आगरा: ताजमहल की ऐतिहासिक नगरी आगरा में वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने के उद्देश्य से ‘ब्रिक्स एमएसएमई फोरम 2026’ (BRICS MSME Forum 2026) का शानदार आयोजन किया गया। इस वैश्विक मंच पर ब्रिक्स देशों के सरकारी प्रतिनिधियों, नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के दिग्गजों और निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों ने शिरकत की। फोरम का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना, सतत विकास को बढ़ावा देना और वैश्विक स्तर पर उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना था।
केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री जीतनराम मांझी ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए स्पष्ट किया कि एमएसएमई केवल व्यवसाय के छोटे हिस्से नहीं हैं, बल्कि वे देश के समावेशी और सतत आर्थिक विकास की असली आधारशिला हैं। यह फोरम तीसरी ब्रिक्स एसएमई वर्किंग ग्रुप बैठक के तुरंत बाद आयोजित किया गया है, जो ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग को एक नया आयाम देने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
एमएसएमई: आर्थिक विकास और समावेशी समाज का इंजन
विकासशील और विकसित दोनों ही अर्थव्यवस्थाओं में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में, जहां ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा निवास करता है, वहां एमएसएमई क्षेत्र रोजगार सृजन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरा है। कृषि के बाद यह दूसरा ऐसा क्षेत्र है जो सबसे अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है।
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने अपने संबोधन में इसी बात पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां विकास का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे, तो हमें एमएसएमई को सशक्त बनाना ही होगा। समावेशी विकास का अर्थ ही यही है कि देश का कोई भी वर्ग या क्षेत्र आर्थिक प्रगति की मुख्यधारा से अछूता न रहे। एमएसएमई दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर पैदा करते हैं, जिससे बड़े शहरों की ओर होने वाले पलायन को रोकने में भी मदद मिलती है।
जब हम सतत विकास (Sustainable Development) की बात करते हैं, तो इसका सीधा संबंध पर्यावरण और समाज के संतुलन से होता है। बड़े उद्योगों की तुलना में छोटे और मध्यम उद्योग स्थानीय स्तर पर कार्बन फुटप्रिंट को कम रखने में अधिक सक्षम होते हैं, बशर्ते उन्हें सही तकनीक और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। इसी कारण से वैश्विक मंचों पर अब एमएसएमई को केवल एक व्यापारिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के एक मजबूत औजार के रूप में देखा जा रहा है।
वर्तमान समय की चुनौतियां और उनके समाधान
भले ही एमएसएमई को अर्थव्यवस्था का इंजन माना जाता है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में इस क्षेत्र को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्रीय मंत्री ने बहुत ही बेबाकी से इन चुनौतियों को रेखांकित किया:
1. वित्तीय सहायता की कमी (Lack of Financial Support)
छोटे उद्यमियों के लिए सबसे बड़ी बाधा समय पर और किफायती दरों पर ऋण या पूंजी प्राप्त करना है। औपचारिक बैंकिंग प्रणालियों की जटिल प्रक्रियाएं और संपार्श्विक (Collateral) की मांग के कारण कई सूक्ष्म उद्यम वित्तीय मुख्यधारा से बाहर रह जाते हैं।
2. नई तकनीक अपनाने में हिचकिचाहट (Technology Adoption)
आज की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वचालन (Automation) और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकें उद्योगों का चेहरा बदल रही हैं। लेकिन वित्तीय सीमाओं और जागरूकता की कमी के कारण छोटे उद्योग इन तकनीकों को अपनाने में पीछे छूट रहे हैं।
3. स्थिरता और हरित प्रथाएं (Sustainability and Green Practices)
