संविधान कोई साधारण कागज का पुलिंदा नहीं हैं। यह हमारे देश के लोगों द्वारा हमारे देश के लोगों से किया गया एक पवित्र वादा है। यह उस सपने का दस्तावेज है, जिसमें हमने एक ऐसे भारत की कल्पना की है, जो संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हो।
संविधान की प्रस्तावना इन वादों, इरादों और ख्वाबों की एक फेहरिस्त है। इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, व्यक्ति की गरिमा, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता, और राष्ट्र की एकता व अखंडता का वचन दिया गया है।
लेकिन आज, जब हम इन वादों की कसौटी पर देश को परखते हैं, तो एक असहज करने वाला सवाल बार-बार कौंधता है: क्या हमारा संविधान सचमुच खतरे में है? आइए, इन मोटे-मोटे गूढ़ शब्दों को रोजमर्रा की जिंदगी के बरक्स परखें और देखें कि क्या ये सिर्फ किताबी बातें हैं या इनका हमारे जीवन से गहरा नाता है।
संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न: संप्रभुता पर संदेह की छाया
संप्रभुता संविधान की आत्मा है। यह वह ताकत है, जो हमें बताती है कि हमारा देश न केवल अपनी सीमाओं का मालिक है, बल्कि अपने निर्णयों का भी स्वामी है। लेकिन, जब 2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प हुई और सरकार ने कहा, ‘न कोई घुसा है, न कोई घुसा था,’ तो क्या यह हमारी संप्रभुता पर सवाल नहीं उठाता? जब लद्दाख में अतिक्रमण की खबरें आईं तो सरकार की असमंजस भरी चुप्पी ने लाखों नागरिकों के मन में संदेह पैदा किया।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम उनकी मध्यस्थता से हुआ। वह भी व्यापार न करने की धमकी देकर। उन्होंने एक बार दो बार नहीं अब तक बाइस बार इस दावे को विभिन्न मंचों से दोहराया। हमारी सरकार ने इसका खंडन तक नहीं किया।
क्या यह हमारी स्वतंत्र विदेश नीति पर चोट नहीं? 2023 में जब भारत-चीन सीमा विवाद पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठे और जवाब में केवल खामोशी मिली, तो क्या यह संप्रभुता की रक्षा का भरोसा जगाता है? संप्रभुता केवल भौगोलिक सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भी है। इन घटनाओं से सवाल उठता है: क्या हम इस वादे को निभा पा रहे हैं?
समाजवादी: लोक कल्याणकारी राज्य का पतन
संविधान हमें एक समाजवादी व्यवस्था का वचन देता है, जहां संपत्ति और अवसरों का बंटवारा समानता के सिद्धांत पर हो। लेकिन जब रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, बैंक, बीमा कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एक-एक कर कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के हाथों में चले जाएँ, तो क्या यह समाजवाद की भावना का उल्लंघन नहीं? 2021 में एयर इंडिया का निजीकरण हुआ।
भारत की लाइफ लाइन कहा जाने वाला भारतीय रेल का टुकड़े टुकड़े में निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया हो रही है। पोर्ट से लेकर सार्वजनिक उपक्रम तक एक एक कर बेचा जा रहा है। जब सरकार खुद इन राष्ट्रीय संपत्तियों की ‘सेल्समैन’ बन जाए, तो क्या यह लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना के खिलाफ नहीं?
आज 80 करोड़ से ज्यादा लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। 2024 में बेरोजगारी दर 8.5% तक पहुँच गई, और रोजगार मांग रहे युवाओं पर लाठीचार्ज की घटनाएँ, जैसे 2022 में बिहार में रेलवे भर्ती प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई, आम हो गई हैं। हर वर्ष भारी तादाद में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, वहीं प्राइवेट स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं। जिसकी गुणवत्ता का कोई ठिकाना नहीं है लेकिन आर्थिक शोषण आम है। सरकारी अस्पतालों में मरीज फर्श पर इलाज के लिए मजबूर हैं, जबकि निजी अस्पताल मुनाफाखोरी में डूबे हैं। क्या यह उस समाजवादी भारत का सपना है, जिसका वादा संविधान ने किया था?
