भारत में ऊर्जा सांख्यिकी के नए युग की शुरुआत

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी डॉ. रंगन बनर्जी समिति की यह ऐतिहासिक रिपोर्ट भारत के ऊर्जा क्षेत्र में पारदर्शी, सटीक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों (डेटा) को शामिल करने का एक महा-प्रयास है। यह रिपोर्ट मुख्य रूप से 'नेट जीरो' (Net Zero) कार्बन उत्सर्जन और नवीकरणीय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को समय पर हासिल करने के लिए एक सुदृढ़, एकीकृत और वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार करने की वकालत करती है। जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के आंकड़ों में सुधार, अंतर-मंत्रालयी विसंगतियों को दूर करने और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) व ऑफ-ग्रिड बिजली खपत को मुख्यधारा में शामिल करने जैसी प्रमुख सिफारिशों के साथ यह रिपोर्ट साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी।

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नई दिल्ली: देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को एक नई और गतिशील दिशा देने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में पारदर्शी, सटीक और समयबद्ध आंकड़ों (डेटा) के महत्व को रेखांकित करते हुए सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने एक बेहद महत्वपूर्ण प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। इस आधिकारिक जानकारी के अनुसार, मंत्रालय ने ऊर्जा सांख्यिकी पर गठित एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति की विस्तृत और व्यापक रिपोर्ट को पूरी तरह से सार्वजनिक कर दिया है। यह कदम एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर उठाया गया है, जब भारत वैश्विक मंच पर नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के अपने अत्यंत महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने और ‘नेट जीरो’ (Net Zero) उत्सर्जन की आकांक्षाओं की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।

साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-based policymaking) को सशक्त बनाने और देश के तेजी से बदलते ऊर्जा परिदृश्य की प्रभावी व वास्तविक निगरानी के लिए एक सुदृढ़, व्यापक और एकीकृत ऊर्जा सांख्यिकी ढांचे की आवश्यकता काफी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इस दिशा में डॉ. रंगन बनर्जी समिति की यह रिपोर्ट एक युगांतकारी मील का पत्थर साबित होगी।

समिति की संरचना और गहन समीक्षा प्रक्रिया

इस अत्यधिक महत्वपूर्ण समिति का गठन सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के प्रतिष्ठित और विख्यात निदेशक डॉ. रंगन बनर्जी की अध्यक्षता में किया गया था। समिति की संरचना को केवल सरकारी गलियारों तक सीमित न रखकर बेहद व्यापक, समावेशी और बहु-विषयक बनाया गया था। इसमें देश के विभिन्न ऊर्जा मंत्रालयों (जैसे कोयला, बिजली, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय) के वरिष्ठ नीति निर्माताओं और प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था। इसके साथ ही, ऊर्जा अनुसंधान के क्षेत्र में देश की अग्रणी और प्रतिष्ठित संस्थाओं, जैसे ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (TERI – टेरी) और ऊर्जा कुशल अर्थव्यवस्था गठबंधन (AEEE) के वरिष्ठ विषय विशेषज्ञों को भी इस पैनल का हिस्सा बनाया गया था।

इस उच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल ने सांख्यिकी मंत्रालय के प्रमुख वार्षिक प्रकाशन “एनर्जी स्टैटिस्टिक्स इंडिया” और भारत के संपूर्ण ऊर्जा सांख्यिकी डेटाबेस की बेहद गहराई और बारीकी से समीक्षा की। इस व्यापक समीक्षा प्रक्रिया के अंतर्गत वर्तमान डेटा के दायरे, विभिन्न तकनीकी परिभाषाओं, वर्गीकरण प्रणालियों, डेटा संग्रह के प्राथमिक स्रोतों और डेटा का अनुमान लगाने की वर्तमान पद्धतियों का गहन और आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया। समिति ने मुख्य रूप से अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि किस प्रकार भारत के ऊर्जा आंकड़ों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के समकक्ष लाया जाए, विभिन्न मंत्रालयों के बीच डेटा में मौजूद पुरानी विसंगतियों और विचलनों को समूल नष्ट किया जाए, और मांग व आपूर्ति के स्तर पर दिखने वाली बड़ी कमियों (Data Gaps) को पूरी तरह से भरा जाए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और ऊर्जा सांख्यिकी का इतिहास

यह समझने के लिए कि यह रिपोर्ट भारत के लिए कितनी क्रांतिकारी है, हमें भारत में ऊर्जा सांख्यिकी के इतिहास और इसके विकासक्रम पर एक नजर डालनी होगी।

