नई दिल्ली: एक हालिया शोध के अनुसार, यदि 19वीं सदी के वैज्ञानिकों के पास आधुनिक तकनीक और उपकरण उपलब्ध होते, तो वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के शुरुआती संकेतों को पहचान सकते थे। इस शोध से पता चलता है कि कोयले और लकड़ी जैसे ईंधनों के जलने से होने वाली मानवीय गतिविधियों ने उस समय वायुमंडल को प्रभावित करना शुरू कर दिया था। शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाया कि यदि सही उपकरण मौजूद होते, तो 1880 के दशक में, जब जीवाश्म ईंधन से चलने वाली गाड़ियों का आविष्कार भी नहीं हुआ था, जलवायु में बदलाव के शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकता था।
औद्योगिक क्रांति के दौरान यूरोप में इस गैस का उत्सर्जन तेजी से बढ़ा
प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, 130 साल से भी अधिक समय पहले वायुमंडलीय तापमान पर मानवजनित प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। 19वीं सदी के मध्य में वैज्ञानिकों ने कार्बन डाइऑक्साइड के ऊष्मा अवरोधक गुणों की खोज कर ली थी। औद्योगिक क्रांति के दौरान यूरोप में इस गैस का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा था। हालांकि, 1970 के दशक तक वैज्ञानिकों ने इसे आधुनिक जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण मानना शुरू नहीं किया था। शोधकर्ताओं ने एक काल्पनिक परिदृश्य में माना कि 1860 के दशक में वैज्ञानिक वैश्विक वायुमंडलीय परिवर्तनों को मापने के लिए आधुनिक उपकरणों, जैसे उपग्रह माइक्रोवेव रेडियोमीटर, बर्फ के कोर विश्लेषण, और समताप मंडल के गुब्बारों का उपयोग कर सकते थे।
प्राकृतिक प्रभावों को अलग करने के लिए ‘फिंगरप्रिंट’ तकनीक का उपयोग किया
शोध में बताया गया है कि जलवायु पर मानवजनित और प्राकृतिक प्रभावों को अलग करने के लिए ‘फिंगरप्रिंट’ तकनीक का उपयोग किया गया। ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव के बावजूद, जलवायु परिवर्तन का शुरुआती संकेत समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फीयर) में ठंडक के रूप में सामने आता है। यह ठंडक कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन व ओजोन परत के क्षरण के कारण होती है। ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी की सतह से निकलने वाली गर्मी को वायुमंडल की निचली परत (क्षोभमंडल) में रोक लेती हैं, जिससे वह गर्म होती है। साथ ही, ये गैसें समताप मंडल की परावर्तन क्षमता को बढ़ाती हैं, जिससे गर्मी पृथ्वी की ओर वापस लौटती है।
ओजोन परत का क्षरण समताप मंडल की गर्मी अवशोषण क्षमता को कम करता
दूसरी ओर, ओजोन परत का क्षरण समताप मंडल की गर्मी अवशोषण क्षमता को कम करता है, जिसके परिणामस्वरूप वह ठंडा होता है। समताप मंडल मौसम के उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होता है, जिसके कारण जमीनी मापों से दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनों का पता लगाना कठिन होता है। शोध के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में मानवजनित वृद्धि के कारण समताप मंडल में ठंडक के संकेत 1885 तक स्पष्ट रूप से देखे जा सकते थे।
लगभग 34 साल बाद मानवजनित प्रभावों को पहचाना जा सकता था
यहां तक कि अगर उस समय वैश्विक स्तर पर निगरानी संभव नहीं थी और केवल उत्तरी गोलार्ध के मध्य अक्षांशों में उच्च गुणवत्ता वाले तापमान माप उपलब्ध थे, तब भी 1894 तक अर्थात् जलवायु निगरानी शुरू होने के लगभग 34 साल बाद मानव जनित प्रभावों को पहचाना जा सकता था। शोध में यह भी बताया गया है कि हम पिछले 50 सालों से जलवायु परिवर्तन के बारे में जानते हैं, लेकिन इसके बावजूद जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को पूरी तरह कम करने का कोई प्रभावी उपाय नहीं खोज पाए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु पर मानवजनित प्रभावों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। यह शोध हमें याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है, और इसे हल करने के लिए तत्काल वैश्विक प्रयासों की आवश्यकता है।



