नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कई अहम कदम उठाए गए हैं। इसमें एन्वायरनमेंट प्रोटेक्शन एक्ट में अहम बदलाव हुआ है, क्लाइमेट चेंज की चुनौतियों से निपटने के लिए दूसरी पहल भी हैं। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आई है। यूएनएफसीसीसी को सौंपी भारत की द्विवार्षिक रिपोर्ट इसकी तस्दीक भी करती है।
एन्वायरनमेंट प्रोटेक्शन एक्ट में अहम बदलाव
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने देश में दूषित स्थलों की पहचान और प्रबंधन के लिए पर्यावरण संरक्षण (दूषित स्थलों का प्रबंधन) नियम, 2025 अधिसूचित किए हैं। इसमें प्रदूषित स्थलों की पहचान, निर्धारण और उपचारण की प्रक्रिया को उपरोक्त नियमावली के अंतर्गत परिभाषित किया गया है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी)/प्रदूषण नियंत्रण समिति (पीसीसी) के जरिये ये काम किए जा रहे हैं। नियमों में निर्धारित जानकारी को ध्यान में रखते हुए संदूषकों से प्रभावित क्षेत्र की पहचान करने और केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर अपने अधिकार क्षेत्र में संदिग्ध दूषित स्थलों के रूप में ऐसे सभी क्षेत्रों की सूची बनाने का आदेश दिया गया है।
- संदिग्ध प्रदूषित स्थलों की सूची प्राप्त होने पर एसपीसीबी/पीसीसी को सूची मिलने के बाद नब्बे दिनों के भीतर संदिग्ध संदूषित स्थल का नमूना लेकर और विश्लेषण करके संदिग्ध संदूषित स्थल का प्रारंभिक स्थल मूल्यांकन करने का अधिदेश दिया गया।
- टिप्पणियां और सुझाव प्राप्त होने पर एसपीसीबी/पीसीसी को केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर दूषित स्थलों की अंतिम सूची प्रकाशित करने का आदेश दिया गया है।
सीपीसीबी ने पूरे देश में 103 संदूषित स्थलों की पहचान की है, जिनमें से सात स्थलों पर उपचारी कार्यकलाप शुरू किए गए हैं। इसमें अहम हैं, ओडिशा के गंजम में पारा दूषित स्थल, उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के रनिया में क्रोमियम दूषित स्थल, विभिन्न उद्योगों द्वारा अशोधित औद्योगिक बहिस्त्रावों के कारण लोहिया नगर और औद्योगिक क्षेत्र, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में भूजल संदूषण।
राष्ट्रीय ग्रीन हाउस गैस
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) का पक्षकार होने के नाते भारत आवधिक आधार पर यूएनएफसीसीसी को राष्ट्रीय संचार एवं द्विवार्षिक नवीएन रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। इन रिपोर्ट में राष्ट्रीय ग्रीन हाउस गैस इन्वेंटरी के लिए जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) दिशानिर्देशों पर आधारित राष्ट्रीय ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) की सूची शामिल है। यूएनएफसीसीसी को प्रस्तुत भारत की चौथी द्विवार्षिक रिपोर्ट (बीयोआर-4) के अनुसार, 2020 में शुद्ध जीएचजी उत्सर्जन 2,436.7 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड था और यूएनएफसीसीसी को प्रस्तुत तीसरे राष्ट्रीय संचार के अनुसार, 2019 में शुद्ध जीएचजी उत्सर्जन 2,646.6 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड था। राज्यस्तरीय जीएचजी इन्वेंटरी को यूएनएफसीसीसी को प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है और इसलिए भारत सरकार द्वारा तैयार नहीं की जाती है।
जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना
जलवायु परिवर्तन से चुनौतियों का सामना करने के लिए, भारत सरकार ने समावेशी नीतिगत उपायों, अनुकूलन, सुगमता-निर्माण और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने सहित कई पहल की हैं। जलवायु कार्रवाई से जुड़े प्रमुख कार्यक्रमों में तटीय, बाढ़ प्रवृत्त और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल आवास और बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के प्रयास शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दूर करने के लिए बहुआयामी रणनीति की रूपरेखा तैयार करती है। एनएपीसीसी के भाग के रूप में, राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन (एनएमएसएच) का उद्देश्य, अन्य बातों के साथ-साथ, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति शहरों के अनुकूलन का निर्माण करना और जलवायु संबंधी चरम घटनाओं और आपदा जोखिम से ‘बेहतर वापसी करने’ के लिए उनकी क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।
एनएपीसीसी के अंतर्गत राष्ट्रीय टिकाऊ कृषि मिशन (एनएमएसए) भारतीय कृषि को बदलती जलवायु के प्रति अधिक सुगम बनाने के लिए रणनीतियों को लागू करता है। एनएमएसए के अंतर्गत कई योजनाएं कृषि में प्रतिकूल जलवायु स्थितियों से निपटती हैं। प्रति बूंद अधिक फसल योजना सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों यानी ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता को बढ़ाती है। वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना उत्पादकता बढ़ाने और जलवायु परिवर्तनशीलता से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) को प्रोत्साहन देती है।



