नई दिल्ली। क्लाइमेट चेंज, भूविज्ञान, सिस्टम इंजीनियरिंग और ह्यूमन इंपैक्ट के क्षेत्र में रिसर्च पर भारत की पकड़ मजबूत होगी। इसके लिए सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं। इनमें अहम है आर्कटिक रिसर्च के लिए ध्रुवीय अनुसंधान पोत (Polar Research Vessel )। ध्रुवीय अभियानों और अनुसंधान गतिविधियों में सहायता के लिए व्यय विभाग (डीओई) ने हाल ही में पीआरवी के अधिग्रहण के लिए 2329.40 करोड़ रुपये के संशोधित लागत मंजूरी दी है।
2030 तक मिल जाएगा पीआरवी
राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि पीआरवी के अधिग्रहण की समय-सीमा 2025-26 से 2029-30 तक है। पहले जारी किया गया टेंडर रद्द कर दिया गया था। दरअसल, जहाज निर्माता ने अनुबंध की शर्तों में ऐसे बदलाव की मांग की थी जो स्वीकार्य नहीं थे। पीआरवी का संशोधित लागत अनुमान भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय (आईएमयू) के माध्यम से तैयार किया गया था। जहाजरानी मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इसके बाद पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) ने 2024 में संवर्धित अनुमानों की लागत-युक्ति की जांच और मूल्यांकन करने तथा संशोधित लागत अनुमानों की सिफ़ारिश करने के लिए संशोधित लागत समिति (आरसीसी) का गठन किया। आरसीसी ने कुल परियोजना लागत ₹2329.40 करोड़ आंकी और उसे अनुमोदित किया।
अंटार्कटिका के लिए अभियान वार्षिक रूप से किराए पर लिए गए आइस-क्लास जहाजों के उपयोग के माध्यम से निर्बाध रूप से जारी रहे हैं जिसमें रसद सहायता और संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधान शामिल हैं। वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार, संशोधित समय-सीमा 2025-26 से 2029-30 है। अवधारणा डिजाइन और विनिर्देश पहले ही पूरे हो चुके हैं। देश भर के विशेषज्ञों वाली परियोजना निगरानी और समन्वय समिति (पीएमसीसी) इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं के बीच तालमेल सुनिश्चित करते हुए मार्गदर्शन प्रदान करती है।
कितना जरूरी है यह पोत
- यह पोत भारत के ध्रुवीय अनुसंधान स्टेशनों के कार्यों को मजबूत करेगा। यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु परिवर्तन, जैसे वैश्विक मुद्दों पर गहन अध्ययन को सक्षम बनाएगा।
- कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा निर्मित यह पोत भारत की जहाज निर्माण क्षमताओं को प्रदर्शित करेगा। यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देगा और स्वदेशी तकनीकी विकास को प्रोत्साहित करेगा।
- स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला, रोजगार सृजन करेगा और भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र को ग्लोबल लेवल पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
- पोत भारत के ‘सागर’ और ‘महासागर’ विजन को साकार करेगा। यह भारत की समुद्री रणनीति को मजबूत करेगा और क्षेत्रीय सुरक्षा व आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देगा।
क्या होती है क्षमता
यह ऐसा पोत हैं कि जो उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव के आसपास के क्षेत्र, जैसे- आर्कटिक व अंटार्कटिका) और समुद्री वातावरण में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपयोग किया जाता है। अत्यधिक ठंड, बर्फीले क्षेत्र और तूफानी समुद्र में इससे काफी सहयोग मिलेगा।
नार्वे से समझौता
इससे पहले बीते चार जून, मंगलवार को भारत ने नार्वे के साथ एक समझौता किया। इसके तहत भारत पहला अनुसंधान पोत बनाएगा। समझौता कोलकाता की गार्डन रीच कंपनी शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड और नार्वे की कांग्सबर्ग समूह के बीच हुआ।



