गोवा, भारत: 27 जून 2026 की दोपहर, गोवा शिपयार्ड लिमिटेड के प्रांगण में एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना। भारतीय तटरक्षक बल के बेड़े में ‘ICGS अक्षय’ के शामिल होने के साथ ही देश की समुद्री सीमाएं और अधिक सुरक्षित हो गई हैं। वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग की अतिरिक्त सचिव (कार्मिक) सुश्री परमा सेन द्वारा औपचारिक रूप से इस जहाज को सेवा में समर्पित किया गया। इस अवसर पर तटरक्षक बल के वरिष्ठ अधिकारी, गोवा सरकार के प्रतिनिधि और GSL के विशेषज्ञ उपस्थित थे।
‘अक्षय’ की सामरिक भूमिका
‘अक्षय’ महज एक जहाज नहीं, बल्कि भारत की समुद्री सुरक्षा का एक चलता-फिरता किला है। फास्ट पेट्रोल वेसल (FPV) होने के नाते, इसकी विशेषताएं इसे विशिष्ट बनाती हैं:
- समुद्री कानून प्रवर्तन: अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर।
- खोज और बचाव (SAR): संकट में फंसे नाविकों और मछुआरों के लिए फरिश्ता।
- तटीय सुरक्षा: समुद्री सीमाओं की अभेद्य निगरानी।
- पर्यावरण संरक्षण: तेल रिसाव जैसी समुद्री आपदाओं से निपटने में सक्षम।
भारतीय तटरक्षक बल: एक गौरवशाली इतिहास
भारतीय तटरक्षक बल का इतिहास भारत की समुद्री संप्रभुता के प्रति सतर्कता की कहानी है। 1960 के दशक में समुद्र के रास्ते होने वाली तस्करी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई थी। उस समय नौसेना को बार-बार तटीय गश्त के लिए बुलाया जाता था।
इतिहास के पन्नों को पलटें, तो 1971 में नागाचौधरी समिति ने पहली बार एक समर्पित समुद्री सुरक्षा बल की आवश्यकता महसूस की। इसके बाद रुस्तमजी समिति की सिफारिशों पर, 1 फरवरी 1977 को एक अंतरिम तटरक्षक बल का गठन हुआ। अंततः, 18 अगस्त 1978 को संसद के ‘तटरक्षक अधिनियम, 1978’ के तहत इसे भारतीय संघ के एक सशस्त्र बल के रूप में औपचारिक स्थापना मिली।
शुरुआत में नौसेना से मिले दो छोटे कॉर्वेट और पांच गश्ती नौकाओं से काम शुरू करने वाला यह बल, आज 150 से अधिक जहाजों और दर्जनों विमानों के बेड़े के साथ दुनिया के सबसे सशक्त तटरक्षक बलों में से एक बन चुका है। 2008 के मुंबई हमलों के बाद, सरकार ने इसके आधुनिकीकरण पर विशेष जोर दिया, जिससे आज यह समुद्र का ‘अजेय रक्षक’ बन गया है।
तुलनात्मक विश्लेषण: कल और आज का समुद्री परिदृश्य
यदि हम पिछले पांच दशकों का विश्लेषण करें, तो भारतीय तटरक्षक बल का विकास अभूतपूर्व रहा है:
| मानदंड | स्थापना काल (1977-78) | वर्तमान समय (2026) |
| दृष्टिकोण | सीमित तस्करी विरोधी भूमिका | बहुआयामी समुद्री सुरक्षा बल |
| स्वदेशीकरण | विदेशी प्लेटफॉर्मों पर निर्भर | ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत 100% स्वदेशी डिजाइन और निर्माण |
| तकनीकी क्षमता | बुनियादी निगरानी | रडार नेटवर्क, एयर सर्विलांस और आधुनिक सेंसर युक्त |
| क्षेत्रीय प्रभाव | तटों तक सीमित | EEZ (विशेष आर्थिक क्षेत्र) और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र तक विस्तार |
आज की स्थिति यह है कि भारत अब केवल एक ‘खरीदने वाला’ देश नहीं, बल्कि अत्याधुनिक युद्धपोत और गश्ती जहाज ‘बनाने वाला’ राष्ट्र बन गया है। INS विक्रांत से लेकर ICGS अक्षय तक का सफर इस बात का प्रमाण है कि भारतीय शिपयार्डों की क्षमता वैश्विक स्तर की है।
निष्कर्ष: भविष्य की ओर बढ़ते कदम
ICGS अक्षय की कमीशनिंग इस निरंतर आधुनिकीकरण का एक हिस्सा है। कमांडेंट (JG) दीपक चौबे की कमान में यह जहाज भारतीय तटरक्षक बल की उस परंपरा को आगे बढ़ाएगा, जिसका मंत्र है: “वयम रक्षामः” (हम रक्षा करते हैं)।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प के साथ, भारत न केवल अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर रहा है, बल्कि समुद्र में एक जिम्मेदार शक्ति (Responsible Oceanic Power) के रूप में भी उभरा है। अक्षय का आगमन न केवल समुद्री सुरक्षा को मजबूती देगा, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए हमें और अधिक लचीला और आत्मनिर्भर बनाएगा।



