दादरी, उत्तर प्रदेश: भारतीय समुद्री और विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र के इतिहास में आज का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने आज उत्तर प्रदेश के दादरी में स्थित मर्श-कॉनकॉर (Maersk-CONCOR) इनलैंड कंटेनर डिपो में भारत में निर्मित पहले एक्सपोर्ट-इंपोर्ट (EXIM) शिपिंग कंटेनर का अनावरण किया। यह कंटेनर दुनिया की दिग्गज शिपिंग कंपनी ए.पी. मोलर-मर्श (A.P. Moller–Maersk) के लिए तैयार किया गया है।
यह सफलता केवल लोहे का एक डिब्बा तैयार करने जैसी नहीं है, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के सपनों को हकीकत में बदलने की दिशा में एक बहुत बड़ा और ठोस कदम है।
इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत के उभरते हुए कंटेनर निर्माण उद्योग पर भरोसा जताते हुए, मर्श (Maersk) कंपनी ने डीसीएम श्रीराम ग्रुप (DCM Shriram Group) को ऐसे ही 1,000 और मेड-इन-इंडिया कंटेनर बनाने का बड़ा ऑर्डर भी दे दिया है। यह एक ऐसी व्यावसायिक साझेदारी की शुरुआत है जो आने वाले समय में वैश्विक समुद्री व्यापार में भारत का कद बहुत ऊंचा कर देगी।
सिर्फ 16 महीनों में बदल गई तस्वीर: दूरदर्शी सोच से जमीन पर काम
इस बड़ी उपलब्धि के पीछे एक दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी है। फरवरी 2025 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ए.पी. मोलर-मर्श के सुपरवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन रॉबर्ट मर्श उग्ला से हुई थी। उस बैठक में प्रधानमंत्री ने मर्श कंपनी को भारत में विश्व स्तरीय कंटेनर निर्माण उद्योग विकसित करने में सहयोग देने के लिए प्रेरित किया था।
आमतौर पर ऐसी बड़ी परियोजनाओं को जमीन पर उतरने में सालों लग जाते हैं, लेकिन सरकार और उद्योग जगत की मुस्तैदी का नतीजा देखिए कि सिर्फ 16 महीनों के भीतर, भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑर्डर किए गए अपने पहले घरेलू EXIM शिपिंग कंटेनर को तैयार करके रोलआउट भी कर दिया। यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि आज का भारत सिर्फ नीतियां और योजनाएं ही नहीं बनाता, बल्कि उन्हें तय समय के भीतर पूरा करना भी जानता है।
कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने गर्व से कहा:
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत तेजी से एक भरोसेमंद वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और मैरीटाइम पावरहाउस (समुद्री महाशक्ति) के रूप में उभर रहा है। दुनिया की अग्रणी शिपिंग लाइन के लिए भारत में बने पहले EXIM कंटेनर का अनावरण आत्मनिर्भर भारत की हमारी यात्रा का एक बड़ा पड़ाव है। यह दिखाता है कि वैश्विक उद्योगों का भरोसा अब भारतीय विनिर्माण क्षमताओं पर कितना मजबूत हो चुका है।”
अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा: पूरी तरह सुरक्षित और टिकाऊ
आम जनता के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भारत में बना यह पहला कंटेनर दुनिया के समंदरों में चलने वाले विशाल जहाजों पर टिक पाएगा? इसका जवाब है- बिल्कुल हां!
