वैज्ञानिकों ने खोजा धातुओं का रंग और रूप बदलने का अनोखा तरीका!

बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक खोज की है। उन्होंने दिखाया है कि किसी धातु (Metal) पर थोड़ा सा दबाव या तनाव (Strain) डालकर यह बदला जा सकता है कि वह धातु रोशनी के साथ कैसा व्यवहार करती है। अब तक भौतिकी में माना जाता था कि धातुओं के ये गुण कभी नहीं बदले जा सकते। इस नई तकनीक से भविष्य में बेहद एडवांस सेंसर, कैंसर का पता लगाने वाली मशीनें और सुपरफास्ट लाइट-बेस्ड कंप्यूटर चिप्स बनाना मुमकिन होगा।

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बेंगलुरु / नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि किसी धातु (जैसे सोना, तांबा या एल्युमिनियम) का चमकने या रोशनी को मोड़ने का तरीका बदला जा सकता है? सदियों से विज्ञान की किताबों में यही पढ़ाया गया है कि एक बार जो धातु चुन ली गई, रोशनी के प्रति उसका व्यवहार हमेशा एक जैसा ही रहेगा। लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से पलट दिया है।

बेंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के शोधकर्ताओं ने पहली बार दुनिया को दिखाया है कि अगर किसी धातु पर मैकेनिकल स्ट्रेन (यानी खिंचाव या दबाव) डाला जाए, तो उसके ऑप्टिकल गुण (रोशनी के साथ तालमेल बिठाने की क्षमता) को अपनी मर्जी से बदला या ट्यून किया जा सकता है। यह खोज भविष्य में ऐसी ‘प्रोग्रामेबल’ ऑप्टिकल डिवाइसेस बनाने का रास्ता साफ करेगी, जिन्हें हम कंप्यूटर चिप्स के अंदर आसानी से फिट कर सकेंगे।

इस खोज के पीछे का विज्ञान: ‘प्लास्मोन रेजोनेंस’ क्या है?

आम भाषा में समझें तो धातुएं रोशनी को बहुत छोटे से दायरे में समेटने और कैद करने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। विज्ञान की भाषा में इस घटना को प्लास्मोन रेजोनेंस (Plasmon Resonance) कहा जाता है।

धातु के भीतर मौजूद इलेक्ट्रॉन कितनी तेजी से कंपन (oscillate) करते हैं, उसे प्लाज्मा फ्रीक्वेंसी (Plasma Frequency) कहते हैं। अब तक माना जाता था कि यह फ्रीक्वेंसी फिक्स होती है। लेकिन प्रो. बीवास साहा और उनकी छात्रा दीक्षा दाधीच की टीम ने इस नियम को बदल दिया।

वैज्ञानिकों ने सोने जैसी दिखने वाली और बेहद मजबूत धातु टाइटेनियम नाइट्राइड (TiN) की 10 नैनोमीटर जितनी पतली परतें बनाईं। यह इंसानी बाल से भी हजारों गुना पतली है। उन्होंने पाया कि जब इस परत पर थोड़ा सा खिंचाव (tensile strain) पैदा किया गया, तो इसके भीतर नाइट्रोजन की कुछ खाली जगहें (vacancies) बन गईं। इन खाली जगहों ने इलेक्ट्रॉन की संख्या को बढ़ा दिया, जिससे धातु की प्लाज्मा फ्रीक्वेंसी बदल गई और रोशनी का रंग (स्पेक्ट्रम) ‘ब्लू शिफ्ट’ (Blue Shift) यानी उच्च ऊर्जा की तरफ खिसक गया।

इतिहास और वर्तमान रुझान: एक तुलनात्मक विश्लेषण (Comparative Analysis)

इस खोज के महत्व को समझने के लिए हमें इसके इतिहास और वर्तमान तकनीक पर नजर डालनी होगी:

विशेषता / कालखंडपारंपरिक इतिहास (Past Approach)वर्तमान रुझान (Current Trends)JNCASR की नई खोज (The Breakthrough)
धातुओं के प्रति धारणाधातुओं के ऑप्टिकल गुण और फ्रीक्वेंसी हमेशा के लिए फिक्स (अपरिवर्तनीय) माने जाते थे।वैज्ञानिक केवल बनावट (Nanostructuring) बदलकर थोड़ा-बहुत बदलाव कर पाते थे।पूरी तरह लचीला: केवल भौतिक खिंचाव देकर धातु के बुनियादी गुणों को बदला जा सकता है।
चिप मैन्युफैक्चरिंगपुरानी तकनीकें वर्तमान सेमीकंडक्टर (CMOS) चिप फैक्ट्रियों के अनुकूल नहीं थीं।नए प्रयोगों में महंगी और दुर्लभ धातुओं का उपयोग हो रहा था जो चिप्स के लिए अव्यावहारिक थीं।100% अनुकूल: टाइटेनियम नाइट्राइड का उपयोग मौजूदा कंप्यूटर चिप फैक्ट्रियों में आसानी से हो सकता है।
डिवाइस का प्रकार‘स्टैटिक’ यानी जो एक बार बन गया, वह केवल एक ही काम कर सकता था।सेमी-एक्टिव, जहां बाहरी माध्यमों (dielectrics) पर निर्भर रहना पड़ता था।‘प्रोग्रामेबल’ और ‘एक्टिव’: बटन दबाते ही कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए धातु का व्यवहार बदला जा सकेगा।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है? (भविष्य के फायदे)

यह खोज प्रयोगशाला से निकलकर जब हमारे दैनिक जीवन में आएगी, तो बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:

  • सुपरफास्ट इंटरनेट और कंप्यूटर: आज के कंप्यूटर बिजली (इलेक्ट्रॉन) पर चलते हैं। भविष्य में यह तकनीक सीधे प्रकाश (फोटॉन्स) से चलने वाली चिप्स बनाने में मदद करेगी, जिससे कंप्यूटर की स्पीड लाखों गुना बढ़ जाएगी और वे गर्म भी नहीं होंगे।
  • सटीक मेडिकल जांच (कैंसर डायग्नोस्टिक्स): इस तकनीक से ऐसे बेहद संवेदनशील सेंसर्स बनेंगे जो खून की एक बूंद में मौजूद कैंसर की कोशिकाओं या बीमारियों के शुरुआती लक्षणों को तुरंत पकड़ लेंगे।
  • स्मार्ट चश्मे और लेंस: ऐसे लेंस बनाना संभव होगा जो बिजली या दबाव के हल्के से झटके से अपनी फोकस दूरी और रंग बदल सकेंगे।

इस रिसर्च में भारत के वैज्ञानिकों के साथ ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी के डॉ. मैग्नस गार्ब्रेक्ट, विजय भाटिया और आशालता इंदीरादेवी कमलासनन पिल्लई ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा समर्थित यह खोज नैनो-फोटोनिक्स की दुनिया में एक मील का पत्थर है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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