नई दिल्ली: देश में हाल के कुछ सालों में हुए ओडिशा का बालासोर जैसे ट्रेन हादसों लोगों के जेहन में एक डर पैदा कर दिया है। वह जब भी ट्रेन में सफर शुरू करते हैं तो अपनों से बातचीत में जिक्र आ ही जाता है कि सुरक्षित पहुंचा तो फोन करूंगा। बेशक बातें मजाक ही में क्यों न हो, लेकिन हकीकतन अब यह डर धीरे-धीरे खत्म होने वाला है। वह इसलिए कि ट्रेनों में सुरक्षित यात्रा के लिए कई अहम कदम उठाएं हैं।
इनमें शामिल है-स्वदेश निर्मित विकसित कवच 4.0। इसे दिल्ली-मुंबई मार्ग के मथुरा-कोटा सेक्शन पर चालू किया गया। यह कवच प्रभावी ब्रेक अनुप्रयोग के माध्यम से लोको पायलटों के लिए गति नियंत्रण सक्षम बनाता है। लोको पायलटों को कोहरे में भी कैब के अंदर सिग्नल की जानकारी मिलेगी। भारतीय रेलवे 6 वर्षों के भीतर पूरे देश में कवच 4.0 चालू करेगी।
छह साल में लगा कवच, दूसरे देशों में लग जाते हैं 20-30 साल
केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन से प्रेरणा लेते हुए रेलवे ने कवच स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली का स्वदेश में ही डिजाइन, विकास और निर्माण किया है। कवच 4.0 एक प्रौद्योगिकी-प्रधान प्रणाली है। इसे अनुसंधान डिजाइन एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) ने जुलाई 2024 में अप्रूव किया था। कई विकसित देशों को ट्रेन सुरक्षा प्रणाली विकसित करने और स्थापित करने में 20-30 साल लग गए। कोटा-मथुरा सेक्शन पर कवच 4.0 का निर्माण बहुत ही कम समय में पूरा किया गया है। भारतीय रेलवे छह वर्षों की छोटी सी अवधि में देशभर के विभिन्न मार्गों पर कवच 4.0 को लागू करने की तैयारी कर रहा है।

30 हजार लोगों को किया जा चुका है प्रशिक्षित
कवच प्रणालियों पर 30,000 से ज्यादा लोगों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। आईआरआईएसईटी (भारतीय रेलवे सिग्नल इंजीनियरिंग एवं दूरसंचार संस्थान) ने कवच को अपने बीटेक पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए 17 एआईसीटीई-अनुमोदित इंजीनियरिंग कॉलेजों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। कवच, प्रभावी ब्रेक लगाकर लोको पायलटों को ट्रेन की गति बनाए रखने में मदद करेगा। कोहरे जैसी कम दृश्यता की स्थिति में भी लोको पायलटों को सिग्नल के लिए केबिन से बाहर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पायलट केबिन के अंदर लगे डैशबोर्ड पर जानकारी देख सकते हैं।
कवच क्या है?
कवच एक स्वदेशी रूप से विकसित रेल सुरक्षा प्रणाली है। इसे रेलगाड़ियों की गति की निगरानी और नियंत्रण करके दुर्घटनाओं को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे सुरक्षा एसआईएल-4 पर डिज़ाइन किया गया है। यह सुरक्षा डिजाइन का उच्चतम स्तर है। कवच का विकास 2015 में शुरू हुआ।
इस प्रणाली का 3 वर्षों से अधिक समय तक बड़े स्तर पर इसका परीक्षण किया गया। तकनीकी सुधारों के बाद इस प्रणाली को दक्षिण मध्य रेलवे (एसीआर) में स्थापित किया गया। पहला परिचालन प्रमाणपत्र 2018 में प्रदान किया गया। दक्षिण-मध्य रेलवे में प्राप्त अनुभवों के आधार पर एक उन्नत प्रारूप ‘कवच 4.0’ विकसित किया गया। इसे मई 2025 में 160 किमी प्रति घंटे तक की गति के लिए अनुमोदित किया गया।

