नई दिल्ली: SC ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बच्चों के आपसी झगड़े में किसी वयस्क द्वारा उन्हें “झटका” देना या मामूली शारीरिक संपर्क करना बाल उत्पीड़न या बाल दुर्व्यवहार नहीं है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि बाल दुर्व्यवहार का अपराध होने के लिए नुकसान पहुँचाने, क्रूरता करने, या शोषण का स्पष्ट इरादा होना जरूरी है।
क्या था पूरा मामला
यह फैसला 12 साल पुराने एक मामले, ‘संतोष सहदेव खजनेकर बनाम गोवा राज्य’, की सुनवाई के दौरान आया है।
- घटना: फरवरी 2013 में गोवा के एक स्कूल में बच्चों के बीच हाथापाई हुई थी। आरोप था कि एक व्यक्ति (अभियुक्त) ने अपने बेटे के झगड़े में दखल देते हुए दूसरे बच्चे को उसके स्कूल बैग से मारा, जिससे उसे मामूली चोटें आईं।
- निचली अदालत का फैसला: निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के अलावा गोवा बाल अधिनियम की धारा 8(2) के तहत बाल उत्पीड़न का दोषी ठहराया और उसे एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
- हाई कोर्ट का फैसला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2022 में सजा तो कम कर दी, लेकिन दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसला
आरोपी ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की समीक्षा की और पाया:
- इरादा महत्वपूर्ण: पीठ ने कहा कि बाल दुर्व्यवहार का अपराध जानबूझकर और स्पष्ट इरादे से जुड़ा होना चाहिए, न कि बच्चों के झगड़े में हुए किसी आकस्मिक या क्षणिक कृत्य से।
- अपराध की परिभाषा: सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बाल दुर्व्यवहार की परिभाषा में जानबूझकर क्रूरता, शोषण, या लगातार दुर्व्यवहार शामिल होता है। बिना किसी इरादे के सिर्फ एक बार बैग से मारने की घटना को इस गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
- दोषसिद्धि रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को पलटते हुए आरोपी की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चोटें गिरने से भी आ सकती हैं, और अधिनियम का उद्देश्य क्रूरता जैसे गंभीर कृत्यों से निपटना है, न कि ऐसे छोटे-मोटे झगड़ों से।
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इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि बच्चों से जुड़े मामलों में किसी भी कार्रवाई को बाल दुर्व्यवहार मानने से पहले उसके पीछे के इरादे और कृत्य की गंभीरता को ध्यान में रखना आवश्यक है।



