नई दिल्ली: आकाश में दिखने वाले उपग्रह, ग्रह, टिमटिमाते तारे, आकाश गंगा समेत पूरे ब्रह्मांड की वजह क्या है, इसकी सटीक व्याख्या नहीं हो सकी है। अमेरिकी और जापानी वैज्ञानिक यही जानने के लिए काम कर रहे हैं। दोनों के प्रयोग साथ-साथ चल रहे हैं। इसमें जापान अभी आगे है। अगले तीन साल में उसको प्रयोग शुरू भी हो जाएगा। उधर, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसके लिए अमेरिका के साउथ डकोटा के जंगलों में एक लैब बनाई गई है। इसमें वह ऐसा डिटेक्टर बना रहे हैं, जिससे न्यूट्रिनो नामक सब-एटॉमिक पार्टिकल का अध्ययन किया जा सके।
बातचीत आगे बढ़ाएं, उससे पहले डिटेक्टर और न्यूट्रिनो को जान लेना जरूरी है। असल में डिटेक्टर ऐसा उपकरण है, जिसका इस्तेमाल किसी वस्तु की मौजूदगी का पता लगाने या मापने के लिए होता है। जबकि न्यूट्रिनो फोटॉन यानी प्रकाश कणों के बाद ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कण है। यह तारों के कोर में प्रचुर मात्रा में पैदा होता है। यह इतना सर्वव्यापी है कि इसका गुण ब्रह्मांड की सूक्ष्म संरचना में व्याप्त है।
अमेरिकी वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वह ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े सवाल का जवाब डीप अंडरग्राउंड न्यूट्रिनो एक्सपेरिमेंट (डून) से पता कर सकेंगे। इसमें धरती की सतह से 1,500 मीटर नीचे वैज्ञानिक विशाल भूमिगत सुरंग में जाएंगे। डून को बाहरी दुनिया से आने वाले शोर और विकिरणों से बचाने के लिए सील किया गया है। डॉ. जेरेट हेज, जो कि सैनफोर्ड अंडरग्राउंड रिसर्च फैसिलिटी (सर्फ) के डायरेक्टर हैं और सर्फ में इन सुरंगों के निर्माण से दस साल से जुड़े हैं, उन्होंने इसे कैथेड्रल टू साइंस यानी विज्ञान का गिरजाघर कहा है।
बीबीसी हिंदी में प्रकाशित एक लेख में डॉ. हेज वह बताते हैं कि हम ऐसा डिटेक्टर बना रहे हैं, जो ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल देगा। इसके लिए 35 देशों के 1400 वैज्ञानिकों के सहयोग से उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश होगी कि हमारा अस्तित्व क्यों है?
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यूं हुआ ब्रह्मांड का निर्माण
वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड का निर्माण दो पार्टिकल से हुआ। पहला मैटर- इससे तारे, ग्रह, उपग्रह समेत हमारे आस-पास की हर चीज बनी। जितनी मात्रा में यह बना, उतनी ही मात्रा में एंटी मैटर या पदार्थ का एकदम विपरीत तत्व भी बना। सैद्धांतिक तौर पर दोनों को एक-दूसरे को खत्म कर देना चाहिए था, जिससे ऊर्जा का बड़ा विस्फोट होने के अलावा कुछ नहीं बचता। फिर भी, पदार्थ के तौर पर हमारा वजूद बना हुआ है। वैज्ञानिकों का यकीन है कि पदार्थ क्यों जीता, हम क्यों मौजूद है, इसका जवाब न्यूट्रिनो नाम के सब पार्टिकल और उसके विपरीत एंटी मैटर या एंटी-न्यूट्रिनो के अध्ययन में मिलेगा।
इसके लिए भूमिगत सुरंग से 800 मील दूर साउथ डकोटा के डिटेक्टरों में दोनों तरह के पार्टिकल की बौछार की जाएगी। यह इसलिए कि जब पार्टिकल यात्रा करते हैं तो न्यूट्रिनो और एंटी-न्यूट्रिनो में मामूली बदलाव होता है। वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि क्या न्यूट्रिनो और एंटी-न्यूट्रिनो के लिए बदलाव अलग-अलग हैं। अगर वह अलग-अलग हैं तो इससे इस बात का जवाब मिल सकता है कि मैटर और एंटी-मैटर एक-दूसरे को पूरी तरह खत्म क्यों नहीं करते?
जापान भी कर रहा प्रयोग, अमेरिका से अभी आगे
जापानी वैज्ञानिक भी इसी जवाब की खोज के लिए चमकते हुए ग्लोब का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह विज्ञान के मंदिर जैसा है, जो साउथ डकोटा की लैब से 9,650 किमी दूर है। वैज्ञानिक यहां हाइपर-के का निर्माण कर रहे हैं। यह उनके मौजूदा न्यूट्रिनो डिटेक्टर, सुपर-के का बड़ा और बेहतर संस्करण है। तीन साल से कम समय में जापानी वैज्ञानिकों की टीम अपने न्यूट्रिनो बीम को चालू करने के लिए तैयार कर देगी। जबकि अमेरिकी वैज्ञानिकों को अपनी लैब एक्टिव करने में सालों लगेंगे। डून की तरह ही हाइपर-के को भी एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिला है।
अज्ञात को पहले जान लेने की होड़
अमेरिका और जापान में ब्रह्मांड की गुत्थी सुलझाने की जो होड़ लगी है, वैज्ञानिक उसे दूसरे नजरिए से देख रहे हैं। खगोल वैज्ञानिकों का मानना है कि दोनों को एक साथ चलने का मतलब है कि वैज्ञानिक ज्यादा सीखेंगे। डून प्रोजेक्ट से जुड़ी लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी की डॉ. लिंडा ने बीबीसी को बताया है कि इसमें रेस का भाव तो है, लेकिन हाइपर-के में अभी तक वे सभी तत्व नहीं हैं, जिनसे उन्हें न्यूट्रिनो और एंटी-न्यूट्रिनो के अलग-अलग व्यवहार का पता लग सके।



