क्लाइमेट चेंज का ‘नाइट्रोजन बम’: मॉडल्स में क्यों गायब है यह चक्र?

जियोफिजिकल रिसर्च: बायोजियोसाइंसेज जर्नल में छपी इस रिसर्च के मुताबिक, पृथ्वी सिस्टम मॉडल्स (ईएसएम) को नाइट्रोजन की पूरी कहानी भूमि से समुद्र तक, हवा से जंगलों तक समेटनी होगी।

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नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, आपका मौसम ऐप आपको बाढ़ या सूखे की चेतावनी दे रहा है, लेकिन पीछे से एक  बड़ा  खिलाड़ी नाइट्रोजन चुपके से सब कुछ बिगाड़ रहा हो। वैज्ञानिकों की ताजा स्टडी ने साफ-साफ कहा है कि हमारे क्लाइमेट मॉडल्स में नाइट्रोजन चक्र को आधा-अधूरा रखना भविष्य की भविष्यवाणियों को धोखा दे रहा है। जियोफिजिकल रिसर्च: बायोजियोसाइंसेज जर्नल में छपी इस रिसर्च के मुताबिक, पृथ्वी सिस्टम मॉडल्स (ईएसएम) को नाइट्रोजन की पूरी कहानी भूमि से समुद्र तक, हवा से जंगलों तक समेटनी होगी। वरना, जलवायु संकट की जड़ें और गहरी हो जाएंगी।

नाइट्रोजन: सिर्फ खाद नहीं, पर्यावरण का ‘मास्टर की’

हम नाइट्रोजन को अक्सर खेतों का दोस्त मानते हैं। फसलें लहराती हैं, प्रोडक्शन चढ़ता है। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है नाइट्रस ऑक्साइड (एन2ओ) जैसी गैसें CO2 से 300 गुना ज्यादा पावरफुल हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को रॉकेट स्पीड दे रही हैं। फिर NOx गैसें, जो सतह के ओजोन को जन्म देती हैं, वो ओजोन जो शहरों में सांस फाड़ता है, अस्थमा और कैंसर का रिस्क बढ़ाता है। नाइट्रोजन एयरोसॉल्स भी बनाता है, जो हवा को गंदा करते हैं और बादलों के खेल को बदल देते हैं। बारिश कभी कम, कभी ज्यादा। भूमि से बहकर समुद्रों में पहुंचा तो यूट्रोफिकेशन का दंश: शैवाल ब्लूम से मछलियां मरती हैं, डेड जोन्स बनते हैं। और जंगल की आग? वहां से निकलने वाला अमोनिया और NOx स्मॉग का जाल बुनता है, जो हवा को जहर बना देता है। रिसर्चर्स कहते हैं, यह चक्र जीवन का इंजन है, लेकिन बिना कंट्रोल के बम।

मॉडल्स की ‘ब्लाइंड स्पॉट’: क्यों फेल हो रही भविष्यवाणियां?

आज के ईएसएम जो IPCC रिपोर्ट्स का बैकबोन हैं नाइट्रोजन को सिर्फ प्लांट ग्रोथ का ‘लिमिटिंग फैक्टर’ मानते हैं। लेकिन असल में यह वायुमंडल के केमिस्ट्री से लेकर महासागरों की बायोकेमिस्ट्री तक सबको छूता है। मानव एक्टिविटी-फर्टिलाइजर, इंडस्ट्री, वेस्ट से नाइट्रोजन का फ्लो बिगड़ गया है, लेकिन मॉडल्स इसे इग्नोर कर रहे। नतीजा? अगर किसी इलाके में N ज्यादा हो, तो पेड़ ज्यादा CO2 सोखेंगे, लेकिन साथ ही N2O भी उछलेगा कुल मिलाकर क्लाइमेट पर डबल ब्लो। या समुद्रों में N से प्लैंकटन ब्लूम, जो ऑक्सीजन कम कर दें। रिसर्च में पॉइंट आउट किया गया कि बिना फुल इंटरएक्टिव N मॉड्यूल के, हमारी प्रेडिक्शन्स आधी-अधूरी हैं।

रास्ता निकालें: क्या करें अब?

लीड रिसर्चर कौ-गिसब्रेक्ट और टीम का मेन मेसेज: ईएसएम में N को ‘प्लग एंड प्ले’ न रखें, बल्कि डायनामिक मॉड्यूल बनाएं जो लैंड-ओशन-एटमॉस्फियर को लिंक करे। इसके लिए:

  • रियल-टाइम डेटा: ग्लोबल ऑब्जर्वेटरीज से N के फ्लो को ट्रैक करें कहां, कैसे, कितना।
  • फील्ड एक्सपेरिमेंट्स: जंगलों, खेतों, समुद्रों में टेस्टिंग से ग्राउंड ट्रुथ पाएं।
  • मॉडल अपग्रेड: लैब डेटा से मॉडल्स को ट्यून करें, ताकि 2050 की पिक्चर क्लियर हो।

साइंस नहीं, पॉलिसी का मामला भी

यह सिर्फ साइंस नहीं, पॉलिसी का मामला भी है। UN की कोलंबो डिक्लेरेशन ने 2030 तक N वेस्ट को हाफ करने का टारगेट सेट किया। अगर हो गया, तो क्लाइमेट को कूल डाउन के साथ $100 बिलियन सालाना की सेविंग, प्लस फूड सिक्योरिटी और हेल्थ बूस्ट। बायोडायवर्सिटी भी संभलेगी। नाइट्रोजन पृथ्वी का ‘साइलेंट गार्जियन’ है, लेकिन अब इसे मॉडल्स में जगह दो। वरना क्लाइमेट क्राइसिस का अगला चैप्टर और डार्क होगा। वैज्ञानिकों का कॉल: समय है एक्ट करने का, क्योंकि पृथ्वी इंतजार नहीं करेगी। आपका क्या ख्याल है, N वेस्ट कटने से आपकी लाइफ कैसे बदलेगी? कमेंट्स में शेयर करें!

Usha Mehta

ushamehta0013@gmail.com

NewG India का सबसे युवा चेहरा, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद IGNOU और ABP न्यूज़ नेटवर्क जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप की। सोशल और कॉमर्स विषयों की गहरी समझ हैं कलम के साथ आवाज में भी धार हैं। NewG India में बतौर कंटेंट डेवलपर व एंकर अपनी जिम्मेदारी उषा मेहता बखूबी निभा रही हैं ।

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