नई दिल्ली: अल नीनो (El Nino) को लंबे समय से भारत में मानसून की कमजोरी और सूखे की वजह माना जाता रहा है। लेकिन साइंस जर्नल में प्रकाशित एक ताजा शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है। यह अध्ययन बताता है कि अल नीनो के दौरान भारत के नम क्षेत्रों में भारी और खतरनाक बारिश की संभावना बढ़ जाती है। यह नया खुलासा न केवल मानसून की प्रकृति को समझने में मदद करता है, बल्कि बाढ़ और तबाही से बचाव के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत को भी रेखांकित करता है।
पहले क्या थी सोच?
अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसका नाम स्पेनिश में ‘छोटा लड़का’ है। इसमें प्रशांत महासागर का पूर्वी हिस्सा गर्म हो जाता है, जिससे हवाओं का पैटर्न बदलता है और वैश्विक मौसम प्रभावित होता है। भारत में अल नीनो को हमेशा कम बारिश और सूखे से जोड़ा गया। वैज्ञानिकों का मानना था कि यह मानसून को कमजोर करता है। लेकिन पिछले अध्ययन ज्यादातर पूरे मानसून सीजन की औसत बारिश पर केंद्रित थे, न कि रोजाना की भारी बारिश पर। नया शोध इस कमी को दूर करता है और रोजमर्रा की चरम बारिश पर फोकस करता है।
आंकड़ों ने खोला राज
शोधकर्ताओं ने 1901 से 2020 तक भारतीय मौसम विभाग के बारिश के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया। साथ ही, 1979 से 2020 तक के वायुमंडलीय डेटा का अध्ययन कर चरम मौसमी घटनाओं के कारणों को समझा। नतीजे बताते हैं कि अल नीनो का असर पूरे भारत में एकसमान नहीं है। सूखे इलाकों जैसे दक्षिण-पूर्व और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश और भारी वर्षा की घटनाएं कम हो जाती हैं। लेकिन मध्य और दक्षिण-पश्चिम भारत जैसे नम क्षेत्रों में बारिश कम दिनों तक होती है, लेकिन जब होती है तो बेहद तीव्र और विनाशकारी होती है। वैज्ञानिक इसे ‘कन्वेक्टिव बॉयेंसी’ से जोड़ते हैं, जो तूफानों को शक्ति देती है।
भारी बारिश का खतरा कितना बड़ा?
अध्ययन के मुताबिक, अल नीनो के दौरान नम क्षेत्रों में यह बॉयेंसी बढ़ जाती है, जिससे मूसलाधार बारिश की आशंका 43% तक बढ़ जाती है। मध्य भारत के मानसूनी क्षेत्रों में यह जोखिम 59% तक बढ़ सकता है। मजबूत अल नीनो में यह खतरा और गहरा होता है। ऐसी बारिशें बाढ़ ला सकती हैं, जो गांवों को डुबो देती हैं, फसलों को बर्बाद करती हैं और लाखों लोगों की आजीविका को प्रभावित करती हैं। शोधकर्ता प्रो. राघवेंद्र शर्मा कहते हैं, यह सिर्फ वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से जुड़ा सवाल है।
क्या है समाधान?
यह शोध बेहतर मौसम पूर्वानुमान की जरूरत को रेखांकित करता है। सटीक भविष्यवाणियों से सरकारें और किसान पहले से तैयारी कर सकते हैं। अल नीनो और ला नीना के प्रभावों को समझकर बाढ़ प्रबंधन, कृषि योजना और आपदा राहत को मजबूत किया जा सकता है। इससे न केवल जीवन और संपत्ति की रक्षा होगी, बल्कि मानसून की अनिश्चितता से होने वाले नुकसान को भी कम किया जा सकेगा।
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आज के लिए सबक
यह अध्ययन हमें सिखाता है कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसे मौसमी पैटर्न भारत के लिए नई चुनौतियां ला रहे हैं। हमें मौसम विज्ञान में निवेश, बाढ़-रोधी बुनियादी ढांचे और टिकाऊ खेती पर ध्यान देना होगा। अगर हम अभी कदम नहीं उठाएंगे, तो भारी बारिश और बाढ़ का खतरा और बढ़ेगा। यह समय है कि भारत अपनी जलवायु रणनीति को और मजबूत करे, ताकि मानसून की मार से बचा जा सके।