कवच की जटिलता
- आरएफआईडी टैग: ये टैग पूरी पटरी पर हर 1 किलोमीटर पर लगाए जाते हैं। हर सिग्नल पर भी टैग लगाए जाते हैं। ये आरएफआईडी टैग ट्रेनों की सटीक लोकेशन बताते हैं।
- दूरसंचार टावर: ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी और बिजली आपूर्ति सहित पूर्ण दूरसंचार टावर, हर कुछ किलोमीटर पर ट्रैक की पूरी लंबाई में लगाए जाते हैं। लोको पर लगे कवच सिस्टम और स्टेशनों पर कवच नियंत्रक इन टावरों के माध्यम से लगातार संचार करते रहते हैं। यह एक दूरसंचार ऑपरेटर की तरह एक संपूर्ण नेटवर्क स्थापित करने के बराबर है।
- लोको कवच: यह पटरियों पर लगे आरएफआईडी टैग से जुड़कर दूरसंचार टावरों तक सूचना पहुँचाता है और स्टेशन कवच से रेडियो सूचना प्राप्त करता है। लोको कवच को इंजनों के ब्रेकिंग सिस्टम से भी जोड़ा गया है। यह सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि आपातकालीन स्थिति में ब्रेक लगाए जाएं।
- स्टेशन कवच: प्रत्येक स्टेशन और ब्लॉक सेक्शन पर स्थापित। यह लोको कवच और सिग्नलिंग प्रणाली से सूचना प्राप्त करता है और लोको कवच को सुरक्षित गति के लिए मार्गदर्शन करता है।
- ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी): ऑप्टिकल फाइबर को पटरियों के साथ बिछाया जाता है, जो उच्च गति डेटा संचार के लिए इन सभी प्रणालियों को जोड़ता है।
- सिग्नलिंग प्रणाली: सिग्नलिंग प्रणाली को लोको कवच, स्टेशन कवच, दूरसंचार टावरों आदि के साथ एकीकृत किया गया है।
इन प्रणालियों को यात्री और मालगाड़ियों की भारी आवाजाही सहित रेलवे परिचालन को बाधित किए बिना स्थापित, जांचा और प्रमाणित किया जाना आवश्यक है।

हर साल एक लाख करोड़ रुपये निवेश
भारतीय रेलवे सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर प्रति वर्ष 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करता है। कवच, यात्रियों और ट्रेनों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए शुरू की गई कई पहलों में से एक है।
वस्तु प्रगति
- ऑप्टिकल फाइबर बिछाया गया 5,856 किमी
- दूरसंचार टावर स्थापित 619
- स्टेशनों पर कवच स्थापित 708
- लोको पर कवच स्थापित 1,107
- ट्रैकसाइड उपकरण स्थापित 4,001 आरकेएम
भारत के बड़े ट्रेन एक्सिडेंट
- 6 जून 1981: बिहार के सहरसा पैसेंजर ट्रेन हादसे में 800 लोगों की मौत हो गई। ट्रेन पटरी से उतर गई और नदी में गिर गई थी।
- 23 नवंबर 1956: बाढ़ के कारण पुल टूटने से हैदराबाद से 100 किमी दूर महबूबनगर ट्रेन एक्सिटेंड में हुआ था। ट्रेन मरुदयार नदी में गिर गई थी। इसमें कम से कम 154 लोग मारे गए थे और 115 घायल हुए थे।
- 20 अगस्त 1995ः फिरोजाबाद में कालिंदी एक्सप्रेस और पुरुषोत्तम एक्सप्रेस टकरा गई थीं। इस हादसे में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। 344 लोग घायल हुए थे।
- 26 नवंबर 1998: पंजाब में जम्मू तवी-सियालदाह एक्सप्रेस और फ्रंटियर मेल के टकराने से 210 मौतें हुई थीं।
- 2 अगस्त 1999: अवध असम एक्सप्रेस और ब्रह्मपुत्र मेल पश्चिम बंगाल के गैसल में कटरा गई थीं। इस हादसे में 285 लोगों की मौत और 312 घायल हुए थे।
- 2002ः राजधानी एक्सप्रेस के कुछ डिब्बे धाबी नदी में गिर गए थे जिसमें करीब 120 लोग मारे गए थे।
- 28 मई 2010: बंगाल के झारग्राम में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस मालगाड़ी से टकरा गई थी। इसमें 146 लोगों की जान चली गई थी। 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
- नवंबर 2016: इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन के कई डिब्बे पटरी से उतर गए थे। इसमें 146 लोगों की मौत हुई थी।
- 2 जून 2023: ओडिसा के बालासोर में चेन्नई से हावड़ा जा रही कोरोमंडल एक्सप्रेस लूप लाइन में खड़ी मालगाड़ी से टकरा गई थी। इसमें 11 बोगियां पटरी से उतर गई थीं। इससे 296 लोगों की मौत हुई थी और 1200 लोग घायल हुए थे।



