के बीच है, लेकिन इसकी आत्मा पूरी तरह चीनी है। आइए इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से समझते हैं कि कैसे यह डील दुनिया के नक्शे पर नए तनाव पैदा कर रही है।
लीबिया सौदा और उसके वैश्विक खतरे
लीबिया पिछले कई सालों से आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध से जूझ रहा है। वहां की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) ने लीबिया पर कड़े हथियार प्रतिबंध (Arms Embargo) लगा रखे हैं। थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान और लीबियाई नेशनल आर्मी के बीच हुई इस बड़ी डील से ये अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध पूरी तरह कमजोर पड़ सकते हैं।
इसके तीन सबसे बड़े प्रभाव देखने को मिल सकते हैं:
- आंतरिक संतुलन में बदलाव: लीबिया के भीतर चल रहे गृहयुद्ध में किसी एक गुट को अचानक 16 लड़ाकू विमान मिल जाना वहां के सैन्य संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा, जिससे हिंसा और बढ़ सकती है।
- क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव: इस सौदे से न केवल उत्तरी अफ्रीका बल्कि मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) के देशों में भी असुरक्षा की भावना बढ़ेगी।
- प्रतिबंधों की धज्जियां: संयुक्त राष्ट्र के नियमों को दरकिनार कर किए जा रहे इस सौदे से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की साख पर सवाल खड़े होंगे।
बीजिंग पर इस्लामाबाद की पूर्ण निर्भरता (आंकड़ों की जुबानी)
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान अचानक से चीन का इतना वफादार हो गया है। इसके पीछे पिछले कुछ सालों की सोची-समझी सैन्य और आर्थिक निर्भरता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI), जो दुनिया भर में हथियारों के व्यापार पर नजर रखने वाली सबसे प्रामाणिक संस्था है, के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं।
SIPRI का बड़ा खुलासा: वर्ष 2021 से 2024 के बीच, पाकिस्तान ने जितने भी हथियार आयात (Import) किए, उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक अकेले चीन से आए थे।
यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि पाकिस्तान का रक्षा क्षेत्र अब पूरी तरह से बीजिंग के इशारों पर निर्भर हो चुका है। हालांकि, पाकिस्तान के बेड़े में अभी भी अमेरिकी मूल के एफ-16 (F-16 Fighting Falcon) विमान शामिल हैं और समय-समय पर उसे अमेरिका से सैन्य सहायता या कलपुर्जे मिलते रहते हैं, लेकिन अब उसकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह चीनी तकनीक बन चुकी है।
तुलनात्मक विश्लेषण: इतिहास बनाम वर्तमान रुझान
यह समझने के लिए कि यह बदलाव कितना बड़ा है, हमें इतिहास और वर्तमान के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण करना होगा।
| विशेषता / कालखंड | शीतयुद्ध से 2000 के दशक की शुरुआत (इतिहास) | वर्तमान रुझान (2021-2026) |
| मुख्य हथियार आपूर्तिकर्ता | संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और कुछ हद तक फ्रांस/यूके। | मुख्य रूप से चीन (80% से अधिक हिस्सेदारी)। |
| रणनीतिक भूमिका | पाकिस्तान अमेरिकी ब्लॉक का हिस्सा था और सोवियत संघ के खिलाफ फ्रंटलाइन स्टेट था। | पाकिस्तान चीनी भू-राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे (BRI/CPEC) का मुख्य मोहरा है। |
| हथियारों का निर्माण | विदेशी हथियारों का सीधे आयात और रखरखाव। | चीनी सहयोग से पाकिस्तान में ही ‘संयुक्त उत्पादन’ (जैसे जेएफ-17 विमान)। |
| बाजार में भूमिका | केवल अपने लिए हथियारों का खरीदार। | चीनी हथियारों को दुनिया के अन्य संकटग्रस्त देशों में बेचने वाला ‘डीलर/गेटवे’। |
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
