नई दिल्ली: भारत में डायबिटीज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। करीब 7 करोड़ से ज्यादा लोग इसकी चपेट में हैं। लेकिन एक नई उम्मीद जगी है। दवाओं के बजाय सिर्फ लाइफस्टाइल चेंजेस से टाइप-2 डायबिटीज को कंट्रोल करने या यहां तक कि पूरी तरह उलटने का दावा एक ताजा भारतीय रिसर्च ने किया है। मुंबई बेस्ड फ्रीडम फ्रॉम डायबिटीज फाउंडेशन के इस स्टडी से साबित हुआ कि करीब एक तिहाई मरीजों ने बीमारी को पीछे धकेल दिया। यह खोज ‘प्लॉस वन’ जर्नल में छपी है और डॉक्टर्स समेत लाखों मरीजों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
स्टडी कैसे चली और क्या मिला?
रिसर्च का फोकस था, क्या भारत जैसे देश में इंटेंस लाइफस्टाइल प्रोग्राम्स डायबिटीज को रिवर्स कर सकते हैं? मई 2021 से अगस्त 2023 तक 2,300 से ज्यादा एडल्ट पेशेंट्स को लिया गया, जो एक साल के डिजिटल प्रोग्राम में शामिल हुए। इसमें प्लांट-बेस्ड ईटिंग, रेगुलर वर्कआउट, ग्रुप सेशंस, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और मेडिकेशन हैंडलिंग जैसी चीजें थीं। सब कुछ एक मोबाइल ऐप से छह एक्सपर्ट्स की टीम ने मॉनिटर किया। रिजल्ट? कुल 31% (744 लोग) ने डायबिटीज रेमिशन अचीव किया। मतलब, उनकी ब्लड शुगर लेवल नॉर्मल हो गई बिना किसी दवा के।
रेमिशन क्या बला है और कौन कर सकता है ये कमाल?
सीधे शब्दों में: अगर तीन महीने तक दवा बंद रखकर HbA1c लेवल 48 mmol/mol से नीचे रहे, तो इसे रेमिशन कहते हैं। स्टडी में पाया गया कि ये चांस सबसे ज्यादा उनमें थे जो:
- 50 साल से कम उम्र के
- हाई बॉडी मास इंडेक्स (BMI) वाले
- जिन्होंने कभी दवा नहीं ली
- डायबिटीज के सिर्फ 6 साल पुराने केस
- ये फैक्टर रिकवरी की कुंजी साबित हुए, जो बताता है कि शुरुआती स्टेज में एक्शन लेना कितना क्रूशियल है।
क्यों है ये स्टडी भारत के लिए स्पेशल?
भारत में डायबिटीज का आंकड़ा डराने वाला है, लेकिन ये पहली बार इतने बड़े स्केल पर लोकल पेशेंट्स पर टेस्ट किया गया। ऑनलाइन मोड की खासियत? ग्रामीण इलाकों वाले भी जुड़ सके। प्लस, प्रोग्राम को इंडियन कल्चर से मैच किया गया, हमारे देसी फूड्स और रूटीन को ध्यान में रखकर। शोधकर्ताओं का मानना है, ये साबित करता है कि महंगे हॉस्पिटल्स की बजाय स्मार्ट, एक्सेसिबल चेंजेस से जंग जीती जा सकती है। एक एक्सपर्ट ने कहा, ये न सिर्फ साइंस, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ा हल है। भारतीयों के लिए टेलर-मेड।
- इसको भी पढ़ें: धूम्रपान से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ा
चुनौतियां क्या हैं, और आगे क्या?
परफेक्ट तो कुछ नहीं होता। स्टडी रेट्रोस्पेक्टिव थी, यानी पुराने डेटा पर बेस्ड, और कंट्रोल ग्रुप की कमी से रिजल्ट्स पर सवाल उठ सकते हैं। सब्सक्रिप्शन बेस्ड प्रोग्राम था, तो फॉलो-अप न करने वालों को बाहर कर दिया गया, जिससे बायस का रिस्क है। हर पेशेंट पर इसे कॉपी-पेस्ट न करें, लेकिन ये एक मजबूत सिग्नल है। कुल मिलाकर, ये रिसर्च चिल्ला रही है: प्लांट-रिच डाइट, डेली मूवमेंट, स्ट्रेस मैनेजमेंट और स्मार्ट ड्रग यूज से डायबिटीज को किक आउट किया जा सकता है। खासकर युवा और न्यू केसेज में। भारत जैसे पॉपुलस कंट्री में ये मॉडल स्केल-अप हो तो करोड़ों लाइव्स चेंज हो सकती हैं। अगर आप या अपका कोई जानने वाला स्ट्रगल कर रहा, तो आज से छोटा स्टेप लें, डॉक्टर से बात करें, ऐप ट्राय करें। हेल्थ रिवोल्यूशन की शुरुआत यहीं से।



