SC में सरकार बोली, Governors के अधिकार कम न करें, होगा संकट

केंद्र सरकार ने SC में कहा है कि अगर Governors को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा में बांधा जाता है, तो इससे देश में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है।

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा है कि Governors और राष्ट्रपति को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा में बांधना संवैधानिक अराजकता को जन्म देगा। यह बयान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश के जवाब में आया है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि Governors को विधेयकों पर फैसला एक तय समय सीमा के भीतर ही लेना होगा।

सरकार ने जताई आपत्ति

संवैधानिक अराजकता का डर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक लिखित जवाब दाखिल करते हुए कहा है कि अगर Governors जैसे संवैधानिक पदों को समय सीमा में बांधा जाता है, तो इससे देश में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट को संविधान में संशोधन करने या कानून निर्माताओं को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति का पद लोकतांत्रिक व्यवस्था के शीर्ष पर हैं और उनकी गरिमा को कम नहीं किया जा सकता है। मेहता ने यह भी तर्क दिया कि अगर विधेयकों को लेकर कोई समस्या आती है, तो उसे राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि न्यायपालिका के हस्तक्षेप से। उन्होंने अनुच्छेद 200 का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह किसी विधेयक को मंजूरी दे या फिर उसे राष्ट्रपति के पास भेजें।

सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला


यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को तमिलनाडु से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया था। उस फैसले में कोर्ट की दो जजों की बेंच ने कहा था कि Governor और राष्ट्रपति को विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोक कर रखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि राष्ट्रपति को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए तीन महीने और राज्यपालों को एक महीने का समय लेना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि अगर राज्यपाल किसी विधेयक को सदन में पुनर्विचार के लिए भेजते हैं और सदन उसे दोबारा पारित कर देता है, तो राज्यपाल के पास उसे रोकने का कोई विकल्प नहीं है। राष्ट्रपति के पास भेजने के नाम पर भी इसे लंबे समय तक लटकाया नहीं जा सकता।

संवैधानिक पीठ का गठन

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत एक प्रेसिडेंशियल रेफरेंस भेजकर सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर 14 सवाल पूछे थे। इस रेफरेंस पर अब 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक पीठ सुनवाई करेगी, जिसमें चीफ जस्टिस बीआर गवई भी शामिल होंगे। कोर्ट ने सुनवाई को सुगम बनाने के लिए दोनों पक्षों को चार-चार दिन का समय दिया है और नोडल वकील भी नियुक्त किए हैं। सुनवाई 10 सितंबर तक पूरी होने की संभावना है। इस मामले में कपिल सिब्बल की तरफ से मिशा रोहतगी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तरफ से अमन मेहता नोडल वकील होंगे।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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