सौर-इतिहास: जब AI ने खोली कोड़ाईकनाल की 100 साल पुरानी ‘सूरज’ की फाइलें

भारतीय वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके कोड़ाईकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी के 1916 से 2007 तक के हाथ से बने सूर्य के चित्रों को डिजिटल डेटा में बदला है। यह नई तकनीक हमें सूर्य की चुंबकीय हलचल को बेहतर ढंग से समझने और भविष्य में अंतरिक्ष के खतरों को पहचानने में मदद करेगी।

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कोड़ाईकनाल, तमिलनाडु: क्या आपने कभी सोचा है कि 100 साल पहले हमारे खगोलविदों ने जब आसमान की ओर देखा होगा, तो उन्होंने सूर्य की रहस्यों से भरी गतिविधियों को कैसे दर्ज किया होगा? आज के दौर में हमारे पास अंतरिक्ष में तैनात अत्याधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल सेंसर हैं, लेकिन 1916 के उस दौर में विज्ञान केवल धैर्य और कागज-कलम पर टिका था। कोड़ाईकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी (KoSO) में वैज्ञानिकों ने 1904 से लेकर 2022 तक सूर्य की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को ‘सनचार्ट्स’ (Suncharts) पर अपनी आंखों से देखकर हाथ से ड्रा किया। अब, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से, यह दशकों पुराना और धूल खा रहा ज्ञान आधुनिक खगोल विज्ञान के लिए एक सोने की खान बनकर उभरा है।

इतिहास के पन्नों में सूर्य की हलचल (History of Solar Observation)

सूर्य कोई स्थिर गोला नहीं है, बल्कि यह एक विशाल और अशांत चुंबकीय भट्टी है। इसमें होने वाली हलचलें, जैसे सनस्पॉट्स (Sunspots) और प्लेजेस (Plages – चमकीले चुंबकीय पैच), पृथ्वी पर मौजूद हमारी तकनीकी सभ्यता को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। सौर ज्वालाएं (Solar Flares) और कोरोनल मास इजेक्शन (CME) हमारे सैटेलाइट्स, जीपीएस नेविगेशन, रेडियो संचार और बिजली ग्रिडों को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं।

1916 से 2007 के बीच, कोड़ाईकनाल के खगोलविदों ने सूर्य की इन गतिविधियों को बेहद बारीकी से दर्ज किया। उस समय यह काम पूरी तरह मैनुअल था—पेंसिल, स्केल और हाथों का कौशल। लेकिन समस्या यह थी कि ये रिकॉर्ड्स ‘अव्यवस्थित’ थे। कागज का समय के साथ पीला पड़ना, स्याही का फैलना, स्कैन की खराब गुणवत्ता, और सबसे बड़ी बात—हर वैज्ञानिक की ड्राइंग बनाने की अपनी अलग शैली। पारंपरिक सांख्यिकीय तरीकों से इस विशाल डेटा को एक व्यवस्थित रूप देना असंभव जैसा था। यह इतिहास का एक ऐसा पन्ना था जो बंद पड़ा था, क्योंकि हम उसे आज की भाषा (डिजिटल डेटा) में नहीं पढ़ पा रहे थे।

AI और U-Net का तकनीकी हस्तक्षेप

आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES) के डॉ. दिव्य कीर्ति मिश्रा और उनकी टीम ने इस चुनौती को सुलझाने के लिए आधुनिक मशीन लर्निंग का सहारा लिया। उन्होंने U-Net नामक एक एडवांस्ड डीप लर्निंग आर्किटेक्चर का उपयोग किया। इस शोध को दो चरणों में अंजाम दिया गया:

  1. जियोमेट्रिक अलाइनमेंट (स्थान निर्धारण): मशीन लर्निंग मॉडल ने सबसे पहले हजारों पुरानी स्कैन की गई ड्राइंग्स का विश्लेषण किया। उसने स्वचालित रूप से यह पता लगाया कि सूर्य का डिस्क (गोला) कहाँ है, उसका केंद्र क्या है, आकार कितना है और कागज पर वह किस झुकाव (tilt) पर है। इससे लाखों चित्रों में से प्रत्येक फीचर को एक मानक ग्रिड पर बिठाना संभव हुआ।
  2. प्लेजेस की ट्रेसिंग (विशेषताओं की पहचान): दूसरे चरण में, AI ने सूर्य की सतह पर मौजूद ‘प्लेजेस’ को पहचाना। प्लेजेस वास्तव में सूर्य की चुंबकीय सक्रियता के “फिंगरप्रिंट” होते हैं। मॉडल ने नौ सौर चक्रों के डेटा को स्कैन किया और यह पता लगाया कि 1916 से 2007 के बीच ये चुंबकीय पैच कैसे बदलते रहे।

तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक बनाम आधुनिक रुझान

आज की तकनीक और पुराने समय के अवलोकन के बीच का यह अंतर समझना बहुत जरूरी है:

तुलनात्मक आधारपुराना तरीका (1916-2007)आधुनिक तरीका (AI-आधारित)
डेटा संग्रहहाथ से ड्राइंग (मैन्युअल)डिजिटल सैटेलाइट सेंसर
सुसंगतताअलग-अलग ड्राइंग शैलियाँमशीन द्वारा मानकीकृत डेटा
प्रोसेसिंग समयवर्षों की मेहनतघंटों में विश्लेषण
उपयोगिताकेवल ऐतिहासिक रिकॉर्डभविष्य की भविष्यवाणी में सहायक

वर्तमान रुझान: आज खगोल विज्ञान में ‘डिजिटल रिकंस्ट्रक्शन’ का चलन है। हम अब केवल भविष्य की घटनाओं को नहीं देख रहे, बल्कि अतीत को फिर से जी रहे हैं। कोड़ाईकनाल का यह डेटा अब डिजिटल ‘बटरफ्लाई डायग्राम’ के रूप में मौजूद है, जो बताता है कि सूर्य की सक्रियता का चक्र किस तरह एक लय में चलता है। यह डेटा हमें यह समझने में मदद करता है कि क्या आज के सौर चक्र पिछले सौ सालों के चक्रों से अधिक शक्तिशाली हैं या कमजोर।

क्यों जरूरी है यह शोध?

लंबे समय तक चलने वाले और सटीक सौर रिकॉर्ड्स हमें सौर चक्रों की प्रकृति को समझने में मदद करते हैं। जब हम 100 साल के डेटा को एक फ्रेम में देखते हैं, तो हमें सूर्य के चुंबकीय व्यवहार के वे बड़े पैटर्न दिखते हैं जो एक छोटे समय अंतराल में दिखाई नहीं देते। यह न केवल हमारे ब्रह्मांडीय ज्ञान को बढ़ाता है, बल्कि उन ‘स्पेस वेदर’ जोखिमों को भी कम करता है जो आधुनिक तकनीक पर निर्भर हमारी दुनिया के लिए खतरा हैं।

संक्षेप में, यह शोध अतीत की हस्तलिखित विरासत और भविष्य के डिजिटल युग के बीच का एक मजबूत पुल है। कोड़ाईकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी का यह काम साबित करता है कि विज्ञान में कोई भी जानकारी पुरानी नहीं होती, बस उसे देखने के लिए सही तकनीक और दृष्टि की आवश्यकता होती है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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