सतत विकास आज के समय की मांग है। पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण (Eco-friendly Manufacturing) को अपनाना एमएसएमई के लिए एक नई चुनौती है, क्योंकि इसके लिए शुरुआती निवेश और नए कौशल की आवश्यकता होती है।
4. वैश्विक बाजार तक पहुंच (Market Access)
वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में छोटे स्तर पर उत्पाद बनाने वाली इकाइयों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहचान बनाना और बड़े कॉरपोरेट्स का मुकाबला करना बेहद कठिन होता जा रहा है।
जीतनराम मांझी ने जोर देकर कहा कि इन बहुआयामी चुनौतियों का समाधान कोई एक देश या सरकार अकेले नहीं कर सकती। इसके लिए सामूहिक प्रयासों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ब्रिक्स जैसे मजबूत वैश्विक मंचों के माध्यम से आपसी साझेदारी की अत्यंत आवश्यकता है।
ब्रिक्स सहयोग: संभावनाओं का असीम आकाश
ब्रिक्स (BRICS) संगठन दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक ऐसा समूह है, जिसके पास दुनिया की कुल आबादी और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मंत्री मांझी के अनुसार, ब्रिक्स सदस्य देशों के पास अपार क्षमताएं और एक-दूसरे की पूरक ताकतें (Complementary Strengths) मौजूद हैं।
उदाहरण के लिए, भारत के पास जहां एक विशाल युवा कार्यबल और मजबूत आईटी क्षेत्र है, वहीं अन्य ब्रिक्स देशों के पास उन्नत विनिर्माण तकनीक, प्रचुर प्राकृतिक संसाधन और बड़े बाजार हैं। यदि ये सदस्य देश लगातार संवाद, ज्ञान साझाकरण (Knowledge Sharing) और संयुक्त उपक्रमों को बढ़ावा दें, तो एक ऐसा मजबूत ढांचा (Framework) तैयार किया जा सकता है जो एमएसएमई को नवाचार (Innovation), निर्यात (Export) और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का प्रमुख माध्यम बना सके। यह सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें नीतिगत स्तर पर समन्वय भी शामिल होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश: देश के विकास का नया ग्रोथ इंजन
इस फोरम में उत्तर प्रदेश के एमएसएमई मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने भी राज्य की प्रगति का एक विस्तृत खाका पेश किया। उन्होंने बड़े गर्व के साथ कहा कि उत्तर प्रदेश आज देश के सबसे तेजी से विकसित हो रहे आर्थिक क्षेत्रों (Economic Zones) में शामिल हो चुका है, और इस अभूतपूर्व विकास के पीछे राज्य का मजबूत एमएसएमई नेटवर्क है।
उत्तर प्रदेश, जिसे अपनी पारंपरिक कला और शिल्प के लिए जाना जाता है, ने एमएसएमई क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) जैसी योजनाओं ने राज्य के पारंपरिक उद्योगों को वैश्विक पहचान दिलाई है।
भूपेंद्र चौधरी ने बताया कि रोजगार सृजन और जमीनी स्तर पर विकास (Grassroots Development) सुनिश्चित करने में एमएसएमई ने सबसे बड़ा योगदान दिया है। राज्य सरकार इस क्षेत्र को और आगे ले जाने के लिए निम्नलिखित चार प्रमुख स्तंभों पर लगातार काम कर रही है:
- बुनियादी ढांचे का विकास (Infrastructure Development): नए एमएसएमई पार्कों और औद्योगिक गलियारों का निर्माण ताकि उद्योगों को बिजली, पानी और परिवहन की बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
- नीतिगत सहयोग (Policy Support): नियमों को सरल करना, सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को मजबूत करना और लालफीताशाही को खत्म करना ताकि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा मिले।
- कौशल विकास (Skill Development): युवाओं को आधुनिक उद्योगों की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित करना ताकि वे केवल नौकरी खोजने वाले न बनें, बल्कि नौकरी देने वाले (Job Creators) बनें।
- डिजिटल सशक्तिकरण (Digital Empowerment): छोटे व्यापारियों को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़ना और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना ताकि उनका बाजार दायरा बढ़ सके।
आर्थिक इकाइयां नहीं, क्षेत्रीय विकास के इंजन हैं एमएसएमई
