नई दिल्ली: धरती के उत्तरी हिस्सों और ऊंचे पर्वतीय इलाकों में छिपा एक बड़ा रहस्य अब खुलकर सामने आ रहा है, पर्माफ्रॉस्ट। यह वह जमीन है जो सालों-साल बर्फ की चादर में लिपटी रहती है, लेकिन अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यह पिघल रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रक्रिया न सिर्फ पर्यावरण (Climate Change) को प्रभावित कर रही है, बल्कि पूरी दुनिया की जलवायु को और भी खतरनाक मोड़ पर ले जा सकती है। एक ताजा रिसर्च में पता चला है कि पर्माफ्रॉस्ट में दबे हुए कार्बन के भंडार अगर रिलीज होने लगे, तो यह हमारे ग्रह के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।
पर्माफ्रॉस्ट क्या है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
पर्माफ्रॉस्ट वो मिट्टी की परत है जो कम से कम दो साल तक पूरी तरह जमी रहती है। यह मुख्य रूप से आर्कटिक क्षेत्रों और हिमालय जैसे ऊंचे पहाड़ों में फैली हुई है, जो धरती की कुल जमीन का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा कवर करती है। इसमें दुनिया की मिट्टी में मौजूद कार्बन का एक तिहाई हिस्सा कैद है। यह कार्बन प्राचीन पौधों और जीवों के अवशेषों से बना है, जो सदियों से जमा हुआ है। जब तक यह जमा रहता है, सब ठीक है, लेकिन जैसे ही तापमान बढ़ता है, यह पिघलने लगता है और समस्या शुरू हो जाती है।
पिघलने से निकलने वाले खतरे: ग्रीनहाउस गैसों का ज्वालामुखी
जब पर्माफ्रॉस्ट पिघलती है, तो उसमें बंद ऑर्गेनिक मैटर सड़ने लगता है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4) और नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) जैसी गैसें निकलती हैं। CO2 तो आम है, लेकिन मीथेन CO2 से 28 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करता है, जबकि N2O का असर 273 गुना अधिक है। अगर ये गैसें बड़ी मात्रा में वातावरण में फैल गईं, तो यह एक ‘टिपिंग पॉइंट’ साबित हो सकता है – यानी जलवायु में ऐसे बदलाव जो वापस नहीं लौटाए जा सकते। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इससे ग्लोबल वार्मिंग की स्पीड दोगुनी हो सकती है।
नई स्टडी की चौंकाने वाली खोजें
- चीन की एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ एटमोस्फियरिक फिजिक्स के शोधकर्ताओं ने हाल ही में ‘साइंस एडवांस’ जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। उन्होंने उत्तरी गोलार्ध के पर्माफ्रॉस्ट इलाकों से 1,090 से ज्यादा प्रयोगों के डेटा का विश्लेषण किया। फोकस था CO2, CH4 और N2O के उत्सर्जन पर।
- आर्कटिक इलाके में क्या हो रहा है? यहां की मिट्टी नम और वनस्पतियों से भरी है। अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, तो पौधे ज्यादा CO2 सोखने लगते हैं, जिससे कार्बन सिंक की क्षमता बढ़ती है। लेकिन साथ ही, पानी वाली मिट्टी से मीथेन का रिसाव तेज हो जाता है। यानी फायदा भी है और नुकसान भी – मीथेन का खतरा यहां सबसे बड़ा है।
- ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की हालत बदतर: अल्पाइन पर्माफ्रॉस्ट में मिट्टी पहले से ही सूखी है। वार्मिंग से यह और सूखती है, पौधों की ग्रोथ रुक जाती है और CO2 सोखने की क्षमता कम हो जाती है। नतीजा? मिट्टी से ज्यादा कार्बन निकलता है, और यह इलाका तेजी से कार्बन सोर्स बन रहा है।
- दोनों क्षेत्रों में N2O का उत्सर्जन बढ़ रहा है। भले ही इसकी मात्रा कम हो, लेकिन इसका प्रभाव इतना मजबूत है कि यह जलवायु को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। पिघलने से मिट्टी में नाइट्रोजन ज्यादा उपलब्ध होता है, जो N2O को और बढ़ावा देता है।
क्या कर सकते हैं हम? जलवायु नीतियों की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर हम ग्लोबल तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रख पाए, तो पर्माफ्रॉस्ट को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। लेकिन अल्पाइन इलाकों पर तुरंत ध्यान देना होगा, क्योंकि ये ज्यादा कमजोर हैं। यह स्टडी IPCC की उन रिपोर्टों को सपोर्ट करती है जो कहती हैं कि पर्माफ्रॉस्ट और कार्बन साइकिल के बीच का लिंक जलवायु की सबसे बड़ी अनसर्टेन्टी है।
आखिरी शब्द: समय रहते जागें
पर्माफ्रॉस्ट को एक सोते हुए ज्वालामुखी की तरह समझिए – शांत रहते हुए सुरक्षित, लेकिन जागते ही विनाशकारी। अगर हम अब नहीं चेते, तो अरबों टन कार्बन और गैसें हवा में मिलकर जलवायु संकट को अनकंट्रोल कर देंगी। दुनिया भर के देशों को पेरिस समझौते को सख्ती से लागू करना होगा, उत्सर्जन कम करना होगा और रिन्यूएबल एनर्जी पर फोकस करना होगा। वरना, आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। क्या आप तैयार हैं इस चुनौती से निपटने के लिए?



