नई दिल्ली: 11 जनवरी 1944 को अखंड बिहार के हजारीबाग (अब रामगढ़) के निकट नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन (Shibu Soren) ने अपने अदम्य साहस, संघर्ष और जनआंदोलनों के बल पर झारखंड की राजनीति में एक ऐसी पहचान बनाई, जो आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने न केवल आदिवासी, मूलवासी, दलित और पिछड़े वर्गों के हक की लड़ाई लड़ी, बल्कि अलग झारखंड राज्य के गठन का सपना भी साकार किया। उनकी छवि ‘दिशोम गुरु’ के रूप में स्थापित हुई, जिन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चार दशकों तक अनवरत संघर्ष किया।
एक आंदोलनकारी का उदय
शिबू सोरेन का जीवन संघर्षों की गाथा है। मात्र 13-14 वर्ष की उम्र में अपने पिता सोबरन मांझी की महाजनों द्वारा हत्या ने उन्हें गहराई तक झकझोर दिया। इस दुखद घटना ने उन्हें आदिवासियों और वंचितों के अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित किया। उन्होंने महाजनों के खिलाफ धान कटनी आंदोलन शुरू किया, जो बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की नींव बना। उनकी यह लड़ाई केवल जमीन की रक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक बुराइयों जैसे शराबखोरी को खत्म करने और शिक्षा को बढ़ावा देने का भी हिस्सा थी।
शिबू सोरेन ने गिरिडीह के टुंडी के पास पोखरिया में एक आश्रम स्थापित किया, जहां वे आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने, जल संरक्षण, कृषि और शिक्षा के क्षेत्र में काम करते थे। उनके ये प्रयास इतने प्रभावी थे कि देश-विदेश के अर्थशास्त्री और पत्रकार उनके मॉडल का अध्ययन करने पहुंचे। उस दौर में टुंडी के जंगलों में उनकी समानांतर सरकार चलती थी, जिसने तत्कालीन सरकारों को भी सकते में डाल दिया था।
झारखंड आंदोलन और राजनीतिक सफर
शिबू सोरेन ने 1969 में सोनत संताली समाज के माध्यम से सामाजिक सुधारों की शुरुआत की थी। इसके बाद, 4 फरवरी 1973 को विनोद बिहारी महतो और एके राय जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया। यह संगठन जल्द ही झारखंड आंदोलन का प्रतीक बन गया। उनकी एक आवाज पर पूरा झारखंड ठहर जाता था। आर्थिक नाकेबंदी से लेकर दिल्ली तक उनके आंदोलन की गूंज ने केंद्र और बिहार सरकार को झकझोर कर रख दिया था।
1977 में टुंडी विधानसभा से पहली बार चुनाव लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी और 1980 में दुमका लोकसभा सीट से कांग्रेस के पृथ्वीचंद किस्कू को हराकर पहली बार संसद पहुंचे। इसके बाद, उन्होंने दुमका से 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009 और 2014 में जीत हासिल की। वे तीन बार (1986, 2002, 2020) राज्यसभा सांसद भी रहे।
दिशोम गुरु की विरासत
शिबू सोरेन ने 1987 से 2025 तक 38 वर्षों तक झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। 2025 में उन्होंने अपने पुत्र हेमंत सोरेन को यह जिम्मेदारी सौंपी और स्वयं संस्थापक संरक्षक बने। वे 1995 में झारखंड क्षेत्रीय समिति (जैक) के अध्यक्ष भी रहे। उनकी अगुवाई में 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव था। उन्होंने केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार में 2004-2006 तक कोयला मंत्री के रूप में कार्य किया और झारखंड में तीन बार (2005, 2008-09, 2009-10) मुख्यमंत्री बने। उनके आंदोलनों के दौरान उन पर कई संगीन आरोप लगे, जिनमें चीरुडीह हत्याकांड और सांसद रिश्वत प्रकरण शामिल थे, लेकिन हर बार उन्हें न्याय मिला।
दुमका से विशेष नाता
दुमका शिबू सोरेन की राजनीतिक कर्मभूमि रहा। इस सीट से आठ बार सांसद चुने जाना उनके जनाधार और लोकप्रियता का प्रतीक है। दुमका ने उन्हें वह मंच दिया, जहां से वे राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों और वंचितों की आवाज बन सके। उनकी लड़ाई ने न केवल झारखंड को एक नई पहचान दी, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी वंचित वर्गों के लिए प्रेरणा का काम किया।
चुनौतियां और साहस
शिबू सोरेन के आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार करने और यहां तक कि गोली मारने के आदेश दिए गए। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी। जंगलों और पहाड़ों में बिताए उनके दिन, जनता के बीच उनकी गहरी पैठ और उनके आंदोलन की ताकत ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ का दर्जा दिलाया। उनकी यह विरासत आज भी झामुमो के रूप में जीवित है, जिसका नेतृत्व उनके पुत्र हेमंत सोरेन कर रहे हैं, जो वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं।
शिबू सोरेन का राजनीतिक योगदान
- लोकसभा सांसद (दुमका): 1980, 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009, 2014
- राज्यसभा सांसद: 1986, 2002, 2020
- केंद्रीय कोयला मंत्री: 2004-2006
- झारखंड मुख्यमंत्री: 2005, 2008-09, 2009-10
- झामुमो अध्यक्ष: 1987-2025
- झामुमो संस्थापक संरक्षक: 2025
- जैक अध्यक्ष: 1995



