बढ़ता तापमान, बढ़ता खतरा: विदेशी चींटियां घरों से बाहर फैलने को तैयार

एक ताजा शोध के अनुसार, विदेशी चींटियों की कुछ प्रजातियां, जो अब तक घरों, इमारतों और ग्रीनहाउस जैसे गर्म स्थानों तक सीमित थीं, अब बढ़ते तापमान के कारण बाहरी वातावरण में भी पनपने की क्षमता हासिल कर रही हैं। यह बदलाव भारत सहित दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्रों, कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

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नई दिल्ली: वैश्विक तापमान में वृद्धि ने एक नए खतरे को जन्म दिया है। एक ताजा शोध के अनुसार, विदेशी चींटियों की कुछ प्रजातियां, जो अब तक घरों, इमारतों और ग्रीनहाउस जैसे गर्म स्थानों तक सीमित थीं, अब बढ़ते तापमान के कारण बाहरी वातावरण में भी पनपने की क्षमता हासिल कर रही हैं। यह बदलाव भारत सहित दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्रों, कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

शोध में खुलासा: तापमान बढ़ने से चींटियों का खतरा

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन, जो जर्नल डाइवर्सिटी एंड डिस्ट्रीब्यूशन्स में प्रकाशित हुआ, ने इस खतरे को रेखांकित किया है। शोधकर्ताओं ने चींटियों को दो श्रेणियों में बांटा: ‘इनडोर-रिस्ट्रिक्टेड’ चींटियां, जो केवल घरों और ग्रीनहाउस जैसे नियंत्रित माहौल में रहती हैं, और ‘नेचुरलाइज्ड’ चींटियां, जो बाहरी वातावरण में भी जीवित रह सकती हैं। अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा, विशेष रूप से उत्तरी गोलार्ध के ठंडे क्षेत्रों में, ये इनडोर चींटियां बाहरी माहौल में ढलने लगेंगी। प्रमुख शोधकर्ता डॉ. टोबी सैंग ने बताया, “ये चींटियां घरों और इमारतों में छिपकर अपनी आबादी बढ़ाती हैं। ठंडे क्षेत्रों में ये इमारतें उनके लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह काम करती हैं। जैसे ही बाहर का तापमान उनके अनुकूल होगा, ये चींटियां तेजी से बाहर फैलेंगी, जिसका स्थानीय जैव-विविधता पर गहरा असर पड़ेगा।”

विदेशी चींटियां: छोटा आकार, बड़ा खतरा

विदेशी चींटियों का छोटा आकार उन्हें पहचानना मुश्किल बनाता है। ये चींटियां लगभग हर प्रकार का भोजन खा सकती हैं और घरों के भीतर उनके प्राकृतिक शिकारी भी नहीं होते। इस वजह से ये आसानी से अपनी कॉलोनियां स्थापित कर लेती हैं। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों, जैसे अमेरिका के फ्लोरिडा और ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में, ये चींटियां पहले ही बाहरी वातावरण में फैल चुकी हैं। लेकिन ठंडे क्षेत्रों, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में, ये अब तक घरों तक सीमित थीं। बढ़ता तापमान अब इन्हें बाहर फैलने का मौका दे रहा है। उदाहरण के लिए, वास्मानिया ऑरोपंक्टाटा, जिसे ‘लिटिल फायर एंट’ या ‘इलेक्ट्रिक एंट’ के नाम से जाना जाता है, एक खतरनाक विदेशी प्रजाति है। यह छोटी, सुनहरे-भूरे रंग की चींटी मध्य और दक्षिण अमेरिका की मूल निवासी है, लेकिन अब यह पांच महाद्वीपों में फैल चुकी है। भारत में यह ग्रीनहाउस और इमारतों में पाई जाती है। इस चींटी को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने दुनिया की 100 सबसे खतरनाक आक्रामक प्रजातियों में शामिल किया है। इसका डंक इतना तेज होता है कि यह मनुष्यों और जानवरों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें आंखों की रोशनी जाने का खतरा भी शामिल है।

पारिस्थितिकी और कृषि पर खतरा

ये विदेशी चींटियां स्थानीय प्रजातियों, कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं। ये हानिकारक कीटों, जैसे एफिड्स, को शिकारियों से बचाती हैं ताकि वे उनसे ‘हनीड्यू’ नामक मिठास युक्त तरल प्राप्त कर सकें। इससे फसलों को नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा, ये चींटियां स्थानीय चींटियों और अन्य छोटे जीवों को विस्थापित कर देती हैं, जिससे जैव-विविधता पर असर पड़ता है। भारत में हाल के एक अध्ययन, जो जर्नल इकोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुआ, ने दिखाया कि हिमालयी क्षेत्रों में ओकोफिला प्रजाति की चींटियां पक्षियों की विविधता को प्रभावित कर रही हैं।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत में गर्म और आर्द्र जलवायु विदेशी चींटियों के लिए अनुकूल है। बढ़ते तापमान के साथ, ये चींटियां अब ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में फैल सकती हैं। खासकर दक्षिण और पूर्वी भारत के तटीय क्षेत्रों में इनके फैलने की संभावना अधिक है। आर्जेंटीनियन एंट, जो अपनी आक्रामक प्रकृति के लिए जानी जाती है, भारत के कई हिस्सों में पहले ही देखी जा चुकी है। ये चींटियां स्थानीय प्रजातियों के साथ संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं।

निगरानी और नियंत्रण की जरूरत

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इन चींटियों की निगरानी और नियंत्रण के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। डॉ. सैंग के अनुसार, अगर हम अभी सतर्क नहीं हुए, तो ये चींटियां पारिस्थितिकी, कृषि और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती हैं। भारत में जहां जैव-विविधता पहले से ही जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के दबाव में है, इन आक्रामक प्रजातियों को रोकना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि आयातित सामानों की कड़ी जांच, ग्रीनहाउस और इमारतों में नियमित निगरानी, और स्थानीय समुदायों को जागरूक करना इस खतरे को कम करने में मदद कर सकता है। साथ ही, तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक कोशिशें भी जरूरी हैं।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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