इस पहले स्वदेशी कंटेनर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सभी कड़े गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के आधार पर बनाया गया है। इसमें ISO (इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर स्टैंडर्डाइजेशन) के विशिष्ट नियमों और ‘इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर सेफ कंटेनर्स’ (CSC) की गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन किया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह कंटेनर दुनिया के किसी भी कोने में, किसी भी मौसम और समुद्री परिस्थिति में माल ले जाने के लिए पूरी तरह से फिट और सुरक्षित है।
इतिहास की नजर से: हम कहां थे और आज कहां पहुंच गए (तुलनात्मक विश्लेषण)
शिपिंग कंटेनर के क्षेत्र में भारत के इस कदम को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों पर नजर डालनी होगी।
1. चीन का एकछत्र राज बनाम भारत की नई चुनौती
अब तक दुनिया के लगभग 90% से अधिक शिपिंग कंटेनरों का निर्माण अकेले चीन में होता आया है। भारत अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था और विशाल व्यापार के बावजूद, अपने निर्यात और आयात के लिए पूरी तरह से विदेशी कंपनियों और मुख्यतः चीन में बने कंटेनरों पर निर्भर था। वित्तीय वर्ष 2024 तक भारत का अधिकतम घरेलू कंटेनर उत्पादन मात्र 24,000 TEUs (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स – कंटेनर मापने की इकाई) के आसपास ही सिमटा हुआ था। आज का यह कदम चीन के इसी एकछत्र राज को सीधी चुनौती है।
2. वैश्विक संकटों से सबक
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कोरोना महामारी, स्वेज नहर में जहाजों का फंसना और लाल सागर (Red Sea) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव और संकटों को देखा है। इन संकटों की वजह से अचानक दुनिया भर में कंटेनरों की भारी किल्लत हो गई और माल ढुलाई (फ्रेट चार्ज) की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। भारतीय व्यापारियों को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि हमारे पास अपने कंटेनर नहीं थे।
3. वर्तमान बदलाव और भविष्य का लक्ष्य
पहले जहां भारत पूरी तरह से आयातक (मंगाने वाला) था, वहीं अब वह निर्माता बनने की ओर बढ़ चुका है। सरकार की नई नीतियों के बाद, भारत का लक्ष्य अपनी उत्पादन क्षमता को सीधे 10 गुना बढ़ाकर 7.5 लाख TEUs सालाना करने का है। यानी जो देश कल तक खाली कंटेनरों के लिए दूसरों का मुंह ताकता था, वह अब दुनिया को कंटेनर बेचने की तैयारी कर रहा है।
₹10,000 करोड़ की ‘CMPS’ योजना: घरेलू विनिर्माण को संजीवनी
इस घरेलू बदलाव को गति देने के लिए मोदी सरकार ने केंद्रीय बजट 2026 में ₹10,000 करोड़ के भारी-भरकम बजट के साथ कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग Promotion Scheme (CMPS) की घोषणा की है। इस योजना को बहुत ही सूझबूझ से तीन मुख्य हिस्सों में बांटा गया है ताकि भारतीय कंपनियों को हर स्तर पर मदद मिल सके:
- कैपेक्स सपोर्ट (Capex Support): इसके तहत नए कंटेनर कारखाने (ग्रीनफील्ड सुविधाएं) लगाने या पुराने कारखानों (ब्राउनफील्ड सुविधाओं) को बड़ा बनाने के लिए सरकार की तरफ से पूंजीगत या आर्थिक सहायता दी जाएगी।
- ओपेक्स सपोर्ट (Opex Support): शुरुआत में भारत में कंटेनर बनाने की लागत विदेशों (जैसे चीन) की तुलना में थोड़ी ज्यादा हो सकती है। इस अंतर को पाटने और भारतीय कंटेनरों को वैश्विक बाजार में सस्ता व प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार कंपनियों को परिचालन सहायता देगी।
- आरएंडडी (R&D) और स्किलिंग: सिर्फ नकल नहीं, बल्कि बेहतरीन तकनीक विकसित करने के लिए अनुसंधान (Research), क्वालिटी टेस्टिंग, कामगारों के कौशल विकास (Skill Development) और क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
