नई दिल्ली: वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट के एक गंभीर रूप से संकटग्रस्त पेड़, डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी, पर एक नए और खतरनाक फफूंद (Fungus) रोग की चेतावनी दी है। शोध के अनुसार, कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला नामक यह फफूंद एक अत्यधिक आक्रामक रोगजनक है, जो 530 से अधिक पौधों की प्रजातियों को प्रभावित करने के लिए जाना जाता है। यह पहली बार है जब इस फफूंद को डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी को नुकसान पहुंचाते हुए दर्ज किया गया है, जिससे इस प्रजाति के संरक्षण को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ गई हैं।
फफूंद की पहचान और प्रभाव
इस रोगजनक की पहचान मॉर्फो-कल्चरल लक्षणों और आणविक फायलोजेनेटिक विश्लेषण के आधार पर की गई है। यह फफूंद डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी की नई पत्तियों में धब्बे (लीफ स्पॉट) और झुलसा (ब्लाइट) रोग का कारण बन रही है। यह खोज पश्चिमी घाट के वर्षावनों में इस संवेदनशील प्रजाति की सुरक्षा के लिए तत्काल रोग निगरानी और संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी का महत्व
डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी, डिप्टेरोकार्पेसी परिवार से संबंधित, एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में शामिल किया गया है। यह पेड़ पश्चिमी घाट के वर्षावनों में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी मजबूत लकड़ी का उपयोग निर्माण और फर्नीचर बनाने में होता है, जबकि इसका तेल पारंपरिक चिकित्सा और औद्योगिक कार्यों में प्रयुक्त होता है। अत्यधिक दोहन और आवास हानि के कारण यह प्रजाति पहले से ही खतरे में है, और अब यह नया जैविक खतरा इसके अस्तित्व के लिए और बड़ा संकट पैदा कर रहा है।
शोध और आणविक विश्लेषण
माइकोस्फीयर जर्नल में प्रकाशित इस शोध में केरल के डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी पर कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला के प्रभाव का अध्ययन मॉर्फो-मॉलिक्यूलर तकनीकों के माध्यम से किया गया। आणविक विश्लेषण ने रोगजनक की सटीक पहचान सुनिश्चित की, जो पारंपरिक आकृति-आधारित विधियों की कमियों को दूर करता है। यह पहचान रोग के प्रबंधन और निगरानी में सहायक होगी, साथ ही इस दुर्लभ प्रजाति की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने में भी मदद करेगी।
फफूंद का प्रसार और प्रभाव
कोरीनेस्पोरा कैसिइकोला एक फाइटोपैथोजेन है, जो रबर, सोयाबीन, टमाटर, खीरा और कपास जैसी महत्वपूर्ण फसलों के साथ-साथ औषधीय और सजावटी पौधों को प्रभावित करता है। यह फफूंद गर्म और नम जलवायु में तेजी से फैलती है और हवा, पानी, या मानव गतिविधियों के माध्यम से अपने बीजाणुओं (कोनिडिया) के जरिए प्रसारित होती है। यह रोग पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण को बाधित करता है, जिससे पत्तियां झड़ जाती हैं, पेड़ कमजोर हो जाता है, और गंभीर मामलों में पेड़ की मृत्यु हो सकती है।
संरक्षण की जरूरत
शोध में इस बात पर जोर दिया गया है कि डिप्टेरोकार्पस बौर्डिलोनी जैसे दुर्लभ पेड़ों को बचाने के लिए तत्काल संरक्षण उपायों की आवश्यकता है। रोग निगरानी, प्रभावी प्रबंधन रणनीतियां, और आवास पुनर्जनन जैसे कदम इस प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने में महत्वपूर्ण होंगे। यह शोध पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने और जैव विविधता को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।



