नई दिल्ली: आकाश के बाद भारत ने अब पाताल में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। दो जलयात्रियों (Aquanauts) कमांडर जतिंदर पाल सिंह और राजू रमेश ने अटलांटिक महासागर में 5000 मीटर गहराई तक गोता लगाया। ऐसी उपलब्धि पहली बार देश ने हासिल की है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि 5 और 6 अगस्त को दो भारतीय जलयात्रियों ने समुद्र में 4,025 और 5,002 मीटर की गहराई तक समुद्र में सफलतापूर्वक अभियान चलाए।
एक्वॉनॉट राजू रमेश और जतिंदर पाल ने लगभग सात घंटे की कुल अवधि के लिए पहला गोता पूरा किया। डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि भारत अब आधा दर्जन से भी कम देशों के उस विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है जिसने समुद्र में इतनी गहराई तक जाने का साहस किया है। यह अभियान फ्रांसीसी समुद्री अनुसंधान संस्थान के साथ सहयोगी वैज्ञानिक गतिविधि के रूप में आईएफआरईएमईआर के पनडुब्बी नौटाइल के जरिये चला। यह भारत के समुद्रयान मिशन के तहत प्रारंभिक कार्य की प्रस्तावना है जिसका उद्देश्य 2027 तक स्वदेशी रूप से विकसित पनडुब्बी मत्स्य-6000 में तीन जलयात्रियों को 6,000 मीटर की गहराई तक भेजना है।
टूटा रिकॉर्ड
इससे पहले सीएसआईआर-एनआईओ के भारतीय वैज्ञानिकों ने 1997 और 2002 में क्रमशः एल्विन (अमेरिका) और नौटाइल (फ्रांस) पनडुब्बियों में 3,800 मीटर और 2,800 मीटर तक गोता लगाया था।
आकाश-पाताल एक
समुद्रयान सरकार के प्रमुख डीप ओशन मिशन का हिस्सा है जिसे गहरे समुद्र के संसाधनों की खोज और उनके निरंतर दोहन के लिए शुरू किया गया है। डॉ. जितेन्द्र सिंह ने बताया कि यह उपलब्धि भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के एएक्सआईओएम-4 मिशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर सफलतापूर्वक पहुंचने और वहां से लौटने के चार हफ़्ते बाद आई है।
ब्लू इकॉनमी होगी मजबूत
पांच हजार मीटर गहराई तक पहुंच से भारत की ब्लू इकॉनमी मजबूत हो गई। भारत ने 4,000 से 5,500 मीटर की गहराई पर गहरे समुद्र में खनिजों की खोज के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ पहले ही अनुबंध कर चुका है। 11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा और विशाल विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के साथ भारत में सजीव और निर्जीव दोनों प्रकार के समुद्री संसाधनों की तमाम संभावनाएं हैं। नीली अर्थव्यवस्था के विकास के माध्यम से इन संसाधनों की खोज और दोहन के लिए ठोस प्रयास किए जा सकते हैं।
मत्स्य-6000 विकसित करना है लक्ष्य
समुद्र में गोते लगाने वाले दोनों जलयात्री राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) चेन्नई से हैं। यह संस्थान पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन आता है। इसे मत्स्य-6000 विकसित करने का दायित्व सौंपा गया है। इस पनडुब्बी के साथ भारत दुनिया का छठा ऐसा देश बन जाएगा जिसने अपनी स्वयं की गहरे समुद्र में मानव निर्मित पनडुब्बी विकसित की है। मत्स्य-6000 अपनी तरह का पहला है जिसे चौथी पीढ़ी की वैज्ञानिक पनडुब्बी-12 घंटे की परिचालन क्षमता और 96 घंटे तक की आपातकालीन क्षमता के लिए तैयार किया गया है। इसमें अत्याधुनिक प्रणालियां हैं, जैसे उच्च-घनत्व वाली ली-पो बैटरी, पानी के भीतर ध्वनि संबंधी टेलीफोन, ड्रॉप-वेट आपातकालीन बचाव तंत्र, और चालक दल की सुरक्षा और स्वास्थ्य निगरानी के लिए बायो-वेस्ट।



