Climate Change: आर्कटिक के रेंडियर पर मंडराता खतरा

रेंडियर, जिन्हें उत्तर अमेरिका में कैरिबू कहते हैं, आइस एज से बचे हुए वो दुर्लभ जीव हैं जो बर्फीले इलाकों की कठिनाइयों में भी जीवित रहते हैं। ये न सिर्फ आर्कटिक की जैव विविधता को बनाए रखते हैं, बल्कि वहां के आदिवासी समुदायों के लिए भोजन, कपड़े और सांस्कृतिक महत्व का स्रोत भी हैं।

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नई दिल्ली: क्रिसमस की ठंडी रातों में जब बच्चे सांता की स्लेज को खींचते रेंडियर की कहानियों में खो जाते हैं, तो ये सिर्फ परीकथाएं नहीं लगतीं। ये जानवर असल में आर्कटिक की ठंडी दुनिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जो सदियों से वहां की प्रकृति और स्थानीय लोगों की जिंदगी को संभालते आए हैं। लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान ने इनकी जिंदगी को उलट-पुलट कर दिया है। एक ताजा अंतरराष्ट्रीय रिसर्च बताती है कि पिछले तीन दशकों में जलवायु बदलाव (Climate Change) की वजह से रेंडियर की आबादी में करीब दो-तिहाई की कमी आ चुकी है, और अगर यही रफ्तार रही तो आने वाले सालों में ये और भी भयावह हो सकती है।

रेंडियर की घटती संख्या और उनके रहने की जगहों पर असर

वैज्ञानिकों की टीम ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं रोका गया, तो रेंडियर की आबादी में ऐसी गिरावट आएगी जो पिछले 21 हजार सालों में कभी नहीं देखी गई। यह अध्ययन ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड और डेनमार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के विशेषज्ञों की अगुवाई में हुआ है, और इसके निष्कर्ष साइंस एडवांसेज जर्नल में छपे हैं। रिसर्चर्स ने पुराने जीवाश्मों, डीएनए के नमूनों और कंप्यूटर सिमुलेशन्स का इस्तेमाल करके देखा कि रेंडियर कैसे पहले के मौसम बदलावों से जूझे हैं, और क्या वे आगे की चुनौतियों का सामना कर पाएंगे। नतीजे बताते हैं कि गर्म होते मौसम ने हमेशा इनकी संख्या को प्रभावित किया है, लेकिन अबकी बार ये बदलाव इतने तेज हैं कि रेंडियर की रिकवरी मुश्किल लग रही है।

आर्कटिक इकोसिस्टम का आधार हैं ये जानवर

रेंडियर, जिन्हें उत्तर अमेरिका में कैरिबू कहते हैं, आइस एज से बचे हुए वो दुर्लभ जीव हैं जो बर्फीले इलाकों की कठिनाइयों में भी जीवित रहते हैं। ये न सिर्फ आर्कटिक की जैव विविधता को बनाए रखते हैं, बल्कि वहां के आदिवासी समुदायों के लिए भोजन, कपड़े और सांस्कृतिक महत्व का स्रोत भी हैं। स्टडी की लीड रिसर्चर डॉ. एलिसाबेटा कैंटेरी ने कहा कि इतिहास हमें बताता है कि जब-जब तापमान तेजी से बढ़ा, रेंडियर की आबादी बुरी तरह प्रभावित हुई। लेकिन 21वीं सदी के बदलाव इतने तीव्र हैं कि पहले की तुलना में नुकसान कई गुना ज्यादा हो सकता है।

उत्तर अमेरिकी कैरिबू सबसे ज्यादा जोखिम में

रिसर्च से सामने आया है कि उत्तर अमेरिका के कैरिबू झुंड जलवायु बदलाव से सबसे ज्यादा खतरे में हैं। अगर उत्सर्जन को काबू में नहीं किया गया और वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन में निवेश नहीं बढ़ाया गया, तो 2100 तक इनकी संख्या में 80 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इससे टुंड्रा इलाकों की वनस्पतियां प्रभावित होंगी, जिससे मिट्टी में जमा कार्बन रिलीज हो सकता है और ग्लोबल वॉर्मिंग की स्पीड और बढ़ जाएगी। ये एक चेन रिएक्शन जैसा होगा, जहां रेंडियर की कमी से पूरा इकोसिस्टम डगमगा सकता है।

टुंड्रा में पौधों की विविधता बनाए रखते हैं रेंडियर

रेंडियर टुंड्रा में घूमकर कुछ खास पौधों को चरते हैं, जिससे दूसरी प्रजातियों को बढ़ने का मौका मिलता है और विविधता बनी रहती है। अगर ये गायब हुए, तो इलाके की हरियाली कम हो जाएगी, और इससे कार्बन स्टोरेज की क्षमता घटेगी। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एरिक पोस्ट, जो इस स्टडी से जुड़े हैं, बताते हैं कि रेंडियर की कमी से न सिर्फ पौधों पर असर पड़ेगा, बल्कि वो समुदाय भी प्रभावित होंगे जो इन पर निर्भर हैं। उन्होंने जोर दिया कि अब वक्त है कि हम संरक्षण के लिए बड़े कदम उठाएं, वरना हम इन अद्भुत जीवों को खो देंगे और साथ ही उन संस्कृतियों को भी जो इनसे जुड़ी हैं। यह स्टडी हमें याद दिलाती है कि जलवायु बदलाव सिर्फ दूर की समस्या नहीं है, ये सीधे हमारी दुनिया के उन हिस्सों को छू रहा है जो हमें क्रिसमस की खुशियां देते हैं। अगर हम अब नहीं चेते, तो सांता की कहानियां ही बाकी रह जाएंगी, असल रेंडियर नहीं।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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