नई दिल्ली: इस वर्ष मॉनसून (Monsoon) ने देश के कुछ हिस्सों में भारी तबाही तो मचाई, लेकिन कई इलाकों को सूखे की मार झेलनी पड़ी। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार, 25 सितंबर 2025 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में 87 प्रतिशत की भारी कमी के साथ सबसे कम वर्षा दर्ज की गई। जिले को कुल 97.2 मिलीमीटर बारिश मिली, जबकि सामान्य से यह 759.4 मिलीमीटर रहनी चाहिए थी। मॉनसून के 16 सप्ताहों में एक भी सप्ताह ऐसा नहीं रहा जब वर्षा सामान्य रही हो। आठ सप्ताहों में 90-100 प्रतिशत की कमी रही, जबकि बाकी आठ में 80-90 प्रतिशत तक घाटा हुआ।
ऐतिहासिक रूप से कम वर्षा का संकट
देवरिया कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक मांधाता सिंह का कहना है कि यह कमी ऐतिहासिक स्तर की है, जो उन्होंने कभी नहीं देखी। वे इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं, क्योंकि पिछले चार वर्षों से पूर्वांचल में ऐसी ही प्रवृत्ति दिख रही है। किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग की है, लेकिन प्रशासन ने अभी कोई कदम नहीं उठाया। इसका एक कारण जिले में अधिकांश कृषि भूमि का सिंचित होना है, जो तत्काल संकट को कम कर रहा है। 2024 में 43 प्रतिशत और 2023 में 46 प्रतिशत की कमी रही थी, जबकि 2020-2022 में सामान्य से अधिक वर्षा हुई थी।
पूर्वी यूपी पर सूखे की छाया
आईएमडी के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के 42 जिलों में कुल 16 प्रतिशत कम वर्षा हुई, जो सामान्य घाटे की सीमा में है। लेकिन देवरिया और पड़ोसी कुशीनगर ही ऐसे जिले हैं जहां भारी कमी (लार्ज डेफिसिट) दर्ज हुई। कुशीनगर में 64 प्रतिशत घाटा रहा। 2024 की आईएमडी रिपोर्ट में कुशीनगर को गंभीर सूखे का शिकार बताया गया था, जबकि देवरिया, चंदौली, फैजाबाद, फतेहपुर, गौतम बुद्ध नगर, पंचशील नगर, जौनपुर, ज्योतिबा फुले नगर, मऊ, मिर्जापुर, सीतापुर, उन्नाव, संतरविदास नगर और अमेठी मध्यम सूखे से प्रभावित थे। अधिकांश जिले पूर्वांचल के हैं। इस वर्ष पूर्वी यूपी के 50 प्रतिशत जिले (21 जिले) 20-59 प्रतिशत कमी वाले डेफिसिट श्रेणी में हैं। वहीं, पश्चिमी यूपी के 33 जिलों में 12 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई, जहां केवल पीलीभीत भारी कमी और पांच जिले (18 प्रतिशत) डेफिसिट श्रेणी में हैं।
मॉनसून का पूर्वांचल को छोड़ना
कुशीनगर के पडरौना निवासी किसान राजकुमार सिंह बताते हैं कि पिछले चार-पांच वर्षों से क्षेत्र में कम वर्षा के कारण धान की फसल पर 40-60 प्रतिशत तक असर पड़ रहा है। सिंचाई होने के बावजूद मॉनसून की कमी उत्पादन घटा रही है। वे कहते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पूर्वांचल को बायपास कर आगे बढ़ रहा है। आईएमडी के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। 2025 में पूर्वांचल के आजमगढ़ (40%), बलिया (21%), बस्ती (22%), भदोही (32%), चंदौली (39%), गाजीपुर (24%), गोरखपुर (43%), जौनपुर (44%), महाराजगंज (20%), मऊ (53%), संत कबीर नगर (53%) और सिद्धार्थनगर (33%) में भी कमी रही। मांधाता सिंह भी मानते हैं कि पूर्वांचल को मॉनसून नजरअंदाज कर रहा है, जबकि सटे बिहार के जिलों में भी जलवायु परिवर्तन से यही समस्या है। सिंचाई के कारण देवरिया में सूखे जैसी स्थिति नहीं बनी, लेकिन दीर्घकालिक खतरा बढ़ रहा है।



