हर साल 90,000 Microplastics कणों का सेवन कर रहे लाखों लोग

अध्ययन के अनुसार, बोतलबंद पानी के शौकीन व्यक्ति सालाना लगभग 90,000 अतिरिक्त Microplastics कण निगलते हैं, जो नल का पानी पीने वालों से कहीं ज्यादा है।

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नई दिल्ली: दुनिया भर में बोतलबंद पानी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर घूंट के साथ आप अनजाने में प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों को भी निगल रहे हैं? कनाडा के कॉनकॉर्डिया विश्वविद्यालय के एक ताजा शोध ने इस चौंकाने वाले सच को उजागर किया है। अध्ययन के अनुसार, बोतलबंद पानी के शौकीन व्यक्ति सालाना लगभग 90,000 अतिरिक्त माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) कण निगलते हैं, जो नल का पानी पीने वालों से कहीं ज्यादा है। शोधकर्ताओं ने 140 से अधिक वैज्ञानिक अध्ययनों की गहन समीक्षा कर यह निष्कर्ष निकाला है। ये कण इतने बारीक होते हैं कि नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते, उनका आकार एक माइक्रोन से पांच मिलीमीटर तक होता है, जबकि इससे छोटे कणों को नैनोप्लास्टिक कहा जाता है।

बोतलों से रिसते जहर के कण

शोध की अगुवाई करने वाली पीएचडी छात्रा सारा साजेदी बताती हैं कि ये कण बोतलों के निर्माण से लेकर भंडारण और उपयोग तक हर चरण में मुक्त होते रहते हैं। सिंगल-यूज प्लास्टिक बोतलें, जो अक्सर कम गुणवत्ता वाली होती हैं, गर्मी, धूप या तापमान बदलाव के संपर्क में आने पर आसानी से टूटकर छोटे टुकड़ों में बदल जाती हैं। ये कण सीधे पानी में घुल-मिल जाते हैं, जबकि अन्य प्लास्टिक प्रदूषक भोजन श्रृंखला के रास्ते शरीर में पहुंचते हैं, साजेदी ने जर्नल ऑफ हैजर्डस मटेरियल्स में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा। यह अध्ययन बोतलबंद पानी के स्वास्थ्य जोखिमों पर केंद्रित है, जो बताता है कि कैसे ये कण मानव शरीर के लिए एक अदृश्य खतरे का रूप ले चुके हैं।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव

एक बार शरीर में प्रवेश करने के बाद, ये माइक्रोप्लास्टिक कण रक्तप्रवाह में घुलमिल जाते हैं और हृदय, मस्तिष्क तथा अन्य महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन, सेलुलर स्ट्रेस, हार्मोनल डिसरप्शन, प्रजनन स्वास्थ्य में गिरावट, न्यूरोलॉजिकल डैमेज और यहां तक कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। हालांकि, लंबे समय के प्रभावों पर अभी और शोध की जरूरत है, क्योंकि मानकीकृत टेस्टिंग विधियां सीमित हैं। साजेदी चेतावनी देती हैं, आपात स्थिति में बोतलबंद पानी का उपयोग स्वीकार्य है, लेकिन दैनिक आदत के रूप में इसे अपनाना घातक साबित हो सकता है। खतरा तुरंत विष से नहीं, बल्कि वर्षों तक संचित होने वाले विष से है।

बढ़ती मांग और पर्यावरणीय तबाही

वैश्विक स्तर पर बोतलबंद पानी का बाजार तेजी से फल-फूल रहा है, ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ग्लोबल हेल्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर मिनट करीब 10 लाख बोतलें बिक रही हैं। लेकिन यह सुविधा महंगी साबित हो रही है। प्लास्टिक बोतलें न केवल माइक्रोप्लास्टिक छोड़ती हैं, बल्कि फ्थैलेट्स और बिस्फेनॉल ए (बीपीए) जैसे केमिकल्स भी रिसाव का कारण बनते हैं, जो हार्मोनल असंतुलन पैदा करते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि 10 से 78 प्रतिशत नमूनों में ऐसे प्रदूषक मौजूद हैं। इससे जुड़ी अन्य समस्याएं हैं ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, इम्यून सिस्टम की कमजोरी, ब्लड फैट लेवल में बदलाव, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, डायबिटीज और मोटापा। पर्यावरण के मोर्चे पर भी स्थिति भयावह है। प्लास्टिक बोतलों के उत्पादन के लिए कच्चे माल की खपत, ऊर्जा-गहन निर्माण प्रक्रिया और अंततः कचरा प्रबंधन से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ता है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज करता है। सरकारें प्लास्टिक बैग्स, स्ट्रॉज और पैकेजिंग पर प्रतिबंध लगा रही हैं, लेकिन बोतलबंद पानी पर नियंत्रण ढीला है।

क्या करें उपभोक्ता?

शोधकर्ता सलाह देते हैं कि नल के पानी को फिल्टर करने या रीयूजेबल बोतलों का उपयोग बढ़ावा दिया जाए। साजेदी का संदेश साफ है। सुविधा के नाम पर स्वास्थ्य और पर्यावरण को दांव पर न लगाएं। यह अध्ययन न केवल व्यक्तिगत जागरूकता बढ़ाने का आह्वान करता है, बल्कि नीति-निर्माताओं को बोतलबंद पानी उद्योग पर सख्ती बरतने की चेतावनी भी देता है। क्या समय आ गया है कि हम प्लास्टिक-मुक्त जीवनशैली को अपनाएं?

Usha Mehta

ushamehta0013@gmail.com

NewG India का सबसे युवा चेहरा, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद IGNOU और ABP न्यूज़ नेटवर्क जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप की। सोशल और कॉमर्स विषयों की गहरी समझ हैं कलम के साथ आवाज में भी धार हैं। NewG India में बतौर कंटेंट डेवलपर व एंकर अपनी जिम्मेदारी उषा मेहता बखूबी निभा रही हैं ।

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