बेंगलुरु, भारत। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत ने एक बार फिर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाई है। हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित ‘BRICS Heads of Space Agencies’ (HOSA) बैठक के समापन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने ‘BRICS स्पेस इकॉनमी’ की अवधारणा पेश की। यह पहल केवल तकनीक के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में विश्व अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला एक “अगला बड़ा कदम” है।
डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष का भविष्य अब किसी एक देश की ‘एकाकी’ यात्रा नहीं, बल्कि ‘साझा नवाचार’ और ‘सामूहिक महत्वाकांक्षा’ पर आधारित है। BRICS समूह, जिसमें अब ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं, के पास वह वैज्ञानिक क्षमता और औद्योगिक शक्ति है जो इसे विश्व के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का सबसे मजबूत स्तंभ बना सकती है।
सहयोग से ‘सह-निर्माण’ (Co-creation) की ओर
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है कि BRICS देश केवल परामर्श (Consultation) तक सीमित न रहें। हमें ‘सह-विकास’, ‘सह-नवाचार’ और ‘सह-निर्माण’ की दिशा में आगे बढ़ना होगा। बेंगलुरु में आयोजित इस दो-दिवसीय बैठक में ISRO की मेजबानी में सदस्य देशों के अंतरिक्ष प्रमुखों ने अंतरिक्ष स्थिरता, मलबे-मुक्त मिशन (Debris-free missions) और ‘BRICS रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन’ (RSSC) को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श किया।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम, जैसे चंद्रयान-3, आदित्य-एल1 और गगनयान की सफलता ने न केवल विज्ञान की सीमाओं को विस्तारित किया है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भी नए द्वार खोले हैं। यह सहयोग अब आपदा प्रबंधन, पृथ्वी अवलोकन और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में एक सशक्त माध्यम बन गया है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विकास यात्रा
BRICS की यात्रा 2006 में चार देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) के साथ शुरू हुई थी। समय के साथ, यह समूह आर्थिक और तकनीकी सहयोग का एक विशाल मंच बन गया है।
- शुरुआती दौर (2006-2010): BRIC का गठन वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक शासन पर चर्चा के लिए हुआ था। 2011 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह BRICS बना।
- अंतरिक्ष सहयोग: वर्षों से, BRICS सदस्य देशों ने रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट डेटा साझा करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। यह डेटा साझाकरण आपदा राहत और कृषि जैसे क्षेत्रों में गेम-चेंजर साबित हुआ है।
- वर्तमान विस्तार (2024-2026): हाल के वर्षों में नए सदस्यों (मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE आदि) के शामिल होने से इसकी भौगोलिक और आर्थिक पहुँच और अधिक व्यापक हो गई है। 2026 में भारत की अध्यक्षता में यह मंच अब ‘स्पेस इकॉनमी’ के एक नए विजन के साथ आगे बढ़ रहा है।
वर्तमान रुझान और तुलनात्मक विश्लेषण: 2026
वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। 2026 तक, वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का बाजार आकार लगभग $460-470 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
| मापदंड | 2026 का वैश्विक परिदृश्य | BRICS की क्षमता |
| बाजार आकार | ~$470 बिलियन (8% CAGR) | विश्व की आधी आबादी और एक-तिहाई GDP का आधार |
| मुख्य चालक | पुन: प्रयोज्य रॉकेट (Reusable Rockets), उपग्रह इंटरनेट | साझा उपग्रह तारामंडल (RSSC) और औद्योगिक साझेदारी |
| प्राथमिकता | अंतरिक्ष मलबा कम करना, स्थिरता | Debris-free मिशन और संयुक्त स्थिरता ढांचा |
तुलनात्मक विश्लेषण:
जहाँ पश्चिमी देशों और G7 का ध्यान मुख्य रूप से वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन और निजी उपग्रह ब्रॉडबैंड पर केंद्रित है, वहीं BRICS का दृष्टिकोण ‘मानवता-प्रथम’ और ‘विकासात्मक अनुप्रयोगों’ पर केंद्रित है। डॉ. जितेंद्र सिंह का विजन भारत के ‘NewSpace’ क्षेत्र के 400 से अधिक स्टार्टअप्स की ताकत को BRICS के विशाल औद्योगिक आधार के साथ जोड़ना है। भारत का लक्ष्य अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को अगले दशक में $45 बिलियन तक ले जाना है, जो इस पूरे ब्लॉक के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है।
निष्कर्ष
‘BRICS स्पेस इकॉनमी’ महज एक नारा नहीं है, बल्कि एक ठोस आर्थिक और तकनीकी एजेंडा है। जैसे-जैसे सदस्य देश अंतरिक्ष मलबे को कम करने और भविष्य के मिशनों (जैसे भारत का 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन) की दिशा में बढ़ रहे हैं, BRICS का सामूहिक प्रयास वैश्विक स्थिरता के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरेगा।



