नई दिल्ली: राज्यों के बीच आपसी समझ बढ़ाने, अंतरराज्यीय विवादों में तालमेल बिठाने व केंद्र के साथ कदमताल करने के मकसद से क्षेत्रीय परिषदें बनाई गईं। यह वैधानिक निकाय हैं। संविधान में इनका कोई प्रावधान नहीं है। इनका गठन राज्य पुनर्गठन आयोग-1956 यानि फजल अली आयोग की सिफारिश से हुआ है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसका प्रस्ताव आयोग के सामने रखा था। शुरुआत में इनकी संख्या पांच थी। 1972 में उत्तर पूर्वी भारत के लिए अलग से पूर्वोत्तर परिषद का गठन हुआ।
क्षेत्रीय परिषदों की सिफारिशों की प्रकृति सलाहकारी है। फिर भी, बातचीत, सुलह-समझौते का मंच बनीं परिषदें सहकारी संघवाद को बढ़ावा देती हैं। इसमें केंद्र के साथ संबंधित क्षेत्रीय परिषद के मुख्यमंत्री व आला अधिकारी बैठते हैं। बीते करीब 11 सालों में इनकी 61 बैठकें हुई हैं।
क्षेत्रीय परिषदों का ढांचा
पूर्वोत्तर परिषद समेत सभी क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं। वहीं, उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी क्रमश: हर सदस्य राज्य के मुख्यमंत्री की होती है। साल के क्रम के अनुसार इनको चुना जाता है। जबकि सदस्यों में संबंधित राज्य व केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल या प्रशासक शामिल हैं। इसके अलावा हर राज्य का राज्यपाल दो मंत्रियों को परिषद के लिए नामित करता है। नीति आयोग से नामित एक व्यक्ति के साथ सदस्य राज्यों के मुख्य सचिव व विकास आयुक्त सलाहकार की भूमिका में होते हैं।
इसके अलावा हर क्षेत्रीय परिषद की एक स्थाई समिति होती है। इसमें संबंधित राज्यों के मुख्य सचिव शामिल होते हैं। राज्यों की तरफ से प्रस्तावित मसलों पर पहले इसी समिति में चर्चा होती है। फिर, अनसुलझे मसले आगे विमर्श के लिए क्षेत्रीय परिषद में आते हैं।
क्षेत्रीय परिषद के सदस्यों को जानिए
- उत्तर क्षेत्रीय परिषद: हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख।
- मध्य क्षेत्रीय परिषद: यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद: बिहार, झारखंड, उड़ीसा व पश्चिम बंगाल
- पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद: गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, दमन-दवी व दादरा एवं नगर हवेली।
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, पुद्दूचेरी।
- उत्तर पूर्वी परिषद: सिक्किम, असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय व त्रिपुरा।
मंगलवार 25 जून… मध्य क्षेत्र परिषद की 25वीं बैठक काशी में
अमित शाह ने कहा कि पीएम मोदी के सांसद बनने के बाद काशी विश्व की सबसे पौराणिक नगरी होने के साथ ही अब विकास की नगरी की भी पहचान बना चुकी है। पीएम मोदी के 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लक्ष्य को हासिल करने में मध्य क्षेत्रीय परिषद के राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह परिषद ही इकलौती ऐसी क्षेत्रीय परिषद है, जहां दो सदस्य राज्यों के बीच किसी तरह की कोई समस्या या विवाद नहीं है।
दस सालों में बैठक की संख्या बढ़ी
गृह मंत्री ने बताया कि 2004-14 तक जोनल कौंसिल के सिर्फ 11 मीटिंग और स्टैंडिंग कमिटी ऑफ जोनल कौंसिल की सिर्फ 14 मीटिंग हुई थी। वहीं, 2014-25 में यह आंकड़े 28 और 33 हुए हैं। बैठकों की संख्या में करीब दो गुनी वृद्धि है। अब तक इन बैठकों में 1,287 मुद्दों का समाधान निकाला गया है।
राज्य पंचायतों का बढ़ाएं राजस्व
गृह मंत्री सदस्य राज्यों की ग्राम पंचायतों का राजस्व बढ़ाने और इसके लिए नियम बनाने को कहा। पंचायतों का राजस्व बढ़ने से ही भारत की त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक पंचायती राज व्यवस्था और अधिक कारगर होगी।
बैठक में इनकी रही मौजूदगी

केंद्रीय गृह मंत्री के साथ बैठक में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी, एमपी के मुख्यमंत्री मोहन यादव और छत्तीसगढ़ के विष्णु देव साय ने भाग लिया। इसमें सदस्य राज्यों के वरिष्ठ मंत्री, केन्द्रीय गृह सचिव, अंतर-राज्य परिषद सचिवालय के सचिव, सदस्य राज्यों के मुख्य सचिव और राज्यों तथा केन्द्रीय मंत्रालयों एवं विभागों के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। बैठक की शुरुआत में गृह मंत्री समेत सभी मुख्यमंत्री एवं सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति और भारतीय सशस्त्र सेनाओं के पराक्रम के अभिनंदन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसका परिषद ने ध्वनिमत से अनुमोदन किया।
इन मुद्दों पर हुई चर्चा
- महिलाओं व बच्चों के खिलाफ दुष्कर्म के मामलों की त्वरित जांच और इनके शीघ्र निपटान के लिए फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (FTSC) का कार्यान्वयन।
- हर गांव के नियत दायरे में ब्रिक-एंड-मोर्टार बैंकिंग सुविधा।
- आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ERSS-112) का कार्यान्वयन।
- बच्चों में कुपोषण दूर करना सुनिश्चित हो।
- ड्रॉप-आउट रेश्यो हो जीरो।
- सहकारिता को सुदृढ़ बनाना सुनिश्चित करें।

