‘अजेय योद्धा’ Jellyfish: जो जलवायु संकट में भी कर रही है राज

आज विश्व जेलीफिश दिवस पर, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के कहर से जूझ रही है, ये 'समुद्री भूत' न सिर्फ जीवित हैं, बल्कि और भी ताकतवर होकर उभर रही हैं। आखिर क्यों ये जीव ग्लोबल वार्मिंग के 'विनर' बन गए हैं? चलिए, इस रहस्यमयी दुनिया में गोता लगाते हैं।

Share This Article:

नई दिल्ली: विशाल महासागरों में जहां मछलियां सांस लेने को तड़प रही हैं, कोरल रीफ्स सफेद पड़कर मर रही हैं, वहां एक चमकदार, पारदर्शी जीव नाच रहा है जैसे कोई जीत का जश्न मना रहा हो। जी हां, हम बात कर रहे हैं जेलीफिश (Jellyfish) की। आज विश्व जेलीफिश दिवस पर, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के कहर से जूझ रही है, ये ‘समुद्री भूत’ न सिर्फ जीवित हैं, बल्कि और भी ताकतवर होकर उभर रही हैं। आखिर क्यों ये जीव ग्लोबल वार्मिंग के ‘विनर’ बन गए हैं? चलिए, इस रहस्यमयी दुनिया में गोता लगाते हैं।

गर्म होते समुद्र: जेलीफिश का ‘परफेक्ट स्टॉर्म’

आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट्स बता रही हैं कि पिछले 50 सालों में समुद्रों का तापमान 0.88 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ चुका है। 1990 के दशक से ये रफ्तार और तेज हो गई। नतीजा? समुद्री पानी में ऑक्सीजन कम हो रहा है, अम्लता बढ़ रही है, और पोषक तत्वों का जखीरा उफान पर है। ज्यादातर समुद्री प्राणी जैसे मछलियां और शैवाल इन हालातों में तड़प उठते हैं। लेकिन जेलीफिश? ये तो ऐसे फल-फूल रही हैं जैसे उन्हें ये सब ‘पर्सनल इनवाइटेशन’ मिला हो। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्म पानी इन्हें तेजी से बढ़ने और फैलने में मदद करता है।

‘बूम’ की कहानी: 1950 से 68 जगहों पर ‘जेलीफिश पार्टी’

कल्पना करें, जापान के तट पर 2005 में 50 करोड़ जेलीफिश का झुंड आ धमका इतना बड़ा कि मछली पकड़ने वाले जहाज डूबने लगे। पहले ये ‘मेगा-ब्लूम’ हर 40 साल में एक बार होते थे, लेकिन अब? हर साल!

ग्लोबल स्टडीज दिखाती हैं कि 1950 के बाद कम से कम 68 समुद्री इलाकों में जेलीफिश की संख्या दोगुनी-तिगुनी हो चुकी है। ब्लैक सी, नामीबिया के तट, यहां तक कि भूमध्य सागर – हर जगह ये ‘बूम’ हो रही हैं। ये सिर्फ नेचर का खेल नहीं, बल्कि हम इंसानों की करतूतों का आईना है: प्रदूषण, ओवरफिशिंग और ग्लोबल वार्मिंग।

खतरे की घंटी: जेलीफिश का ‘डार्क साइड’

ये सुंदर लगने वाली जेलीफिश असल में समुद्री दुनिया के लिए ‘ट्रबलमेकर’ बन गई हैं। देखिए कैसे:

  • मछुआरों का सिरदर्द: जालों में फंसकर नेट फाड़ देती हैं, जिससे करोड़ों का नुकसान।
  • बीच का मजा खराब: तटीय इलाकों में स्नान करने वालों को डंक मारकर डराती हैं – हर साल हजारों पर्यटक प्रभावित।
  • समुद्री जीवन पर हमला: छोटी मछलियों को खा जाती हैं या उनके गलफड़ों में अटककर दम घोंट देती हैं।
  • इंडस्ट्री का दुश्मन: न्यूक्लियर प्लांट्स के कूलिंग सिस्टम में घुसकर शटडाउन करा देती हैं, जैसे 2011 में स्वीडन में हुआ।
  • ये सब मिलाकर समुद्री फूड चेन को उलट-पुलट कर रही हैं – जहां मछलियां कम होंगी, वहां जेलीफिश का राज होगा।

आखिर क्यों ये ‘सुपरहीरो’ बन गईं?

जेलीफिश की सफलता के पीछे छिपे राज जान लीजिए:

  • गर्मी का तोहफा: कोरल रीफ्स गर्मी से मरकर खाली जगह छोड़ रही हैं, जिसे जेलीफिश भर ले रही हैं।
  • एसिडिक पानी का फायदा: CO2 से समुद्र अम्लीय हो रहा है, जो कोरल को मार रहा है लेकिन जेलीफिश को सूट करता है।
  • पोषण का जादू: नदियों से आने वाला खाद और सीवेज ‘यूट्रोफिकेशन’ पैदा करता है। शैवाल फूलते हैं, सड़ते हैं, ऑक्सीजन खत्म होता है। ‘डेड जोन्स’ में जेलीफिश आराम से तैरती हैं।
  • शिकारियों की कमी: ट्यूना, समुद्री कछुए जैसे प्रीडेटर्स ओवरफिशिंग से गायब हो रहे, जेलीफिश को फ्री रन मिल रहा।
  • मानवीय ‘होस्टल’: डॉक्स, पियर्स और शिप्स के नीचे उनके लार्वा (पॉलीप्स) चिपककर पनपते हैं।

अमरता का रहस्य: जेलीफिश जो मरती ही नहीं

साइंस फिक्शन लगे, लेकिन सच है। टुरिटोप्सिस डोर्नाई (इमॉर्टल जेलीफिश) नाम की प्रजाति तनाव में अपनी कोशिकाओं को रिवाइंड कर पॉलीप स्टेज पर लौट जाती है। मरना? नामुमकिन है। इसी तरह मून जेलीफिश में रिजनरेशन पावर है। वैज्ञानिक इसे स्टेम सेल रिसर्च के लिए स्टडी कर रहे हैं, कल को कैंसर ट्रीटमेंट में काम आए। अब मजेदार ट्विस्ट: ये ‘विलेन’ हीरो बन सकती हैं। ‘गोजेली प्रोजेक्ट’ में साइंटिस्ट्स जेलीफिश के म्यूकस से माइक्रोप्लास्टिक फिल्टर बना रहे हैं। कल्पना कीजिए, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में ये फिल्टर प्लास्टिक को फंसाकर समुद्र को साफ करेंगे। जेलीफिश हमें सिखा रही हैं, संकट में भी मौके छिपे हैं। जेलीफिश की ये ‘विजय’ जलवायु संकट की चेतावनी है। अगर हमने प्रदूषण नहीं रोका, ओवरफिशिंग नहीं रोकी, तो आने वाले दशकों में समुद्र मछलियों के बजाय जेलीफिश से भरे होंगे। लेकिन उम्मीद है कि आज के इस दिवस पर वादा करें, समुद्र को बचाने का। आप क्या सोचते हैं? कमेंट में बताएं, और इस स्टोरी को शेयर करें ताकि ज्यादा लोग जागरूक हों।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.