1. स्वतंत्रता के बाद का प्रारंभिक दौर (1947-1970)

स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत का ध्यान मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे के विकास पर था। उस समय ऊर्जा का मतलब केवल कोयला, रेलवे के लिए ईंधन और शुरुआती पनबिजली (Hydro Power) परियोजनाओं तक सीमित था। डेटा संग्रह का काम पूरी तरह से विकेंद्रीकृत था। कोयला मंत्रालय अपने स्तर पर उत्पादन के आंकड़े रखता था, जबकि तत्कालीन बिजली विभाग अपने स्तर पर ग्रिड की स्थिति देखता था। इस दौर में किसी एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा संतुलन (National Energy Balance) की कोई अवधारणा मौजूद नहीं थी।

2. योजना आयोग का दौर और डेटा का केंद्रीकरण (1970-1990)

1973 के वैश्विक तेल संकट के बाद भारत सरकार को यह अहसास हुआ कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए डेटा का एक जगह होना कितना जरूरी है। योजना आयोग (Planning Commission) ने पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण के लिए विभिन्न मंत्रालयों से डेटा एकत्र करना शुरू किया। इसी दौर में सांख्यिकी मंत्रालय को मजबूत किया गया, लेकिन डेटा का प्राथमिक स्रोत अभी भी अलग-अलग मंत्रालय ही थे, जिनके बीच आपस में कोई डिजिटल लिंक या समन्वय नहीं था।

3. उदारीकरण और “एनर्जी स्टैटिस्टिक्स इंडिया” की शुरुआत (1990-2010)

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद जब निजी क्षेत्र ने ऊर्जा उत्पादन में कदम रखा, तो अधिक पारदर्शी और सटीक डेटा की मांग तेजी से बढ़ी। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने “एनर्जी स्टैटिस्टिक्स इंडिया” नामक वार्षिक रिपोर्ट का प्रकाशन शुरू किया। इसने पहली बार देश को एक ही दस्तावेज में कोयला, कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और बिजली के उत्पादन और खपत का एक व्यापक खाका प्रदान किया। हालांकि, इसमें गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा जैसे जैव ईंधन (बायोमास) और ऑफ-ग्रिड डेटा को बड़े पैमाने पर छोड़ दिया जाता था।

ऐतिहासिक तुलना: पहले की प्रणालियों बनाम वर्तमान रुझान और सिफारिशें

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि डॉ. रंगन बनर्जी समिति की सिफारिशें भारत की पुरानी सांख्यिकीय व्यवस्था में किस प्रकार का आमूलचूल परिवर्तन ला रही हैं और यह वैश्विक रुझानों से कैसे मेल खाती हैं:

सांख्यिकीय घटकपारंपरिक/पुरानी प्रणाली (भूतकाल)वर्तमान रुझान और बनर्जी समिति की सिफारिशें (भविष्य)वैश्विक मानक और प्रभाव
वर्गीकरण प्रणालीस्थानीय और प्रशासनिक श्रेणियों पर आधारित, जो समय के साथ पुरानी हो चुकी थीं।अंतर्राष्ट्रीय मानक औद्योगिक वर्गीकरण (ISIC Rev 5), NIC-2025 और SIEC का पूर्ण अंगीकरण।डेटा वैश्विक स्तर पर तुलनीय बनेगा; अंतर्राष्ट्रीय निवेशक भारतीय ऊर्जा बाजार को आसानी से समझ सकेंगे।
रूपांतरण कारक (Conversion Factors)विभिन्न मंत्रालय (कोयला, पेट्रोलियम, बिजली) ऊर्जा इकाइयों को मापने के लिए अपने-अपने अलग कारकों का उपयोग करते थे।सभी ऊर्जा मंत्रालयों के लिए देश भर में एक समान और मानकीकृत रूपांतरण कारकों का अनिवार्य उपयोग।अंतर-मंत्रालयी डेटा में मौजूद विसंगतियां और भ्रम पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे।
कोयला खपत का डेटाआयातित कोयले (20%) और नीलामी वाले घरेलू कोयले का क्षेत्रीय अंतिम उपयोग स्पष्ट नहीं था।वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) डेटाबेस का कुशलतापूर्वक उपयोग कर उद्योग-वार खपत का सटीक पता लगाना।कोयले के वास्तविक उपयोग की सटीक मैपिंग से कार्बन उत्सर्जन का सही आकलन संभव होगा।
बायोफ्यूल (जैव ईंधन)प्रमाणित राष्ट्रीय डेटा का पूर्ण अभाव; संयुक्त राष्ट्र (UNSCD) द्वारा केवल अनुमानों पर निर्भरता (31-34%)।राष्ट्रीय ऊर्जा संतुलन तालिका में जैव ईंधन को शामिल करने के लिए एक वैज्ञानिक और व्यापक कार्यप्रणाली का विकास।भारत के वास्तविक ऊर्जा उपभोग की सही तस्वीर दुनिया के सामने आएगी, जिससे वैश्विक दबाव कम होगा।
नए युग की ऊर्जा (EV और ऑफ-ग्रिड)डेटा का एक बड़ा शून्य (Data Vacuum); सौर पैनलों और इलेक्ट्रिक वाहनों की खपत का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं।प्रारंभिक और व्यावहारिक कार्यप्रणालीगत ढांचे की शुरुआत, जिसे भविष्य में और परिष्कृत किया जाएगा।नेट जीरो (Net Zero) और ग्रीन ग्रिड की वास्तविक प्रगति की सटीक निगरानी संभव होगी।

रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें और उनका गहरा विश्लेषण

रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले डॉ. रंगन बनर्जी समिति ने एक अत्यंत व्यापक और सहभागी विचार-विमर्श की प्रक्रिया को अपनाया। इसके तहत संबंधित मंत्रालयों, स्वायत्त सरकारी एजेंसियों और इस क्षेत्र के शीर्ष अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विषय विशेषज्ञों के साथ कई दौर की तकनीकी बैठकें और गहन परामर्श किए गए। इस महा-मंथन से जो प्रमुख सिफारिशें निकलकर आई हैं, वे भारत में ऊर्जा डेटा प्रबंधन की पूरी रूपरेखा और दर्शन को बदलने की क्षमता रखती हैं।

1. वैश्विक मानकों का पूर्ण अंगीकरण (Global Benchmarking)

समिति ने सबसे प्रमुख संस्तुति यह की है कि भारत को ऊर्जा सांख्यिकी के संग्रह, संकलन और उसके प्रसार में पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय मानकों को अपनाना चाहिए। इसके तहत भारतीय डेटा को:

  • अंतर्राष्ट्रीय मानक औद्योगिक वर्गीकरण (ISIC) संशोधन पांच
  • राष्ट्रीय औद्योगिक वर्गीकरण (NIC)-2025
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा उत्पाद वर्गीकरण (SIEC)

जैसी वैश्विक प्रणालियों के अनुरूप सारणीबद्ध श्रेणियों में विभाजित किया जाना चाहिए। जब भारत इन प्रणालियों को अपनाएगा, तो वैश्विक सांख्यिकीय मंचों पर भारत के डेटा की विश्वसनीयता रातों-रात बढ़ जाएगी।

इसके साथ ही, समिति ने देश के सभी ऊर्जा मंत्रालयों से एक समान रूपांतरण कारकों (Conversion Factors) को लागू करने का पुरजोर आग्रह किया है। उदाहरण के लिए, जब कोयले की ऊर्जा को किलोकैलोरी से मिलियन टन तेल समकक्ष (MTOE) में बदला जाता है, तो बिजली मंत्रालय और कोयला मंत्रालय के गणित में अंतर नहीं होना चाहिए। इससे अंतर-मंत्रालयी समरूपता और शुद्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।

2. कोयला क्षेत्र की विसंगतियों का व्यावहारिक समाधान

कोयला क्षेत्र में डेटा की विसंगतियों को दूर करने के लिए समिति ने एक बेहद व्यावहारिक और लीक से हटकर कार्यप्रणाली का सुझाव दिया है। वर्तमान में भारत में कुल कोयला खपत का लगभग बीस प्रतिशत (20%) हिस्सा आयातित कोयले का है। इसके अलावा, खुले बाजार में नीलामी (Auction) के माध्यम से बेचे जाने वाले घरेलू कोयले को भी अब तक एक विविध और अस्पष्ट श्रेणी में रखा जाता रहा है।

बड़ी समस्या: इस अस्पष्टता के कारण इस कोयले के वास्तविक क्षेत्रीय अंतिम उपयोग (Sectoral End-Use) का सटीक पता लगाना बेहद कठिन होता था कि यह अंततः किस उद्योग या कारखाने में जलाया जा रहा है।

