अपराध मुक्त भारत: अमित शाह ने किया NAFIS की 100% क्षमता के उपयोग का आह्वान

26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री ने आधुनिक पुलिसिंग में वैज्ञानिक साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित किया; कहा—अपराध स्थलों के डेटा से समृद्ध करें NAFIS प्रणाली।

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नई दिल्ली: भारत की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था को आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम और पारदर्शी बनाने की दिशा में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। पारंपरिक पुलिसिंग और केवल गवाहों के भरोसे चलने वाली सदियों पुरानी जांच व्यवस्था को पीछे छोड़ते हुए, भारत अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुका है जहाँ वैज्ञानिक साक्ष्य और डेटा-संचालित तकनीक न्याय का मुख्य आधार बन रही हैं।

इसी ऐतिहासिक परिवर्तन की कड़ी में, 19 जून 2026 को नई दिल्ली के सरदार वल्लभभाई पटेल ऑडिटोरियम में 26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन 2026 का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य देश भर में फोरेंसिक क्षमताओं को बढ़ाना और आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत करना था। सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरदर्शी दृष्टिकोण देश के सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक पुलिसिंग में NAFIS (National Automated Fingerprint Identification System) जैसी वैज्ञानिक प्रणालियाँ एक क्रांतिकारी हथियार हैं, लेकिन वर्तमान में हम अपनी इस क्षमता का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही उपयोग कर पा रहे हैं। गृह मंत्री ने आह्वान किया कि अपराधियों को कानून के शिकंजे में कसने और अपराध दर को न्यूनतम करने के लिए इस प्रणाली को इसकी पूरी क्षमता यानी 100% तक ले जाना अनिवार्य है।

NAFIS क्या है और इसका वर्तमान परिदृश्य?

नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (NAFIS) राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा प्रबंधित एक केंद्रीय डेटाबेस है, जो देश भर के अपराधियों के फिंगरप्रिंट्स को एक अनूठे राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट नंबर (NFN) के साथ संकलित करता है। यह प्रणाली किसी भी संदिग्ध या अपराधी की पहचान को चंद सेकंडों में देश के किसी भी कोने से सत्यापित करने की शक्ति देती है।

गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मेलन में देश के सुरक्षा विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए एक कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया। उन्होंने कहा:

“ऐसे अनगिनत मामले हैं जहाँ NAFIS ने सबसे जटिल मामलों को भी सुलझाने में बहुत मदद की है। लेकिन मेरा अभी भी मानना है कि वर्तमान में NAFIS का केवल 10 प्रतिशत ही उपयोग किया जा रहा है।”

शाह ने जोर देकर कहा कि NAFIS का दायित्व केवल जेल में बंद अपराधियों के रिकॉर्ड को खंगालना नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य अपराध को होने से रोकना और हुए अपराध की वैज्ञानिक पुष्टि करना है। जब तक देश का हर पुलिस थाना और हर फोरेंसिक टीम इस उपकरण का सक्रियता से उपयोग नहीं करेगी, तब तक हम एक पूरी तरह से सुरक्षित समाज की कल्पना नहीं कर सकते।

अपराध स्थल (Crime Scene) से डेटा संकलन की आवश्यकता

गृह मंत्री ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला कि NAFIS कोई एकतरफा जादुई छड़ी नहीं है, बल्कि यह एक ‘टू-वे सिस्टम’ (द्वि-मार्गी प्रणाली) है। यह प्रणाली तभी परिणाम देगी जब इसमें लगातार नया और सटीक डेटा फीड किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि NAFIS की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारी पुलिस टीमें हर अपराध स्थल (Crime Scene) से प्राप्त होने वाले उंगलियों के निशान (Fingerprints) को कितनी तत्परता और सटीकता से इस डेटाबेस में अपलोड करती हैं। शाह के शब्दों में:

  • डेटा संवर्धन (Data Enrichment): अपराधी को दोषी साबित करने में NAFIS बेहद उपयोगी है, लेकिन अपराध को तभी साबित किया जा सकता है जब उससे संबंधित डेटा सिस्टम में जनरेट और स्टोर किया गया हो।
  • गुणवत्ता और सुरक्षा: राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जो फोरेंसिक डेटा एकत्र किया जा रहा है, वह उच्च गुणवत्ता का हो और उसका स्टोरेज पूरी तरह से सुरक्षित हो ताकि भविष्य में उसके साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके।

अंतरराष्ट्रीय अपराधियों की पहचान और इंटेलिजेंस जेनरेशन

तकनीक की कोई सीमा नहीं होती, और आज के समय में अपराध भी अंतरराष्ट्रीय और डिजिटल रूप ले चुके हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यों को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें अपने दृष्टिकोण को केवल स्थानीय या राष्ट्रीय सीमाओं तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।