धर्मनिरपेक्षता पर बढ़ता संकट
पंथनिरपेक्षता भारत की विविधता की रीढ़ है। लेकिन जब देश के शीर्ष नेता नागरिकों को उनके कपड़ों, धर्म या जाति के आधार पर बांटने वाले बयान देते हैं, तो क्या यह संविधान की भावना का अपमान नहीं? 2024 के लोकसभा चुनावों में “बटेंगे तो कटेंगे” और “एक हैं तो सेफ हैं” जैसे नारे खुले तौर लगाए गए। 2020-21 के किसान आंदोलन में प्रदर्शनकारियों को “खालिस्तानी” कहकर बदनाम किया गया, केवल इसलिए कि वे एक विशेष समुदाय से थे।
चाहे 2022 में कर्नाटक का हिजाब विवाद, जहां स्कूली छात्राओं को उनके पहनावे के आधार पर निशाना बनाने की बात हो लया 2020 के दिल्ली दंगों में धार्मिक आधार पर हिंसा की बात हो या 2023 में हरियाणा के नूंह में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ हों, क्या यह नहीं दिखातीं कि हमारा सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो रहा है? जब एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काया जाता है, तो यह संविधान के उस वादे को नहीं तोड़ता है, जो हर नागरिक को समान सम्मान और सुरक्षा का भरोसा देता है?
लोकतांत्रिक: जनादेश का मखौल
लोकतंत्र का मतलब जनता की चुनी हुई सरकार है। लेकिन जब जोड़-तोड़, धनबल और सत्ताबल से चुनी हुई सरकारें गिरा दी जाती हैं, तो क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं? 2019 में महाराष्ट्र और 2020 में मध्य प्रदेश में विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकारें बदली गईं। 2023 में चंडीगढ़ मेयर चुनाव में कथित हेरफेर ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
जब सत्ता हथियाने के लिए नैतिकता को ताक पर रखा जाता है, तो क्या यह संविधान के लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान नहीं? 2024 में जब विपक्षी नेताओं पर सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर दबाव बनाया गया, तो क्या यह लोकतंत्र की स्वतंत्रता पर चोट नहीं?
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का टूटता वादा
संविधान की प्रस्तावना हमें सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक न्याय का पवित्र वादा देती है। यह वादा वह नींव है, जिस पर हर नागरिक की गरिमा, समानता, और अवसर टिके हैं। लेकिन जब हम इन वादों को आज की हकीकत की कसौटी पर परखते हैं, तो क्या नहीं लगता कि ये वादे खोखले हो चुके हैं?
सामाजिक न्याय: बराबरी का सपना चूर-चूर
सामाजिक न्याय का मतलब है कि हर नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग, या समुदाय से हो, वह सम्मान और समानता का हकदार है। लेकिन, जब 2023 में मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक व्यक्ति पर पेशाब करने की घृणित घटना सामने आती है, केवल इसलिए कि वह एक विशेष समुदाय से था, तो क्या यह सामाजिक न्याय का मखौल नहीं?
यह अकेली घटना नहीं। 2022 में उत्तर प्रदेश के औरैया में एक दलित व्यक्ति को जूतों की माला पहनाने की घटना और 2024 में राजस्थान में एक आदिवासी युवक की पिटाई की खबरें क्या यह नहीं दिखातीं कि हमारे समाज में कुछ लोग दूसरों को इंसान मानने को तैयार नहीं?