इस गंभीर कमी को दूर करने के लिए विशेषज्ञ समिति ने वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) डेटाबेस का कुशलतापूर्वक उपयोग करने की पद्धति सुझाई है। एएसआई डेटाबेस में वर्तमान में कोयले की उद्योग-वार खपत का एक सीमित लेकिन बेहद महत्वपूर्ण और सत्यापित डेटा मौजूद है। इसके उपयोग से अब कोयले के एक-एक किलोग्राम की सटीक ट्रैकिंग संभव हो सकेगी।

3. ऊर्जा दक्षता और पीएटी (PAT) योजना का सुदृढ़ीकरण

देश में ऊर्जा की बर्बादी को रोकने और ऊर्जा बचत को बढ़ावा देने के लिए समिति ने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) को विशेष रूप से निर्देशित करने की सिफारिश की है। समिति के अनुसार, बीईई को अपनी महत्वाकांक्षी ‘परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड’ यानी पीएटी (PAT – पेट) योजना के अंतर्गत एक अत्यंत व्यापक, गतिशील और रीयल-टाइम डेटाबेस विकसित करना चाहिए और उसका निरंतर रखरखाव सुनिश्चित करना चाहिए।

बिजली की खपत के मामले में भी ऐसी ही एकरूपता लाने के लिए समिति ने वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के माध्यम से देश भर में उद्योग-वार बिजली की अंतिम खपत को संकलित और प्रसारित करने की एक समान व्यवस्था लागू करने पर बल दिया है, जिससे यह पता चल सके कि देश का कौन सा औद्योगिक क्षेत्र सबसे अधिक ऊर्जा-कुशल है।

जैव ईंधन (बायोफ्यूल) का चौंकाने वाला सच और वैश्विक अनुमानों का खेल

इस पूरी रिपोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाला और नीतिगत रूप से संवेदनशील बिंदु जैव ईंधन (Biofuel/Biomass) की खपत से जुड़ा है। भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी बड़े पैमाने पर जलावन लकड़ी, कृषि अवशेष और गोबर के उपलों का उपयोग ऊर्जा के रूप में किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर इस जैव ईंधन से संबंधित प्रमाणित, वैज्ञानिक और समेकित आंकड़ों का अभाव लंबे समय से बना हुआ है।

इसी डेटा शून्यता (Data Vacuum) के कारण संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी प्रभाग (UNSCD) अपने वार्षिक वैश्विक प्रकाशन ‘विश्व ऊर्जा संतुलन’ (World Energy Balances) में भारत की कुल वार्षिक ऊर्जा खपत का लगभग इकतीस से चौंतीस प्रतिशत (31-34%) हिस्सा केवल जैव ईंधन की खपत के रूप में दिखाता है! सबसे बड़ी बात यह है कि यह विशाल आंकड़ा किसी जमीनी सर्वेक्षण पर आधारित नहीं होता, बल्कि पूरी तरह से उनके स्वयं के काल्पनिक अनुमानों और आकलनों पर आधारित होता है।

भारत जैसे वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर देश के लिए इस महत्वपूर्ण मोर्चे पर डेटा की यह कमी नीति निर्माण में एक बहुत बड़ी बाधा थी। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को एक ऐसे देश के रूप में पेश किया जाता था जो अपनी ऊर्जा के लिए अभी भी पारंपरिक स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर है। विशेषज्ञ समिति ने इस गंभीर अंतर को पहचानते हुए भारत की राष्ट्रीय ऊर्जा संतुलन तालिका (National Energy Balance Table) में जैव ईंधन के घटक को सही, वैज्ञानिक और सर्वेक्षण-आधारित तरीके से शामिल करने के लिए एक बेहद वैज्ञानिक और व्यापक कार्यप्रणाली विकसित करने की पुरजोर संस्तुति की है।

नए युग की चुनौतियाँ: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और ऑफ-ग्रिड डेटा का शून्य

आधुनिक दौर में ऊर्जा क्षेत्र बहुत तेजी से बदल रहा है। आज देश में दो सबसे तेजी से उभरते हुए घटक सामने आए हैं:

  1. कैप्टिव या ऑफ-ग्रिड मोड (Captive/Off-grid Mode): कारखानों या सोसायटियों द्वारा ग्रिड से अलग हटकर खुद के सौर पैनलों या रूफटॉप प्रणालियों के माध्यम से होने वाली बिजली का उत्पादन और खपत।
  2. इलेक्ट्रिक वाहन (EV): देश की सड़कों पर तेजी से दौड़ रहे लाखों इलेक्ट्रिक वाहनों द्वारा चार्जिंग स्टेशनों और घरों में की जाने वाली बिजली की कुल खपत।

