नई दिल्ली: वही हुआ, जो बीते कुछ साल से होता आया है। इस बार भी मीडिया समेत कोई भी उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का अनुमान नहीं लगा सका। हालांकि, इतना जरुर हुआ कि उपराष्ट्रपति पद के लिए किसी राज्यपाल को चुना जा सकता है, ये कयास सही साबित हुए।
दक्षिण भारत से आने वाले सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने एक तरह से साउथ इंडिया को साधने की कोशिश की है। बीजेपी को ये पता है कि उत्तर भारत के राज्यों में जीत के मामले में वह चरम पर पहुंच चुकी है। अब अगले लोकसभा चुनाव में उत्तर भारत से उसकी सीटें कम होना तय है लेकिन दक्षिण भारत में कर्नाटक के अलावा अभी उसे किसी और राज्य से बहुत अधिक उम्मीद नहीं है।
यही वजह है कि बीजेपी ने एक रणनीति के तहत दक्षिण भारत के नेताओं को आगे लाने की कोशिश शुरू की है। इन नेताओं को अहम पद देकर पार्टी और खुद नरेन्द्र मोदी की रणनीति है कि दक्षिण में अपनी पैठ को मजबूत किया जाए। इससे ये मैसेज जाएगा कि बीजेपी अब सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी नहीं है। ऐसे में तमिलनाडु से बेहतर राज्य उसके लिए नहीं है, जहां वह अपनी ओर से कोशिश करे। दरअसल, तमिलनाडु में जे. जयललिता के निधन के बाद वहां उनकी पार्टी पहले से ही बंट चुकी है। इधर डीएमके की भी अगली पीढ़ी ही वहां की राजनीति की कमान संभाले हुए है जबकि कांग्रेस डीएमके की बैसाखी पर चल रही है।
ऐसे में बीजेपी को लग रहा है कि अगर वहां उसे बेहतरीन ब्रेकथ्रू मिल जाए तो उसके लिए आने वाले चुनावों में काफी राहत मिल सकती है। पार्टी को लग रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस को हराकर सत्ता पा सकती है। ऐसे में कर्नाटक में एक बार फिर लोकसभा चुनाव में वह कुछ सीटें जीत लेगी। अगर कर्नाटक के साथ ही तमिलनाडु में भी वह अपनी ताकत बढ़ाए तो वह राज्य में छोटे दलों से तालमेल करके कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो सकती है। इससे उत्तर में कम होने वाली कुछ सीटों की वह भरपाई कर सकेगी।
दूसरे दक्षिण भारत से आने वाले व्यक्ति के जरिए बीजेपी राज्यसभा में भी अपना दबदबा बनाए रख सकती है। ओ.पी. धनखड़ प्रकरण के बाद बीजेपी को लग रहा था कि उसे ऐसे पद के लिए अपने मूल कैडर से ही किसी व्यक्ति को बिठाना चाहिए, जिसकी प्रतिबद्धता पार्टी और आरएसएस के साथ हो। ताकि उसके गच्चा देने की कोई आशंक न हो। सीपी राघाकृष्णन इस कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। संभवत: यही वजह है कि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को भी तरक्की नहीं दी गई और बीजेपी ने एनडीए के किसी सहयोगी की बजाए अपनी ही पार्टी के नेता को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाने का फैसला किया।



