नई दिल्ली: भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने $118 बिलियन के अमेरिकी आयात बाजार के दरवाजे भारतीय निर्यातकों के लिए खोल दिए हैं। वस्त्र मंत्रालय ने इस समझौते को एक ‘इकोनॉमिक गेम चेंजर’ करार दिया है, जो न केवल निर्यात बढ़ाएगा बल्कि लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा।
समझौते के मुख्य आकर्षण
विशाल बाजार: अमेरिका के $118 बिलियन के वैश्विक टेक्सटाइल आयात बाजार में भारत की सीधी पहुंच।
शुल्क लाभ: पारस्परिक शुल्क को 18% पर सीमित किया गया, जो प्रतिद्वंद्वी देशों से कम है।
निर्यात लक्ष्य: साल 2030 तक $100 बिलियन के वैश्विक निर्यात लक्ष्य में अमेरिका की हिस्सेदारी 20% से अधिक होगी।
लागत में कमी: अमेरिका से कच्चे माल की आसान सोर्सिंग से उत्पादन लागत घटेगी।
निवेश: अमेरिकी कंपनियों द्वारा भारतीय टेक्सटाइल क्षेत्र में निवेश बढ़ने की प्रबल संभावना।
प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त
इस समझौते की सबसे बड़ी खूबी ‘पारस्परिक शुल्क’ व्यवस्था है। भारत के लिए यह शुल्क 18% तय किया गया है, जबकि चीन (30%), वियतनाम (20%), बांग्लादेश (20%) और पाकिस्तान (19%) जैसे बड़े प्रतिस्पर्धियों को अधिक शुल्क चुकाना पड़ता है। इस वित्तीय लाभ के कारण अब बड़े वैश्विक खरीदार अपनी सोर्सिंग चीन या वियतनाम से हटाकर भारत की ओर मोड़ सकते हैं।
निर्यात के आंकड़ों में उछाल की उम्मीद
वर्तमान में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जहाँ भारत लगभग $10.5 बिलियन का निर्यात करता है। इसमें 70% हिस्सा तैयार परिधानों का है। नए समझौते के बाद उम्मीद है कि अगले 4-5 वर्षों में यह आंकड़ा कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे भारत अपने 2030 के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को समय से पहले पूरा कर सकता है।
रोजगार और विविधीकरण
समझौते के तहत अब भारतीय उद्योग अमेरिका से उच्च गुणवत्ता वाले ‘इंटरमीडिएट्स’ मंगा सकेंगे। इससे देश में ‘वैल्यू-ऐडेड’ यानी मूल्य-वर्धित वस्त्रों का निर्माण आसान होगा। उत्पादन में इस विविधीकरण से न केवल वैश्विक बाजार में भारत की धाक जमेगी, बल्कि वस्त्र क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कारीगरों और श्रमिकों के लिए बेहतर आय और नए रोजगार सुनिश्चित होंगे।



