नागपुर : महाराष्ट्र में नागपुर स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कन्वेंशन सेंटर में ‘अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महिला सम्मेलन’ का ऐतिहासिक आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
महाराष्ट्र की युवा बौद्ध महिलाओं के एक समूह द्वारा आयोजित इस सम्मेलन ने बौद्ध समाज में महिलाओं की भूमिका, उनके अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर एक नई वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया है।
भिक्खुनी संघ का संघर्ष और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में बौद्ध धम्म के प्रारंभिक काल से लेकर वर्तमान तक महिलाओं की स्थिति पर गंभीर विमर्श हुआ। भिक्खुनी विजया मैत्रीय ने “भिक्खुनी संघ की स्थापना: चुनौतियां और संघर्ष” विषय पर अपने विचार रखे।
उन्होंने “मार याचना कथा” का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि बुद्ध ने कभी भी भिक्खुनी संघ की स्थापना को सीधे तौर पर अस्वीकार नहीं किया था, बल्कि यह कदम उस युग में लैंगिक समानता की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल थी।
वहीं, भंते सुनीति भिक्खुनी ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे समय के साथ रूढ़िवादी परंपराओं और भेदभावपूर्ण कर्मकांडों ने भिक्खुनियों को हाशिए पर धकेल दिया।
उन्होंने बुद्ध काल से लेकर आधुनिक समय तक पूर्ण दीक्षा प्राप्त करने के लिए महिलाओं द्वारा किए जा रहे निरंतर संघर्ष पर प्रकाश डाला।
पितृसत्ता को चुनौती और समावेशी समाज का आह्वान
सम्मेलन का मुख्य केंद्र बिंदु लैंगिक समानता, शिक्षा और निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी रहा। चर्चा के दौरान उन पितृसत्तात्मक संरचनाओं और परंपराओं को स्पष्ट रूप से खारिज किया गया जो महिलाओं की प्रगति में बाधक हैं।
वक्ताओं ने आह्वान किया कि विहारों और अन्य बौद्ध संस्थाओं में मौजूद किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना एक सच्चे बौद्ध समाज की नींव के लिए अनिवार्य है।
एकजुटता और सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन
इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर विभिन्न देशों की महिला विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उपासिकाओं ने हिस्सा लिया। यह आयोजन न केवल चर्चा तक सीमित रहा, बल्कि इसने बौद्ध आंदोलन में महिलाओं की सक्रियता को एक नई दिशा प्रदान की।
मृणाल माधुरी मिलिंद, दीप्ति किरतकर, जागृति मेश्राम और उनकी टीम के नेतृत्व में हुए इस सफल संचालन ने नई पीढ़ी की महिलाओं में आत्मविश्वास और प्रगतिशील दृष्टिकोण का संचार किया है।
अंततः, यह सम्मेलन समानता, करुणा और सामाजिक न्याय जैसे बौद्ध मूल्यों पर आधारित एक सशक्त आंदोलनकारी पहल के रूप में उभरा है, जो आने वाले समय में एक समावेशी और न्यायपूर्ण बौद्ध भविष्य की नींव रखेगा।



