ग्लोबल वेटलैंड आउटलुक 2025: 50 साल में 41 करोड़ हेक्टेयर Wetlands का नुकसान

‘ग्लोबल वेटलैंड आउटलुक 2025’ की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 वर्षों (1970-2025) में वैश्विक स्तर पर 22% आर्द्र भूमियां नष्ट हो चुकी हैं। इनमें नदियां, झीलें, पीटलैंड्स और मैंग्रोव जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं।

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नई दिल्ली: आर्द्र भूमियां (Wetlands) प्रकृति का अनमोल खजाना हैं। ऐसे में यह तेजी से लुप्त हो रही हैं। ये नम क्षेत्र न केवल पर्यावरण को संतुलित रखते हैं, बल्कि मानव और अन्य जीवों के लिए जल, भोजन, आवास और शुद्ध हवा प्रदान करते हैं। ‘ग्लोबल वेटलैंड आउटलुक 2025’ की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 वर्षों (1970-2025) में वैश्विक स्तर पर 22% आर्द्र भूमियां नष्ट हो चुकी हैं। इनमें नदियां, झीलें, पीटलैंड्स और मैंग्रोव जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं। इसका मतलब है कि 41.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली आर्द्रभूमियां अब पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।

झीलों का भारी नुकसान
इस नुकसान में 12.3 करोड़ हेक्टेयर में फैली झीलें भी शामिल हैं। चिंताजनक बात यह है कि यह ह्रास अभी भी 0.52% की वार्षिक दर से जारी है। इन खोई हुई आर्द्रभूमियों का आर्थिक मूल्य 5.1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक आंका गया है, हालांकि यह आंकड़ा उनके सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता।

यह रिपोर्ट एक गंभीर सत्य को सामने लाती है कि हम अपने सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों को धीरे-धीरे खो रहे हैं।ये आर्द्रभूमियां केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं, और अब यह आधार कमजोर पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि क्या होगा, बल्कि यह है कि हम कब तक इस विनाश को चुपचाप देखते रहेंगे? यह रिपोर्ट कन्वेंशन ऑन वेटलैंड्स के वैज्ञानिक और तकनीकी पैनल (STRP) द्वारा तैयार की गई है, जो आर्द्रभूमियों की स्थिति, उनके पारिस्थितिक महत्व और संरक्षण की आवश्यकताओं का सबसे व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

आर्द्रभूमियों की बिगड़ती स्थिति: खतरे का संकेत
रिपोर्ट बताती है कि न केवल हमने करोड़ों हेक्टेयर आर्द्रभूमियां खो दी हैं, बल्कि जो बची हैं, उनकी गुणवत्ता भी तेजी से गिर रही है।आंकड़े दर्शाते हैं कि वैश्विक स्तर पर 25% आर्द्रभूमियां पारिस्थितिक रूप से खराब स्थिति में हैं। स्थिति हर क्षेत्र में और बदतर हो रही है। यदि यह नुकसान इसी गति से जारी रहा, तो 2050 तक हम इन आर्द्रभूमियों से मिलने वाले 39 ट्रिलियन डॉलर के लाभ से वंचित हो जाएंगे।

नुकसान के प्रमुख कारण
रिपोर्ट में आर्द्रभूमियों के विनाश के कारणों को स्पष्ट किया गया है:

  • कृषि विस्तार: खेती के लिए भूमि की मांग ने आर्द्रभूमियों को नष्ट किया।
  • प्रदूषण: औद्योगिक और शहरी प्रदूषण ने जल गुणवत्ता को प्रभावित किया।
  • अनियोजित विकास: बांध, सड़कें और शहरीकरण ने प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित किया।
  • जलवायु परिवर्तन: बढ़ता तापमान और बदलता मौसम आर्द्रभूमियों के लिए खतरा बन रहा है।
  • ये मानवीय गतिविधियां आर्द्रभूमियों की बहाली को और जटिल बना रही हैं।

आर्द्र भूमियां: प्रकृति का आधार

आर्द्र भूमियां जैव विविधता का केंद्र हैं और जलवायु स्थिरता, जल संसाधनों और जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  • बाढ़ को नियंत्रित करती हैं।
  • कार्बन संग्रहण कर जलवायु परिवर्तन से लड़ती हैं।
  • जल को शुद्ध करती हैं।
  • अरबों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।

जर्नल नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 300 वर्षों में मानवीय गतिविधियों ने 34 लाख वर्ग किलोमीटर आर्द्र भूमियों को नष्ट किया है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल से अधिक है। यूरोप, अमेरिका और चीन में लगभग 50% आर्द्रभूमियां खत्म हो चुकी हैं, जबकि भारत, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड और जर्मनी में 75% से अधिक नुकसान हुआ है। आयरलैंड ने अपनी 90% आर्द्र भूमियां खो दी हैं, जबकि जर्मनी, लिथुआनिया और हंगरी में 80% से अधिक नुकसान दर्ज किया गया है। यह नुकसान जंगलों की तुलना में तीन गुना तेजी से हो रहा है।

आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व

आर्द्र भूमियां प्रतिवर्ष 39 ट्रिलियन डॉलर के पारिस्थितिक लाभ प्रदान करती हैं, जो किसी भी अन्य पारिस्थितिक तंत्र से अधिक है। फिर भी, इनके संरक्षण में निवेश नगण्य है। जर्नल ग्लोबल एनवायरनमेंटल चेंज के एक अध्ययन के अनुसार, उष्णकटिबंधीय आर्द्रभूमियां हर साल तूफानों से औसतन 4,620 लोगों की जान बचाती हैं और 33.6 लाख करोड़ रुपये के नुकसान को रोकती हैं। भारत में, ये आर्द्रभूमियां प्रति वर्ष 414 जिंदगियां और 65,339.4 करोड़ रुपये के नुकसान को बचाती हैं। वर्तमान में धरती पर 140 करोड़ हेक्टेयर आर्द्रभूमियां बची हैं, जो ग्रीनलैंड से भी बड़ा क्षेत्र है। हालांकि, इनमें से केवल 13-18% ही रामसर सूची में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के रूप में दर्ज हैं।

जलवायु संकट में आर्द्र भूमियों की भूमिका
आर्द्र भूमियां जलवायु संकट और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा की पहली कड़ी हैं। हालांकि, पीटलैंड्स, जो कार्बन संग्रहण में सबसे प्रभावी थे, अब ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने लगे हैं। मैंग्रोव, समुद्री घास और सॉल्ट मार्श जैसे समुद्री वेटलैंड्स तटीय क्षेत्रों को तूफानों और समुद्र स्तर की वृद्धि से बचाते हैं। नदियां, झीलें और दलदली क्षेत्र जल प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, सूखे में जल संरक्षण और बाढ़ रोकथाम में मदद करते हैं। ये जैव विविधता, मत्स्य उद्योग, कृषि और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

संरक्षण की तत्काल आवश्यकता
आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की सुरक्षा है। इनके विनाश को रोकने और बहाली के लिए तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है। यदि हम अभी कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल धरोहर के बिना रह जाएंगी। यह समय चुप रहने का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलने का है।

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