जब मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगे, स्कूलों में बच्चों को उनकी जाति के आधार पर अलग बैठाया जाए, या नौकरियों में ‘नॉट फाउंड सूटेबल’ कहकर आरक्षित पद खाली रखे जाएँ, तो क्या यह संविधान के सामाजिक न्याय के वादे का उल्लंघन नहीं? संविधान कहता है कि हर व्यक्ति की गरिमा अक्षुण्ण है, लेकिन जब जाति, धर्म, या लिंग के आधार पर भेदभाव रोज की हकीकत बन जाए, तो क्या यह नहीं मानना चाहिए कि सामाजिक न्याय खतरे में है?
आर्थिक न्याय: अमीरी-गरीबी की गहराती खाई
आर्थिक न्याय का वादा है कि देश की संपत्ति और अवसर कुछ मुट्ठीभर लोगों तक सीमित नहीं रहेंगे। लेकिन जब एक नागरिक की शादी का जश्न महीनों तक देश की सुर्खियाँ बटोरे, और उसी देश में उत्तर प्रदेश के एक गाँव में बच्चा भूख से मर जाए, तो क्या यह आर्थिक न्याय का पतन नहीं? 2024 में ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 1% आबादी के पास देश की 40% से ज्यादा संपत्ति है, जबकि 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हैं।
चाहे सरकारी क्षेत्र में पदों की कटौती की बात हो, मनरेगा के बजट में कटौती की बात हो या गरीबों के लिए अवसरों को सीमित करने की बात हो। नीतियां ऐसे बनाई जा रही हैं जैसे इस यह देश अब गरीबों का नहीं रहा। क्या यह उस लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना का अवहेलना नहीं, जिसका सपना संविधान ने देखा था?
राजनीतिक न्याय: वोट और आवाज का दमन
राजनीतिक न्याय का मतलब है कि हर नागरिक को वोट देने, चुनाव लड़ने, और अपनी आवाज उठाने का समान अधिकार हो। कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को वोट देने से रोका जाता है, जैसा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ गाँवों में दर्ज शिकायतों से पता चलता है, तो क्या यह राजनीतिक न्याय की हत्या नहीं?
जब विपक्षी नेताओं पर सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर दबाव बनाया जाता है, जैसे 2023 में कई विपक्षी नेताओं पर ईडी-सीबीआई की कार्रवाइयाँ, तो क्या यह लोकतंत्र की स्वतंत्रता पर चोट नहीं? 2019 में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद वहाँ के स्थानीय नेताओं को लंबे समय तक नजरबंद रखा गया, और 2024 तक वहाँ पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल नहीं हुई। जब सत्ता के लिए जोड़-तोड़ से सरकारें गिराई जाएं, जैसे 2019 में महाराष्ट्र और 2020 में मध्य प्रदेश में हुआ, तो क्या यह जनादेश का अपमान नहीं? संविधान कहता है कि हर नागरिक की आवाज मायने रखती है, लेकिन जब उस आवाज को दबाया जाए, तो क्या यह नहीं मानना चाहिए कि राजनीतिक न्याय खतरे में है?
न्याय की रक्षा: हमारी जिम्मेदारी
सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक न्याय संविधान के तीन मजबूत खंभे हैं। लेकिन जब ये खंभे डगमगाने लगें जब एक व्यक्ति की गरिमा को कुचला जाए, जब धन कुछ हाथों में सिमट जाए, जब वोट और आवाज को दबाया जाए, तो संविधान का वह सपना खतरे में पड़ जाता है। यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है कि इन वादों को जीवित रखें।
संविधान हमारे साझा सपनों का प्रतीक है
इन सवालों पर देश के नागरिकों को तटस्थ होकर सोचना होगा। उन सवालों के जवाब से ही तय होगा कि हमारा देश समाज किस ओर जाएगा। इन सवालों का सही जवाब ही बता पाएगा कि संविधान खतरे में है या ये महज एक शिगूफा है। इस सवाल का जवाब ही सच्चे मायने में ढूंढना ही देश प्रेम है।

राष्ट्रीय महासचिव,
युवा हल्ला बोल
नोट: यह लेखक के अपने विचार हैं।



