नई दिल्ली: हर साल मानसून (Monsoon Disasters) के दौरान भारत में बाढ़, भूस्खलन, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से ये प्राकृतिक आपदाएं और भी विकराल रूप ले रही हैं। साल 2025 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बादल फटने से धराली गांव में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में भी जून 2025 की भारी बारिश ने भूस्खलन और बाढ़ का कहर बरपाया, जिसने कई परिवारों को बेघर कर दिया। एक गैर-सरकारी संगठन के अनुमान के अनुसार, मंडी की सराज घाटी में लगभग 25 गांव इन आपदाओं से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पिछले साल केरल के वायनाड में भी ऐसी ही त्रासदी देखने को मिली थी। गृह मंत्रालय ने 6 अगस्त 2025 को संसद में बताया कि जनवरी से जुलाई 2025 तक देशभर में मौसमी आपदाओं ने 1,626 लोगों की जान ले ली और कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया।
राज्यों में मौतों का आंकड़ा डराने वाला
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस साल मौसम से संबंधित आपदाओं ने कई राज्यों में भारी तबाही मचाई है। आंध्र प्रदेश में 343, मध्य प्रदेश में 243 और हिमाचल प्रदेश में 195 लोगों की मौत हुई है। कर्नाटक (102) और बिहार (101) में भी मृतकों की संख्या 100 से अधिक रही। केरल में 97, महाराष्ट्र में 90, राजस्थान में 79, उत्तराखंड में 71, गुजरात में 70, जम्मू-कश्मीर में 37, असम में 32 और उत्तर प्रदेश में 23 लोगों की जान गई। कुल मिलाकर, देश में हुई कुल मौतों का 60% से अधिक हिस्सा इन पांच राज्यों—आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और बिहार में दर्ज किया गया। ये आंकड़े जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को रेखांकित करते हैं।
किसानों और पशुधन पर भारी मार
इन आपदाओं का असर सिर्फ मानव जीवन तक सीमित नहीं रहा। मंत्रालय के अनुसार, पिछले सात महीनों में 52,367 मवेशी मारे गए और 157,818 हेक्टेयर क्षेत्र में फसलें नष्ट हुईं। महाराष्ट्र में सबसे अधिक 91,429 हेक्टेयर फसलों को नुकसान हुआ, जबकि असम में 30,474.89 हेक्टेयर, कर्नाटक में 20,245 हेक्टेयर, मेघालय में 6,372.30 हेक्टेयर और पंजाब में 3,569.11 हेक्टेयर फसलें बर्बाद हुईं। पशुधन के मामले में हिमाचल प्रदेश में 23,992 मवेशी मारे गए, जबकि असम में 14,269 और जम्मू-कश्मीर में 11,067 पशुधन की हानि हुई। उत्तराखंड में भी 9.47 हेक्टेयर फसलों और 67 मवेशियों का नुकसान दर्ज किया गया। ये आंकड़े किसानों के लिए दोहरी मार साबित हुए हैं, क्योंकि उनकी आजीविका फसलों और पशुधन पर निर्भर है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ये आंकड़े अस्थायी हैं और राज्यों से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं।
आपदा प्रबंधन और चेतावनी तंत्र में सुधार
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति (NDMA) के तहत प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, जबकि केंद्र सरकार सहायता प्रदान करती है। गृह मंत्रालय ने बताया कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने बिजली गिरने और तूफानों की चेतावनी के लिए उन्नत तकनीक विकसित की है। यह सिस्टम सैटेलाइट, रडार और 102 सेंसरों के ग्राउंड-बेस्ड लाइटनिंग नेटवर्क के जरिए जिला स्तर पर सटीक जानकारी देता है। इसके अलावा, पुणे के भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम संस्थान ने 112 सेंसरों वाला एक वज्रपात निगरानी नेटवर्क स्थापित किया है, जो पूरे देश को कवर करता है। इस नेटवर्क पर आधारित ‘दामिनी’ मोबाइल ऐप 20-40 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बिजली गिरने की पूर्व चेतावनी देता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 28 फरवरी 2025 को बिजली, आंधी, ओलावृष्टि और तेज हवाओं से निपटने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।
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जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत रणनीति की जरूरत
ये आपदाएं न केवल मानव जीवन और आजीविका को प्रभावित कर रही हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को भी उजागर कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता को कम करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों की जरूरत है। इसमें वनों का संरक्षण, टिकाऊ कृषि पद्धतियां और बेहतर आपदा प्रबंधन प्रणालियां शामिल हैं। सरकार और समाज को मिलकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम किया जा सके।



