नई दिल्ली: साधनों की कमी और आर्थिक तंगी के कारण कई परिवार अपनी बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दे पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव और निजी स्कूलों की ऊंची फीस ने हजारों लड़कियों को स्कूल छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल बेटियों के भविष्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि समाज की प्रगति में भी बाधा बन रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक असमानता एक गंभीर समस्या बनकर उभर रही है। हाल के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि के निम्न-आय वाले इलाकों में 15-18 वर्ष की आयु वर्ग की करीब 20 प्रतिशत लड़कियां स्कूल छोड़ रही हैं। इसका प्रमुख कारण परिवारों की आर्थिक स्थिति, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालय, सैनिटरी पैड की उपलब्धता और सुरक्षित परिवहन का अभाव है।
राधिका (बदला हुआ नाम), जो कक्षा 9 की छात्रा थी, ने बताया, मेरे स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है, और घर से स्कूल की दूरी ज्यादा होने के कारण अकेले जाना असुरक्षित लगता है। राधिका जैसे कई अन्य लड़कियों को परिवार के दबाव में घरेलू काम या छोटे-मोटे कामों में लग जाना पड़ता है।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं के तहत कई कदम उठाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव सीमित है। गैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि स्कूलों में बुनियादी ढांचे को बेहतर करने और लड़कियों के लिए मुफ्त परिवहन व छात्रवृत्ति जैसी सुविधाओं को बढ़ाने की जरूरत है।
शिक्षाविद् डॉ. अनीता शर्मा ने चेतावनी दी कि यदि इस समस्या पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो यह न केवल लड़कियों के भविष्य को अंधकारमय करेगा, बल्कि देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति पर भी दीर्घकालिक असर डालेगा। समाजसेवी संगठन अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि शिक्षा बजट में वृद्धि की जाए और लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित करना केवल परिवारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज और सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि सही नीतियों और सामुदायिक सहयोग से इस समस्या का समाधान संभव है।