एमएसएमई मंत्रालय के सचिव भारत खेड़ा ने फोरम को संबोधित करते हुए एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि हमें एमएसएमई को केवल साधारण ‘आर्थिक इकाइयां’ (Economic Units) समझना बंद करना होगा। वास्तव में, ये नवाचार, रोजगार, उद्यमिता (Entrepreneurship) और क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने वाले प्रमुख इंजन हैं।
जब किसी पिछड़े या ग्रामीण क्षेत्र में एक छोटा उद्योग स्थापित होता है, तो वह केवल मुनाफा नहीं कमाता, बल्कि उस पूरे क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक कायाकल्प कर देता है। वह सड़क, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
भारत खेड़ा ने उन विशिष्ट क्षेत्रों की पहचान की जहां ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग की तत्काल और अपार संभावनाएं हैं:
| सहयोग का क्षेत्र | अपेक्षित लाभ और प्रभाव |
| तकनीक अपनाना (Tech) | आधुनिक मशीनों और एआई का आदान-प्रदान |
| टिकाऊ विनिर्माण (Green) | पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना टिकाऊ उत्पादन |
| डिजिटल परिवर्तन (Digital) | वैश्विक ई-कॉमर्स और डिजिटल सप्लाई चेन से जुड़ाव |
| कौशल विकास (Skills) | साझा प्रशिक्षण कार्यक्रम और बेस्ट प्रैक्टिसेज का आदान-प्रदान |
| बाजार तक पहुंच (Market) | व्यापारिक बाधाओं को कम करना और वैश्विक एक्सपो का आयोजन |
वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और भविष्य के रोडमैप पर चर्चा
‘ब्रिक्स एमएसएमई फोरम 2026’ में आयोजित विभिन्न तकनीकी सत्रों में इस बात पर गहन विचार-विमर्श किया गया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा (Global Competitiveness) के युग में छोटे उद्योग कैसे खुद को प्रासंगिक बनाए रख सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना था कि गुणवत्ता से समझौता किए बिना उत्पादन लागत को कम करना ही एकमात्र रास्ता है। इसके लिए ‘लीन मैन्युफैक्चरिंग’ (Lean Manufacturing) और जीरो डिफेक्ट-जीरो इफेक्ट (ZED) जैसे सिद्धांतों को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा।
डिजिटलीकरण के इस दौर में साइबर सुरक्षा (Cybersecurity) और डेटा सुरक्षा भी एमएसएमई के लिए एक अनिवार्य विषय बन गए हैं। फोरम में हिस्सा ले रहे नीति निर्माताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि ब्रिक्स देशों को मिलकर एक ऐसा डेटा-साझाकरण नेटवर्क बनाना चाहिए जो छोटे व्यवसायों को सुरक्षित तरीके से अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने की सुविधा दे सके।
फोरम के समापन सत्र में यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह आयोजन ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग को एक नई दिशा देने वाला सिद्ध होगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में आ रहे बड़े बदलावों के बीच, ब्रिक्स एमएसएमई का मजबूत होना दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर सकता है। आगरा का यह मंच आने वाले समय में छोटे उद्योगों के सुनहरे भविष्य की नींव रखेगा।
निष्कर्ष
आगरा में आयोजित ‘ब्रिक्स एमएसएमई फोरम 2026’ ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की विश्व अर्थव्यवस्था का रास्ता बड़े बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट्स से ज्यादा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की गलियों से होकर गुजरता है। केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और उत्तर प्रदेश के एमएसएमई मंत्री भूपेंद्र चौधरी के विचारों से साफ है कि भारत इस क्षेत्र को वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
अब समय आ गया है कि ब्रिक्स के सभी सदस्य देश अपनी पूरी नीतिगत और आर्थिक ताकत के साथ छोटे उद्यमियों के पीछे खड़े हों। जब जमीनी स्तर का उद्यमी सशक्त होगा, तभी वैश्विक अर्थव्यवस्था सतत, समावेशी और न्यायसंगत रूप से आगे बढ़ सकेगी। आगरा का यह फोरम इसी दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।