अब तक इन दोनों ही क्षेत्रों को लेकर देश के आधिकारिक ऊर्जा आंकड़ों में एक बहुत बड़ा शून्य मौजूद था। कोई नहीं जानता था कि वास्तव में कितनी बिजली ग्रिड के बाहर पैदा हो रही है और कितनी बिजली सीधे वाहनों की बैटरियों में जा रही है।

इस ऐतिहासिक रिपोर्ट में इन दोनों ही सांख्यिकीय कमियों को बहुत ही प्रमुखता और जिम्मेदारी के साथ संबोधित किया गया है। समिति ने इस दिशा में एक प्रारंभिक और व्यावहारिक कार्यप्रणालीगत ढांचा (Methodological Framework) प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट में यह भी साफ कर दिया गया है कि इस शुरुआती ढांचे को भारत के आधिकारिक ऊर्जा-संतुलन डेटाबेस में पूरी तरह से समाहित करने के लिए देश के नीतिगत उपयोगकर्ताओं, सांख्यिकीविदों और शोधकर्ताओं द्वारा भविष्य में और अधिक परिष्कृत (Refine) तथा उन्नत (Advance) किए जाने की आवश्यकता होगी।

यह रिपोर्ट ‘नेट जीरो’ और नवीकरणीय लक्ष्यों को कैसे गति देगी?

भारत ने साल 2070 तक नेट जीरो (Net Zero) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, और साथ ही 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का संकल्प लिया है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बनर्जी समिति की रिपोर्ट एक ‘कंट्रोल रूम’ की तरह काम करेगी:

  • सटीक कार्बन अकाउंटिंग (Carbon Accounting): जब हमारे पास कोयले, गैस और जैव ईंधन के उपयोग का एक-एक यूनिट का सटीक डेटा होगा, तभी हम यह जान पाएंगे कि हमारा वास्तविक कार्बन उत्सर्जन कितना है और हमें उसे कहां से कम करना है।
  • हरित निवेश को बढ़ावा (Green Investment): अंतरराष्ट्रीय निवेशक (जैसे वैश्विक पर्यावरण कोष या बड़े विदेशी बैंक) केवल तभी भारत के नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाएंगे जब उन्हें पारदर्शी, अंतरराष्ट्रीय मानकों (ISIC, SIEC) पर खरा उतरने वाला डेटा मिलेगा।
  • ग्रिड स्थिरता (Grid Stability): ऑफ-ग्रिड सौर ऊर्जा और ईवी चार्जिंग के सटीक आंकड़ों से बिजली कंपनियों (DISCOMs) को यह योजना बनाने में मदद मिलेगी कि उन्हें किस समय ग्रिड में कितनी बिजली की जरूरत है, जिससे बिजली गुल होने की समस्या खत्म होगी।

निष्कर्ष: एक सहयोगात्मक भविष्य की पुकार

इस ऐतिहासिक रिपोर्ट में शामिल सभी विचार-विमर्शों और तकनीकी सत्रों का एक बेहद विस्तृत और पारदर्शी विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसका मुख्य और अंतिम उद्देश्य भारत की संपूर्ण ऊर्जा सांख्यिकी प्रणाली को ढांचागत रूप से सुदृढ़ बनाना, इसकी विश्लेषणात्मक उपयोगिता को बढ़ाना और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल तथा एकरूपता को मजबूत करना है।

इन दूरगामी सिफारिशों के लागू होने से न केवल देश में प्रामाणिक साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को जबरदस्त बल मिलेगा, बल्कि विभिन्न प्रकार के ऊर्जा आंकड़ों की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी तुलनीयता (Comparability) में भी व्यापक सुधार देखने को मिलेगा।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अंत में एक बहुत ही स्पष्ट और सशक्त संदेश दिया है कि इन विशेषज्ञ सिफारिशों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने और भारत को एक अधिक एकीकृत, विश्वसनीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ऊर्जा सांख्यिकी ढांचा प्रदान करने के लिए सभी संबंधित मंत्रालयों, नीति नियंताओं, देश के शीर्ष शोध संस्थानों और औद्योगिक हितधारकों के बीच एक निरंतर, सक्रिय और सहयोगात्मक समन्वय की आवश्यकता होगी। यह रिपोर्ट भारत के हरित और ऊर्जा-सुरक्षित भविष्य की नींव है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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