नई दिल्ली। माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि विद्या, वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती के प्राकट्य का दिन भी माना जाता है। इसी कारण देशभर में इस दिन सरस्वती पूजा मनाई जाती है। पीले रंग की प्रधानता, विद्या आरंभ और ज्ञान-साधना की परंपरा इस पर्व की विशिष्ट पहचान है।
पुराणों में वर्णित है देवी का प्राकट्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सरस्वती के जन्म की कथा देवी भागवत पुराण में वर्णित है। पुराण के अनुसार, सृष्टि रचना के समय त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने मनुष्य और संसार की रचना तो कर दी थी, लेकिन संपूर्ण ब्रह्मांड में एक विचित्र शांति छाई हुई थी। न कोई ध्वनि थी, न कोई हलचल। इस नीरवता के कारण सृष्टि अधूरी प्रतीत हो रही थी।
कमंडल से प्रकट हुई दिव्य शक्ति
इस कमी को दूर करने के लिए ब्रह्मा ने विष्णु और महेश से अनुमति लेकर अपने कमंडल के जल को वेद मंत्रों के साथ सृष्टि में छिड़का। तभी एक दिव्य शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह शक्ति चतुर्भुजी रूप में प्रकट हुई हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और आशीर्वाद की मुद्रा थी। यही शक्ति विद्या और वाणी की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
वीणा की झंकार से मिली संसार को आवाज
त्रिदेवों के आग्रह पर देवी ने वीणा के तार छेड़े। जैसे ही वीणा से पहला स्वर निकला, मधुर ध्वनि पूरे ब्रह्मांड स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में फैल गई। इस ध्वनि से जड़ सृष्टि में चेतना आई, गति का संचार हुआ और जीवन सजीव हो उठा। मान्यता है कि देवी की वीणा से निकला पहला स्वर ‘सा’ था, जो संगीत के सात स्वरों का आधार बना।
भाषा और संगीत की हुई उत्पत्ति
पुराणों के अनुसार इसी क्षण भाषा, संगीत और ज्ञान का जन्म हुआ। प्रवाहित होती इस दिव्य चेतना के कारण ही देवी को ‘सरस्वती’ कहा गया। तभी से बसंत पंचमी को विद्या आरंभ, अध्ययन और कला-साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
आज भी जीवंत है परंपरा
इसी पौराणिक मान्यता के चलते हर वर्ष बसंत पंचमी पर विद्यार्थी अपनी पुस्तकों की पूजा करते हैं, कलाकार साधना करते हैं और शिक्षण संस्थानों में विशेष आयोजन होते हैं। यह पर्व आज भी ज्ञान, संस्कृति और सृजनात्मकता के उत्सव के रूप में पूरे श्रद्धाभाव से मनाया जाता है।



