नई दिल्ली: अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट (US Supreme Court) 5 नवंबर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के लगाए गए टैरिफ (Trump Tariff Case) की वैधता पर सुनवाई शुरू करेगा। यह मामला सिर्फ व्यापार नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा है राष्ट्रपति की “असीमित आपात शक्तियों” का मुद्दा। ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत कई देशों पर टैरिफ लगाए थे, जिन्हें कानूनी विशेषज्ञ अब चुनौती दे रहे हैं।
निचली अदालतों ने बताया अवैध कदम
ट्रंप ने 1978 के IEEPA कानून का उपयोग करते हुए कई विदेशी वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगाए और गैर-अमेरिकी नागरिकों के निर्वासन को तेज किया। तीन निचली अदालतें पहले ही इन टैरिफ को गैरकानूनी बता चुकी हैं। अब फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथों में है — क्या वह राष्ट्रपति की आपात शक्तियों को सीमित करेगा या उन्हें और विस्तार देगा, यही देखना होगा।
संविधान और राष्ट्रपति की शक्तियों पर टकराव
अमेरिकी संविधान के अनुसार, टैरिफ तय करने का अधिकार कांग्रेस को है, न कि राष्ट्रपति को। हालांकि 1930 के दशक से कांग्रेस ने ऐसे कई कानून बनाए हैं जिनसे राष्ट्रपति को सीमित परिस्थितियों में टैरिफ में बदलाव का अधिकार मिलता है। लेकिन ट्रंप ने इन शक्तियों का इस्तेमाल पहले के किसी भी राष्ट्रपति से कहीं अधिक व्यापक स्तर पर किया। उनके टैरिफ स्टील और एल्युमीनियम जैसे सैन्य उद्योगों के लिए जरूरी माने जाने वाले सेक्टरों पर तो लगे ही, साथ ही उन्होंने कई देशों पर समान दर के टैरिफ लागू किए — जो IEEPA के तहत “इमरजेंसी” घोषित कर के लगाए गए थे।
व्यापार घाटे को बताया राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा
ट्रंप ने तर्क दिया कि अमेरिका का व्यापार घाटा उसकी “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “आर्थिक स्थिरता” के लिए बड़ा खतरा है। उनके अनुसार, यह इमरजेंसी घोषित करने के लिए पर्याप्त कारण है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापार घाटा 1976 से चला आ रहा है और ट्रंप के पहले कार्यकाल में यह और बढ़ा, इसलिए इसे “आपात स्थिति” कहना कानून की भावना के विपरीत है।
अदालतों की राय: IEEPA टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं देता
दो फेडरल कोर्ट और यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने स्पष्ट किया है कि IEEPA राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं देता। यह कानून 1917 के Trading with the Enemy Act में किए गए संशोधन के रूप में लाया गया था, ताकि इमरजेंसी शक्तियों को सीमित किया जा सके। 1977 में इस कानून में संशोधन का उद्देश्य राष्ट्रपति की शक्तियों को कम करना था, न कि बढ़ाना।
- इसको भी पढ़ें: एशिया के वे देश जहां महिला PM बनना सपना ही रह जाता है
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्यों होगा ऐतिहासिक
यह केस सिर्फ टैरिफ की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि क्या अमेरिका का राष्ट्रपति “असीमित शक्तियों” का प्रयोग कर सकता है या नहीं। ट्रंप ने खुलेआम कहा है कि टैरिफ हटाने से अमेरिका “बर्बाद” हो जाएगा, और दावा किया कि टैरिफ नीति से उन्होंने “आठ युद्ध खत्म करवाए”। अगर सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के खिलाफ फैसला देता है, तो भी उम्मीद है कि प्रशासन अन्य कानूनों के तहत वैकल्पिक रास्ते खोजेगा।
यह मामला अमेरिकी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों ‘शक्तियों के विभाजन और संतुलन’ की परीक्षा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि क्या राष्ट्रपति की सीमाएं हैं या वह “आपातकाल” का हवाला देकर उन्हें पार कर सकता है।



