पानी में आर्सेनिक कम करने से मौत का खतरा 50% कम

यह खुलासा कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेलमैन पब्लिक हेल्थ स्कूल और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के 20 साल शोध करने के बाद किया । आर्सेनिक मुक्त पानी से पुराने संपर्क का नुकसान भी धीरे-धीरे कम हो सकता है।

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नई दिल्ली: दुनियाभर में, खासकर एशिया के कुछ हिस्सों में भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। यह एक प्राकृतिक तत्व है जो पानी में घुलकर बिना किसी स्वाद या रंग के घातक बन जाता है। लंबे समय तक इसका सेवन करने से कैंसर, हृदय रोग और त्वचा की समस्याएं जैसी बीमारियां हो सकती हैं। लेकिन एक ताजा शोध ने उम्मीद की किरण जगाई है, अगर दूषित पानी को छोड़कर साफ पानी का इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए, तो मौत का खतरा आधा हो सकता है, भले ही सालों से एक्सपोजर रहा हो। यह खुलासा कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेलमैन पब्लिक हेल्थ स्कूल और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के 20 साल के मेहनताने शोध से हुआ है। जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) में छपी इस रिपोर्ट को विशेषज्ञ अब तक का सबसे ठोस प्रमाण मान रहे हैं। अमेरिका से लेकर भारत और बांग्लादेश तक, करोड़ों लोग ऐसे पानी पर निर्भर हैं जहां आर्सेनिक की मात्रा डब्ल्यूएचओ की 10 माइक्रोग्राम/लीटर की सीमा से ज्यादा है। बांग्लादेश में तो यह समस्या इतनी विकराल है कि इसे ‘मानव इतिहास की सबसे बड़ी जहर महामारी’ कहा जाता है।

अध्ययन की गहराई: 11,000 लोगों पर 20 साल की निगरानी

शोधकर्ताओं ने बांग्लादेश के अराईयाज़ इलाके में करीब 11,000 वयस्कों को चुना, जहां ट्यूबवेल ही पेयजल का मुख्य स्रोत हैं। इन कुओं में आर्सेनिक का स्तर जगह-जगह अलग-अलग था। कहीं न के बराबर, तो कहीं घातक स्तर पर। टीम ने 10,000 से ज्यादा कुओं की टेस्टिंग की, प्रतिभागियों के यूरिन सैंपल्स को बार-बार चेक किया और पूरे 20 साल तक उनकी हेल्थ ट्रैक की। मौत के कारणों को भी रिकॉर्ड किया गया। यूरिन टेस्ट इसलिए खास है क्योंकि यह बॉडी में जमा असली आर्सेनिक को मापता है, न कि सिर्फ पानी के सैंपल को।

चौंकाने वाले निष्कर्ष: जोखिम में तेज गिरावट

अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आर्सेनिक-मुक्त पानी अपनाने से मृत्यु दर में 50% तक कमी आ सकती है। जो लोग हाई-लेवल वाले कुओं से स्विच करके लो-लेवल वाले कुओं पर आए, उनके रिस्क में इतनी तेज कमी आई कि यह उन लोगों जितना ही हो गया, जो कभी हाई एक्सपोजर में नहीं रहे। शोधकर्ता इसे स्मोकिंग छोड़ने से तुलना करते हैं । धीरे-धीरे बॉडी रिकवर करती है और खतरा कम होता जाता है।

कमी का राज: जागरूकता और सरकारी प्रयास

पिछले दो दशकों में बांग्लादेश सरकार और एनजीओ ने कैंपेन चलाए। कुओं को रेड (असुरक्षित) और ग्रीन (सुरक्षित) से मार्क किया, नए डीप ट्यूबवेल लगाए। नतीजा? लोगों के इस्तेमाल वाले कुओं में आर्सेनिक 70% घटा, और बॉडी में इसकी मात्रा 50% कम हो गई। यही वजह बनी मौतों में कमी की। विशेषज्ञ कहते हैं, साफ पानी न सिर्फ नई बीमारियां रोकता है, बल्कि पुराने डैमेज को भी ठीक करने में मदद करता है।” 20 साल बाद डेटा देखकर शोधकर्ताओं को लगा कि यह सिर्फ बांग्लादेश नहीं, ग्लोबल हेल्थ के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहा है।

दो बड़े सबक: देर कभी नहीं होती

यह रिसर्च दो अहम बातें सिखाती है:

  • रिकवरी संभव है, लंबे एक्सपोजर के बाद भी स्विच करने से फायदा मिलता है।
  • समुदायिक निवेश कारगर सुरक्षित पानी की सुविधा से पूरी जनरेशन को फायदा, और रिजल्ट जल्दी दिखते हैं।

बांग्लादेश जैसे देशों में, जहां अभी भी लाखों असुरक्षित कुओं पर निर्भरता है, यह स्टडी पॉलिसी मेकर्स के लिए रोडमैप है। सही जागरूकता, टेक्नोलॉजी और एक्सेस से लाखों जिंदगियां बच सकती हैं।

नया ऐप: ‘नलकूप’ से आसान पहुंच

  • शोधकर्ताओं ने बांग्लादेश गवर्नमेंट के साथ ‘नलकूप’ ऐप लॉन्च किया है, जो:
  • लाखों कुओं के आर्सेनिक डेटा शो करता है।
  • यूजर्स को नजदीकी सेफ कुओं की लोकेशन बताता है।
  • अफसरों को हॉटस्पॉट्स आईडेंटिफाई करने में मदद करता है, जहां नए कुएं लगाने की जरूरत है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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