एचपीवी-डीपसीक: सिर-गर्दन कैंसर की चेतावनी 10 साल पहले मिलेगी

एचपीवी-डीपसीक: वायरस शरीर में घुसकर चुपके से फैलता है और सालों तक कोई संकेत नहीं देता। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि अब तक ऐसे कैंसर की जांच के लिए कोई विश्वसनीय स्क्रीनिंग विधि नहीं थी।

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नई दिल्ली: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में कैंसर जैसी घातक बीमारियां हर किसी के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। विशेष रूप से सिर और गर्दन क्षेत्र के कैंसर के केस साल-दर-साल बढ़ते जा रहे हैं। अमेरिकी रिसर्च बताते हैं कि इनमें से करीब 70 फीसदी मामलों की जड़ ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) होता है। यह वायरस शरीर में घुसकर चुपके से फैलता है और सालों तक कोई संकेत नहीं देता। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि अब तक ऐसे कैंसर की जांच के लिए कोई विश्वसनीय स्क्रीनिंग विधि नहीं थी। नतीजा, लोग तब जागते हैं जब ट्यूमर बड़ा हो चुका होता है और लक्षण साफ दिखने लगते हैं। उस वक्त तक कैंसर अक्सर लिम्फ ग्रंथियों तक पहुंच चुका होता है, जिससे इलाज मुश्किल और दर्दनाक बन जाता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की है, जिसका नाम रखा गया है एचपीवी-डीपसीक। यह तकनीक हाल ही में जर्नल ऑफ नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में छपी एक स्टडी के जरिए सामने आई है।

एचपीवी-डीपसीक की खासियत क्या है?

यह एक आधुनिक लिक्विड बायोप्सी परीक्षण है। आमतौर पर कैंसर डिटेक्ट करने के लिए डॉक्टर टिश्यू सैंपल लेते हैं और जांच करते हैं, लेकिन यहां सिर्फ खून का छोटा सा नमूना काफी है। इस विधि में पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग की जाती है, ताकि रक्त में घूमते एचपीवी वायरस के डीएनए के छोटे टुकड़ों को पकड़ा जा सके। ये टुकड़े तब निकलते हैं जब ट्यूमर से सेल्स टूटकर शरीर में फैलने लगते हैं। पहले की रिसर्च में यह पाया गया कि यह टेस्ट 99 प्रतिशत तक सटीक और संवेदनशील है, मतलब गलती की गुंजाइश न के बराबर।

स्टडी से क्या निकला?

मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के विशेषज्ञों ने 56 ब्लड सैंपल्स पर इस तकनीक को टेस्ट किया। इनमें आधे सैंपल उन लोगों के थे जो बाद में सिर-गर्दन कैंसर से पीड़ित हुए, और बाकी स्वस्थ व्यक्तियों के। नतीजे हैरतअंगेज थे, एचपीवी-डीपसीक ने 28 में से 22 मरीजों के सैंपल में पहले ही वायरस के निशान पकड़ लिए, जबकि स्वस्थ लोगों में कुछ नहीं मिला। सबसे पुराना पॉजिटिव सैंपल 7.8 साल पहले का था, यानी कैंसर का पता लगभग आठ साल पहले लग गया। जब इस टेस्ट को मशीन लर्निंग से जोड़ा गया, तो यह 28 में से 27 केस पकड़ने में कामयाब रहा, यहां तक कि 10 साल पुराने सैंपल्स में भी।

यह क्यों क्रांतिकारी है?

पहले सिर-गर्दन के एचपीवी से जुड़े कैंसर का पता तब चलता था जब ट्यूमर काफी विकसित हो चुका होता। लेकिन अब इस नई विधि से लक्षण आने से 10 साल पहले ही अलर्ट मिल सकता है। शुरुआती स्टेज में ट्रीटमेंट आसान होगा, कम दवाएं लगेंगी और रेडिएशन की जरूरत भी कम पड़ेगी। मरीजों की सर्वाइवल रेट बढ़ेगी, साथ ही इलाज का खर्च और मानसिक तनाव भी घटेगा।

आगे की राह

अब वैज्ञानिक इस तकनीक को बड़े स्तर पर आजमा रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) के नेतृत्व में एक बड़ा ट्रायल चल रहा है, जिसमें सैकड़ों ब्लड सैंपल्स की जांच होगी। ये सैंपल्स नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के पीएलसीओ (प्रोस्टेट, लंग, कोलोरेक्टल और ओवेरियन) स्क्रीनिंग प्रोग्राम से लिए गए हैं। अगर बड़े पैमाने पर भी यह सफल रही, तो जल्द ही यह एक सामान्य स्क्रीनिंग टेस्ट बन सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जो एचपीवी इंफेक्शन के रिस्क में हैं। एचपीवी-डीपसीक कैंसर रिसर्च में एक बड़ा कदम है। यह न सिर्फ एचपीवी से जुड़े सिर-गर्दन कैंसर को शुरुआत में पकड़ सकती है, बल्कि लक्षणों से कई साल पहले चेतावनी दे सकती है। अगर आने वाले ट्रायल्स में यह कामयाब रही, तो करोड़ों जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। कैंसर के खिलाफ जंग में यह खोज एक नई उम्मीद की किरण है, जहां समय पर पता चलने से न सिर्फ बेहतर इलाज संभव होगा बल्कि इस बीमारी का खौफ भी कम होगा।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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