यदि हमारे पास एक मजबूत, सुरक्षित और विशाल फिंगरप्रिंट डेटाबेस होगा, तो इस डेटा का गहराई से विश्लेषण (Data Analysis) करके हम इंटेलिजेंस जेनरेशन (खुफिया जानकारी जुटाने) का काम कर सकते हैं। यह डेटाबेस भविष्य में अंतरराष्ट्रीय अपराधियों, आतंकवादियों और अंतर-राज्यीय गिरोहों की पहचान करने और उनके नेटवर्क को ध्वस्त करने में भारत की सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।

तीन नए आपराधिक कानूनों के कार्यान्वयन में NCRB की भूमिका

भारत सरकार ने हाल ही में देश की न्याय प्रणाली को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कराने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए तीन नए आपराधिक कानून लागू किए हैं। गृह मंत्री ने इन कानूनों को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की सराहना की।

NCRB ने न केवल देश के प्रत्येक पुलिस स्टेशन को इन नए कानूनों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि उन्हें आवश्यक तकनीकी और व्यावहारिक सहायता भी प्रदान की। यह बदलाव पारंपरिक पुलिसिंग के दमनकारी तरीकों से हटकर पूरी तरह से प्रौद्योगिकी-संचालित (Technology-driven) और अधिकार-आधारित (Rights-based) ढांचे की ओर बढ़ने का एक बड़ा प्रमाण है।

प्रशिक्षण का विस्तार: ऐप चलाने से लेकर चार्जशीट और अदालत तक

अमित शाह ने अपने संबोधन में एक अत्यंत व्यावहारिक और प्रशासनिक समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि अक्सर पुलिस कर्मियों को केवल तकनीकी ऐप या सॉफ्टवेयर चलाने की ट्रेनिंग दे दी जाती है, जो कि नाकाफ़ी है।

एक संपूर्ण प्रशिक्षण मॉडल की आवश्यकता:

  1. वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाना: पुलिस अधिकारियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि ऐप के माध्यम से वैज्ञानिक साक्ष्य कैसे उत्पन्न किए जाएं।
  2. चार्जशीट में एकीकरण: इन वैज्ञानिक साक्ष्यों को कानूनी रूप से मजबूत चार्जशीट (आरोप पत्र) का हिस्सा कैसे बनाया जाए, इसका प्रशिक्षण अनिवार्य है।
  3. अभियोजन और न्यायपालिका की ट्रेनिंग: अभियोजकों (Prosecutors) और न्यायाधीशों को भी इस बात के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है कि यदि तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्य पूरी तरह से पुख्ता हैं, तो अतिरिक्त पारंपरिक गवाहों या साक्ष्यों की आवश्यकता को कम किया जा सकता है। इससे अदालतों का काम सरल होगा और न्याय प्रक्रिया तेज होगी।

ओवर-इंजीनियरिंग से बचने और व्यावहारिक अभियोजन की सलाह

गृह मंत्री ने पुलिस और अभियोजन टीमों को आधुनिक साक्ष्यों के अति-उपयोग या ‘ओवर-इंजीनियरिंग’ के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने एक दिलचस्प उदाहरण देते हुए कहा:

“अगर आपके पास फिंगरप्रिंट मैच, टेलीफोन रिकॉर्ड मैच, फेस मैच, आई (Eyes) और डीएनए मैच की पुष्टि पहले ही हो चुकी है, और फिर भी आप अदालत के सामने 250 अन्य अनावश्यक सबूत लेकर जाते हैं… तो ऐसी स्थिति में इतनी उन्नत तकनीक के उपयोग का क्या फायदा रह जाता है?”

शाह ने स्पष्ट किया कि अनुभवी और कुशल अभियोजकों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वे अदालत के सामने केवल ठोस, अचूक और वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करें, जिससे मुकदमे का निपटारा जल्द से जल्द हो सके और अपराधियों को तुरंत सजा (Conviction) मिल सके।

निष्कर्ष: एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण भविष्य का संकल्प

नई दिल्ली के सरदार वल्लभभाई पटेल ऑडिटोरियम में आयोजित यह 26वां अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि यह भारत की कानून व्यवस्था को री-इंजीनियर करने का एक ब्लूप्रिंट था।

अमित शाह का यह संदेश स्पष्ट है: अपराधियों के मन में कानून का डर तभी पैदा होगा जब हमारी जांच प्रणाली अचूक होगी। NAFIS का 100% उपयोग, अपराध स्थलों से डेटा का नियमित इनपुट, और जांच से लेकर सजा तक की पूरी श्रृंखला (Investigation, Prosecution, and Conviction) में तकनीक का सक्रिय समन्वय ही भारत को एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाने का एकमात्र मार्ग है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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