इतिहास गवाह है कि 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान या उसके बाद भी पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत के लिए अमेरिकी मदद पर निर्भर रहता था। अमेरिका उसे फ्रंटलाइन सहयोगी मानता था। लेकिन धीरे-धीरे अमेरिका और भारत के संबंध मजबूत हुए और अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य मदद पर कड़े नियम लगा दिए। इसी शून्य को भरने के लिए चीन ने पाकिस्तान में प्रवेश किया।
वर्तमान का खतरनाक रुझान
आज चीन सीधे तौर पर उन देशों को हथियार बेचने से बचता है जहां अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हों या जहां सीधे तौर पर अमेरिका से टकराव का खतरा हो। ऐसे में वह पाकिस्तान को आगे कर देता है। पाकिस्तान और चीन मिलकर जेएफ-17 थंडर विमान बनाते हैं। यह विमान कहने को संयुक्त रूप से निर्मित है, लेकिन इसकी मुख्य तकनीक, इंजन डिजाइन और फंडिंग का बड़ा हिस्सा चीन का है। अब पाकिस्तान इस विमान के साथ-साथ चीनी ड्रोन, एचक्यू-9 (HQ-9) एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य घातक उपकरणों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच रहा है।
मध्य पूर्व और अफ्रीका में पाकिस्तान का ‘मार्केटिंग अभियान’
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान ने दुनिया के कई संवेदनशील और विकासशील देशों के साथ अपनी रक्षा वार्ताओं को बहुत तेज कर दिया है। इन देशों की सूची काफी लंबी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है:
- इराक और बांग्लादेश
- इंडोनेशिया और मलेशिया
- सऊदी अरब और मोरक्को
- नाइजीरिया, सूडान और इथियोपिया
चीनी मीडिया भी खुलकर इस बात का दावा कर रहा है कि पाकिस्तान इनमें से कई देशों के साथ जेएफ-17 विमानों के सौदों को अंतिम रूप देने के बेहद करीब है।
सऊदी अरब के साथ ‘डील’ का पेंच
इस पूरी रणनीति में सऊदी अरब के साथ चल रही बातचीत बेहद दिलचस्प है। संभावित समझौते के मुताबिक, पाकिस्तान सऊदी अरब को ये जेएफ-17 विमान उपलब्ध करा सकता है और बदले में सऊदी अरब पाकिस्तान को बड़ी वित्तीय मदद (फंडिंग) दे सकता है। हालांकि, यह सौदा अभी तक पूरी तरह फाइनल नहीं हो पाया है। इसके पीछे मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:
- गुणवत्ता पर संदेह: चीनी तकनीक और हथियारों की गुणवत्ता पर अभी भी पश्चिमी देशों के मुकाबले थोड़े सवाल उठाए जाते हैं।
- अमेरिकी सिस्टम से तालमेल की कमी: सऊदी अरब के पास पहले से ही भारी मात्रा में अमेरिकी और यूरोपीय हथियार हैं, जिनके साथ इन चीनी-पाकिस्तानी प्रणालियों को जोड़ना तकनीकी रूप से कठिन होता है।
- वित्तीय जटिलताएं: अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रतिबंध और भुगतान के तरीकों को लेकर भी पेंच फंसे हुए हैं।
निष्कर्ष: बीजिंग का असली चक्रव्यूह
‘मिडिल ईस्ट फोरम’ का निष्कर्ष बेहद स्पष्ट और डराने वाला है। चीन खुद पर्दे के पीछे रहकर पाकिस्तान के माध्यम से पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) और अफ्रीका के रक्षा बाजार में अपनी पैठ मजबूत कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा चीनी मूल के हथियारों का दुनिया भर में प्रचार-प्रसार करना और उन्हें बेचना, असल में बीजिंग की उस व्यापक रक्षा-औद्योगिक और रणनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करता है, जिसका मकसद अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देना है।
इस खेल में पाकिस्तान को भले ही कुछ अरब डॉलर मिल जाएं, लेकिन वैश्विक पटल पर उसकी छवि एक स्वतंत्र देश की न रहकर चीन के एक ‘हथियार डीलर’ या ‘प्रॉक्सी’ (मोहरे) के रूप में स्थापित होती जा रही है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र इस ‘गेटवे’ रणनीति पर क्या कड़ा रुख अपनाते हैं।



