नई दिल्ली: अमेरिका ने H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड सिस्टम में बड़ा बदलाव किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को नए नियमों पर साइन करते हुए घोषणा की कि अब H-1B वीजा की एप्लिकेशन फीस 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपए) होगी। अभी तक यह फीस केवल 1 से 6 लाख रुपए तक थी। इसके साथ ही अमेरिका ने ‘ट्रम्प गोल्ड कार्ड’, ‘ट्रम्प प्लेटिनम कार्ड’ और ‘कॉर्पोरेट गोल्ड कार्ड’ जैसी नई योजनाएँ भी शुरू की हैं। इनमें से ‘गोल्ड कार्ड’ को अमेरिका का नया ग्रीन कार्ड कहा जा रहा है, जो विदेशी नागरिकों को अनलिमिटेड रेसीडेंसी देगा। यानी धारक अमेरिका में जीवनभर रह सकता है, बस उसे अमेरिकी पासपोर्ट और वोटिंग का अधिकार नहीं मिलेगा।
H-1B वीजा क्या है?
H-1B वीज़ा अमेरिका का एक अस्थायी वर्क परमिट है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशों से हाई-स्किल्ड प्रोफेशनल्स को नौकरी पर रख सकती हैं। इसे 1990 में शुरू किया गया था, ताकि ऐसे लोगों को मौका दिया जा सके जिनके पास साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता हो। इन सेक्टरों में अक्सर अमेरिका को पर्याप्त घरेलू प्रोफेशनल्स नहीं मिलते, इसलिए बाहर से योग्य लोगों को बुलाकर कंपनियां अपनी जरूरत पूरी करती हैं।
यह वीजा शुरुआत में तीन साल के लिए दिया जाता है और इसे अधिकतम छह साल तक बढ़ाया जा सकता है। अगर धारक को ग्रीन कार्ड यानी स्थायी निवास मिल जाता है, तो उसका वीज़ा अनिश्चितकाल तक बढ़ाया जा सकता है। आवेदन की प्रक्रिया में उम्मीदवार को सबसे पहले अमेरिकी नागरिकता और इमिग्रेशन सर्विस (USCIS) की वेबसाइट पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होता है। इसके बाद लॉटरी सिस्टम के जरिए तय किया जाता है कि किसे वीजा मिलेगा।
अमेरिकी सरकार क्यों कर रही है बदलाव?
अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने बताया कि अब तक हर साल लगभग 2.8 लाख लोगों को ग्रीन कार्ड मिलता है। इनमें से कई लोग 66,000 डॉलर (करीब 58 लाख रुपए) सालाना ही कमाते हैं और कभी-कभी सरकारी मदद पर निर्भर हो जाते हैं। सरकार का मानना है कि महंगी फीस तय करने से केवल टॉप टैलेंट और आर्थिक रूप से मजबूत लोग ही अमेरिका आ पाएंगे।
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भारतीय IT प्रोफेशनल्स पर असर
भारत H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी है। पिछले साल 71% H-1B वीजा भारतीयों को मिले थे। लेकिन नई फीस कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के लिए भारी बोझ साबित हो सकती है। मिड-लेवल और एंट्री-लेवल कर्मचारियों को वीजा पाना मुश्किल होगा। कंपनियाँ नौकरियाँ आउटसोर्स करने लगेंगी। भारतीय टैलेंट यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और मिडिल ईस्ट की ओर जा सकता है।
आंकड़ों में बदलाव
| वीजा/कार्ड | पुरानी फीस | नई फीस/कीमत | फायदा |
|---|---|---|---|
| H-1B वीजा | ₹1–6 लाख | $100,000 (₹88 लाख) | अमेरिका में जॉब |
| गोल्ड कार्ड | – | $1 मिलियन (₹8.8 करोड़) | लाइफटाइम रेजीडेंसी, वोट और पासपोर्ट छोड़कर बाकी सभी अधिकार |
| ग्रीन कार्ड (EB-1/EB-2) | $700–$1500 (₹60k–₹1.2 लाख) | बंद होगा, जगह लेगा गोल्ड कार्ड | स्थायी निवास |
| चेकिंग फीस (गोल्ड कार्ड के लिए) | – | $15,000 (₹13 लाख) | सुरक्षा और बैकग्राउंड जांच |



