नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में कचरे से बने पहाड़ साल भर चर्चा में रहते हैं। कूड़े के ये पहाड़ पर्यावरण को तो नुकसान पहुंचाते ही है साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के सबसे बड़े कचरा उत्पादक देशों में एक है। भारत में हर साल 60 करोड़ मीट्रिक टन कृषि अवशेष और 6 करोड़ टन नगरपालिका का ठोस कचरा पैदा होता है। इस कचरे को खुले में जलाने या लैंडफिल करने से वायु प्रदूषण होता है, जिसमें पार्टिकुलेट मैटर, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। किन्तु अब वैज्ञानिकों ने कचरे की इस समस्या का हल बायोचार के जरिए ढूंढ निकाला है।
क्या है बायोचार
बायोचार जिसे काला सोना भी कहा जाता है, एक कार्बन-युक्त चारकोल है जो कृषि अवशेषों, फसल के डंठल और जैविक कचरे को एक बंद प्रणाली में, कम ऑक्सीजन की उपस्थिति में, नियंत्रित रूप से गर्म करके बनाया जाता है, बायोचार बनाने की इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस कहते हैं।
बायोचार का उपयोग मिट्टी को सुधारने, कार्बन पृथक्करण (कार्बन को कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में वायुमंडल से हटाना) जल उपचार और कचरे के निपटान के लिए किया जाता है। यह मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करके कृषि उत्पादकता को बढ़ाता है और लंबे समय तक मिट्टी में कार्बन को स्थिर रखता है।

बायोचार से बनेगी बिजली,पानी और खाद
एक रिसर्च के मुताबिक यदि 30% से 50% कचरे का उपयोग कर लिया जाए, तो भारत 52.6 मिलियन टन बायोचार बना सकता है और 60 गीगाटन CO₂ बराबर कार्बन भी हटाया जा सकता है। इसके साथ कई प्रकार के उप-उत्पादों जैसे बायोगैस,जैव-तेल और सिंगैस आदि का निर्माण किया जा सकता है।
इन संसाधनों से हर साल 8.13 टेरावाट घंटे बिजली उत्पन्न हो सकती है जो भारत की कुल 0.5% बिजली की आवश्यकता के बराबर है और 6.47 लाख टन स्वच्छ पानी का उत्पादन किया जा सकता है। इसके अलावा, हर साल 12.9 मिलियन टन अतिरिक्त जैविक खाद बनाई जा सकती है।
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बायोचार के फायदे
बायोचार CO₂ को एक लाख वर्षों तक स्थिर रूप में मिट्टी में दबाये रख सकता है। इसके स्थिर गुण इसे कार्बन सिंक का प्रभावी माध्यम बनाते हैं। खेती में इसका उपयोग मिट्टी की जल धारण क्षमता, और गुणवत्ता बढ़ाता है । जिससे नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन 50%-80% तक कम हो सकता है। इसके अलावा इसे नीतिगत तौर पर सरकार की जलवायु परिवर्तन योजनाओं (जैसे स्टेट एक्शन प्लान) में शामिल किया जा सकता है ।
बायोचार कई तरह से हमारे पर्यावरण के लिए लाभदायक है, इस तकनीक से आज के शहरीकरण की कई सारी समस्याएं दूर हो सकती हैं। हालांकि, इन सब फ़ायदों के बावजूद बड़े स्तर पर स्वीकार्य करने में कई अड़चनें हैं। जैसे तकनीकी सीमाएं, अनुसंधान की कमी, निवेश का अभाव, बाजार की अनिश्चितता और नीतिगत समर्थन की कमी आदि ।



