नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है। जहां कभी चुनाव जाति, धर्म और क्षेत्रीय मुद्दों पर केंद्रित होते थे, वहीं अब महिलाओं को लक्षित करते हुए ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर’ की राजनीति तेजी से उभर रही है। यह बदलाव केवल नीतिगत नहीं बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुका है। आगामी चुनावों के मद्देनज़र कई राज्यों ने महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देने की योजनाओं को आगे बढ़ाया है।
4.1 करोड़ महिलाएं प्रत्यक्ष लाभार्थी
तमिलनाडु में महिलाओं को ‘स्पेशल समर पैकेज’ के तहत 2,000 रुपये दिए गए। असम में बिहू के अवसर पर 4,000 रुपये की सहायता दी गई। केरल में ‘स्त्री सुखम’ योजना के तहत करीब 10 लाख महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये मिल रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की राशि बढ़ाकर अतिरिक्त 500 रुपये कर दी गई है। इन चार राज्यों में ही लगभग 4.1 करोड़ महिलाएं प्रत्यक्ष लाभार्थी हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा बनती हैं। यह वर्ग अब चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगा है।
सालाना लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपये वितरित
पिछले पांच वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है। महिलाओं को नकद सहायता देने वाले राज्यों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है और देशभर में करीब 13 करोड़ महिलाओं को सालाना लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपये वितरित किए जा रहे हैं। हालांकि इस मॉडल का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है। झारखंड जैसे राज्य अपने ग्रामीण विकास बजट का लगभग 81 प्रतिशत हिस्सा इन योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों को सड़क, पुल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी परियोजनाओं में कटौती करनी पड़ी है, ताकि नकद योजनाओं को जारी रखा जा सके।
राजनीतिक दृष्टि से यह मॉडल प्रभावी साबित हुआ है। मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’ योजना, कर्नाटक की ‘गृह लक्ष्मी’ और ओडिशा की ‘सुभद्रा’ जैसी योजनाओं ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया है। इससे राजनीतिक दलों को यह संदेश मिला है कि प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना, लंबी विकास योजनाओं की तुलना में अधिक त्वरित राजनीतिक लाभ देता है।
नकद वितरण पर जोर
लेकिन क्या यह वास्तविक सशक्तिकरण है? आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब सरकारें विकास परियोजनाओं से संसाधन हटाकर नकद वितरण पर जोर देती हैं, तो दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। निवेश घटता है, रोजगार सृजन धीमा पड़ता है और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अंततः जिस महिला को आज 1,000 या 2,000 रुपये की सहायता मिल रही है, वही भविष्य में महंगाई, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और सीमित अवसरों की मार झेलने को मजबूर हो सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है। लेकिन सशक्तिकरण का अर्थ केवल नकद सहायता नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल, रोजगार और अवसरों तक पहुंच है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें अल्पकालिक राजनीतिक लाभ और दीर्घकालिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखें। अन्यथा ‘कैश ट्रांसफर’ की यह राजनीति देश को आत्मनिर्भर समाज की बजाय निर्भर समाज की ओर धकेल सकती है।



