नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने गुरुवार को जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से आठ सप्ताह में जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
क्या है मामला
यह याचिका कॉलेज शिक्षक जहूर अहमद भट और कार्यकर्ता खुरशीद अहमद मलिक ने दायर की है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा न होना वहां के नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर रहा है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि केंद्र सरकार जल्द से जल्द जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दे और वहां पूर्ण लोकतांत्रिक ढांचा बहाल करे।
कोर्ट में क्या हुआ
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दिसंबर 2023 के फैसले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस फैसले में SC ने केंद्र सरकार के आश्वासन पर भरोसा करते हुए राज्य के दर्जे पर कोई फैसला नहीं दिया था। उन्होंने यह भी बताया कि उस फैसले को आए 21 महीने हो चुके हैं, लेकिन राज्य का दर्जा अब तक बहाल नहीं हुआ है।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चुनावों के बाद राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस मुद्दे पर अभी सुनवाई नहीं होनी चाहिए। इसी दौरान, कोर्ट ने अप्रैल महीने में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। तुषार मेहता ने जवाब देने के लिए आठ सप्ताह का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए कहा कि इस याचिका पर सरकार का पक्ष सुना जाएगा और मामले को आठ हफ्ते बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
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राजनीतिक प्रतिक्रिया
यह मुद्दा पहले भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में कहा था कि केंद्र शासित प्रदेश को राज्य का दर्जा बहाल करना एक “आवश्यक सुधार” है, और यह सिर्फ क्षेत्रीय हितों का मुद्दा नहीं है।
आपको बता दें कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया था। तभी से इस फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।



