नई दिल्ली। उज़्बेकिस्तान के ऐतिहासिक शहर कीवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ‘लाजगी’ नृत्य महोत्सव के तहत तीसरा अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक सम्मेलन इन दिनों वैश्विक सांस्कृतिक विमर्श का केंद्र बना हुआ है। 27–28 अप्रैल को आयोजित इस सम्मेलन का विषय “वैश्विक सांस्कृतिक विकास में नृत्य कला: परंपराएँ और सार्वभौमिक मानवीय मूल्य” रहा।
20 से अधिक देशों के कलाकार ले रहे भाग
इस आयोजन में भारत सहित 20 से अधिक देशों के कला इतिहासकार, नृत्य विशेषज्ञ, शोधकर्ता और विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। बहुभाषी स्वरूप में आयोजित इस सम्मेलन की कार्यवाही उज़्बेक, रूसी और अंग्रेज़ी भाषाओं में संचालित की जा रही है, जिससे विविध सांस्कृतिक दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान संभव हो सका है।
खोरेज़्म लाजगी नृत्य रहा आकर्षण का केंद्र
महोत्सव का केंद्रबिंदु खोरेज़्म लाजगी नृत्य रहा, जिसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया है। अपनी विशिष्ट लय, भाव-भंगिमा और ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध यह नृत्य मध्य एशिया की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। सम्मेलन में लाज़गी नृत्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके प्राचीन ग्रंथ अवेस्ता से संबंध, तथा इसके सौंदर्यशास्त्रीय और नृवंशविज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने इसे केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति और लोकजीवन की अभिव्यक्ति बताया।
चुनौतियों पर भी विचार
वैश्वीकरण के दौर में पारंपरिक कलाओं के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी विचार हुआ। वक्ताओं ने संरक्षण और संवर्धन के लिए नवाचार आधारित रणनीतियों पर जोर दिया, ताकि इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा जा सके। सम्मेलन में 200 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें से 116 को प्रकाशन के लिए चयनित किया गया। इन शोध-पत्रों में लोकनृत्य, नृत्य शिक्षा, संगीत संस्कृति और आधुनिक नृत्य समालोचना जैसे विषय शामिल रहे।
महत्वपूर्ण परियोजना पर चर्चा
महोत्सव के साथ ही तुर्कशोय की पहल पर तुर्किक देशों के कोरियोग्राफी संस्थानों के प्रमुखों की बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें “तुर्किक लोक नृत्य संकलन” जैसी महत्वपूर्ण परियोजना पर चर्चा हुई। इसके अलावा कार्यक्रम के दौरान पुस्तकों की प्रदर्शनी, मोनोग्राफ का विमोचन और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका “सूज़.इन” का परिचय भी कराया गया, जिससे यह आयोजन अकादमिक के साथ-साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जीवंत मंच बन गया।



