Shubhanshu Shukla स्पेस स्टेशन से कागज का हवाई जहाज फेंकें तो क्या होगा?

अगर शुभांशु ISS से कागज का हवाई जहाज बनाकर धरती की ओर फेंके, तो क्या वह धरती तक पहुंचेगा? बचपन में हम सभी ने कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ाए हैं, लेकिन अंतरिक्ष से ऐसा करने का विचार रोमांचक और वैज्ञानिक रूप से जटिल है। आइए, इस सवाल का जवाब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तलाशते हैं।

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नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला की इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से वापसी में देरी ने वैज्ञानिक जिज्ञासा को हवा दी है। एक रोचक सवाल उठता है, अगर शुभांशु ISS से कागज का हवाई जहाज बनाकर धरती की ओर फेंके, तो क्या वह धरती तक पहुंचेगा? बचपन में हम सभी ने कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ाए हैं, लेकिन अंतरिक्ष से ऐसा करने का विचार रोमांचक और वैज्ञानिक रूप से जटिल है। आइए, इस सवाल का जवाब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तलाशते हैं।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन: एक नजर
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) धरती से लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर चक्कर लगाने वाला एक विशाल वैज्ञानिक प्रयोगशाला है। यह कई देशों के सहयोग से निर्मित है और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए निवास और अनुसंधान का केंद्र है। ISS की गति 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा है, जिसके कारण यह हर 90 मिनट में धरती का एक चक्कर पूरा करता है। इस ऊंचाई पर वायुमंडल बहुत पतला है, जो लगभग निर्वात (वैक्यूम) जैसी स्थिति बनाता है।

कागज का हवाई जहाज अंतरिक्ष से धरती तक?
कागज का हवाई जहाज हल्का और नाजुक होता है, लेकिन क्या यह अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों में धरती तक पहुंच सकता है? इस सवाल का जवाब जापानी वैज्ञानिकों ने एक अनूठे प्रयोग से खोजने की कोशिश की थी। जापान की प्रसिद्ध ओरिगामी कला से प्रेरित होकर, टोक्यो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और ओरिगामी विशेषज्ञों ने यह परखने की ठानी कि क्या कागज का हवाई जहाज अंतरिक्ष से धरती तक की यात्रा कर सकता है।

वैज्ञानिक प्रयोग और सिमुलेशन
टोक्यो विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने इस विचार को परखने के लिए कंप्यूटर सिमुलेशन और हाइपरसोनिक विंड टनल का उपयोग किया। उनके अध्ययन के तीन मुख्य उद्देश्य थे:

  • कागज का हवाई जहाज ISS की ऊंचाई से कितनी गति से धरती की ओर आएगा?
  • उड़ान के दौरान उसका व्यवहार और दिशा कैसी रहेगी?
  • वायुमंडल में प्रवेश के दौरान वह कितनी गर्मी झेल सकता है, और क्या वह बिना जल जाए धरती तक पहुंचेगा?

कंप्यूटर सिमुलेशन में, कागज के हवाई जहाज को ISS की गति (7,800 मीटर/सेकंड) के साथ 400 किलोमीटर की ऊंचाई से छोड़ा गया। इस ऊंचाई पर वायुमंडल का घनत्व इतना कम है कि हवाई जहाज को कोई खास नुकसान नहीं हुआ। सिमुलेशन के अनुसार, कागज का हवाई जहाज धीरे-धीरे धरती की ओर बढ़ता है, लेकिन उसकी गति बहुत कम होती है। 400 किलोमीटर से 120 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचने में इसे लगभग साढ़े तीन दिन लगे।

वायुमंडल में प्रवेश: चुनौतियां
120 किलोमीटर की ऊंचाई से नीचे आने पर वायुमंडल का घनत्व बढ़ने लगता है। इससे कागज का हवाई जहाज अस्थिर होकर लुढ़कने लगता है, और उसका रास्ता अनिश्चित हो जाता है। वायुमंडल में प्रवेश के दौरान हवा का घर्षण तीव्र गर्मी पैदा करता है। सामान्य अंतरिक्ष यान, जैसे नासा के स्पेस शटल, वायुमंडल में प्रवेश के दौरान 2,900 डिग्री फारेनहाइट तक गर्म हो जाते हैं। हालांकि, कागज का हवाई जहाज हल्का होने के कारण इतनी तेज गति से नहीं आता। इसकी गति 120 किलोमीटर की ऊंचाई पर Mach 6 (ध्वनि की गति से 6 गुना) तक कम हो जाती है।

हाइपरसोनिक विंड टनल प्रयोग
जापानी वैज्ञानिकों ने हाइपरसोनिक विंड टनल में कागज के हवाई जहाज को Mach 7 की गति से हवा में परखा। इस प्रयोग में हवाई जहाज की पूंछ पर एल्यूमीनियम की परत लगाई गई थी। सात सेकंड की तेज हवा के संपर्क में आने पर हवाई जहाज का अगला हिस्सा मुड़ गया, और इसके किनारे जलने लगे। यह दर्शाता है कि लंबे समय तक वायुमंडल की गर्मी और घर्षण में रहने पर कागज का हवाई जहाज पूरी तरह जलकर नष्ट हो सकता है।

धरती तक पहुंचना संभव नहीं
इस प्रयोग से पता चलता है कि कागज का हवाई जहाज ISS से धरती तक पहुंचने में सक्षम नहीं है। वायुमंडल में प्रवेश के दौरान हवा का घर्षण और गर्मी इसे नष्ट कर देगी। इसके अलावा, इसकी अनिश्चित उड़ान दिशा के कारण यह कहना मुश्किल है कि यह धरती पर कहां गिरेगा। अगर यह बिना जले धरती तक पहुंच भी जाए, तो यह बुरी तरह क्षतिग्रस्त होगा और अपनी मूल आकृति खो देगा।

प्रयोग का व्यापक महत्व
यह प्रयोग केवल जिज्ञासा के लिए नहीं था। वैज्ञानिकों का उद्देश्य अंतरिक्ष मलबे (जैसे पुराने उपग्रहों और रॉकेट के टुकड़ों) के प्रभाव को समझना था। अंतरिक्ष में बढ़ता मलबा सक्रिय उपग्रहों और अंतरिक्ष मिशनों के लिए खतरा है। इस तरह के प्रयोग यह जानने में मदद करते हैं कि हल्की सामग्री से बने उपकरण अंतरिक्ष में कैसे व्यवहार करते हैं। भविष्य में, ऐसी सामग्री का उपयोग टिकाऊ अंतरिक्ष यानों के लिए हो सकता है।

Navneet Sharan

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