इस योजना के बारे में समझाते हुए मंत्री सोनोवाल ने कहा कि इससे न केवल हमारी सप्लाई चेन मजबूत होगी, बल्कि देश में हजारों नए रोजगार पैदा होंगे, तकनीक का ट्रांसफर होगा और भारत उच्च गुणवत्ता वाले कंटेनरों का एक ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बन जाएगा।
नए कानून और डिजिटल सुधार: व्यापार करना हुआ बेहद आसान
पिछले कुछ समय में सरकार ने केवल कारखानों पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि बंदरगाहों और समुद्री कानूनों के पुराने और पेचीदा जाल को भी पूरी तरह से बदल दिया है। इसके तहत कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं:
प्रमुख कानूनी और नीतिगत सुधार
- ऐतिहासिक नए कानून: समुद्री व्यापार को आधुनिक और पारदर्शी बनाने के लिए मर्चेंट शिपिंग एक्ट 2025, कोस्टल शिपिंग एक्ट 2025 और इंडियन पोर्ट्स एक्ट 2025 जैसे युगांतरकारी कानून लागू किए गए हैं।
- शिपबिल्डिंग असिस्टेंस: भारत में ही बड़े-बड़े मालवाहक जहाज बनाने के लिए ₹70,000 करोड़ के ‘शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस पैकेज’ को मंजूरी दी गई है।
- भारत कंटेनर शिपिंग लाइन (BCSL): भारत ने खुद की अपनी राष्ट्रीय कंटेनर शिपिंग लाइन ‘भारत कंटेनर शिपिंग लाइन’ स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, जिससे विदेशी जहाजों पर हमारी निर्भरता खत्म हो सके।
- डिजिटल क्रांति: बंदरगाहों पर कागजी कार्रवाई और देरी को खत्म करने के लिए ‘वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस’ (ONOP), ‘मैरीटाइम सिंगल विंडो’ और ‘ई-समुद्र’ (e-Samudra) जैसे डिजिटल सिस्टम शुरू किए गए हैं, जिससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (व्यापार की सुगमता) में भारी सुधार हुआ है।
वैश्विक मंच पर चमकता भारत का समुद्री बुनियादी ढांचा (Infrastructure)
भारत की यह तरक्की वैश्विक आंकड़ों में भी साफ दिखाई दे रही है। ‘कंटेनर पोर्ट परफॉर्मेंस इंडेक्स 2025’ के अनुसार, भारत के तीन प्रमुख बंदरगाह अब दुनिया के टॉप 30 सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले बंदरगाहों में शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा, देश में कई मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर बहुत तेजी से काम चल रहा है जो भविष्य में भारत की तस्वीर बदल देंगे:
- वाधवान पोर्ट (Vadhavan Port): महाराष्ट्र में बन रहा यह बंदरगाह भारत के सबसे बड़े और आधुनिक डीप-ड्राफ्ट बंदरगाहों में से एक होगा।
- गैलाथिया बे (Galathea Bay) इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित यह रणनीतिक बंदरगाह वैश्विक व्यापार मार्गों के बिल्कुल करीब है और यह अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए एक बड़ा केंद्र बनेगा।
- टुना टेकरा कंटेनर टर्मिनल और आउटर हार्बर कंटेनर टर्मिनल: ये टर्मिनल भी देश की कार्गो संभालने की क्षमता को कई गुना बढ़ा रहे हैं।
- शिप रीसाइक्लिंग में नंबर 1: भारत आज की तारीख में दुनिया का सबसे बड़ा जहाज रीसाइक्लिंग (पुराने जहाजों को तोड़कर उनका लोहा व अन्य सामान दोबारा इस्तेमाल करने वाला) देश बन चुका है।
एक ऐतिहासिक समारोह के गवाह बने कई दिग्गज
दादरी में आयोजित इस भव्य समारोह में केवल भारतीय नेता ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनयिक और उद्योग जगत के बड़े चेहरे भी शामिल हुए। कार्यक्रम में नीदरलैंड्स की राजदूत महामहिम मारिसा जेरार्ड्स, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल, मर्श कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर थॉमस थ्यूवेस, मर्श के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अहमद हसन सहित पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। साथ ही कॉनकॉर (CONCOR), डीसीएम श्रीराम ग्रुप और समुद्री उद्योग से जुड़े तमाम हितधारकों ने इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनकर भारत के नए आत्मनिर्भर भविष्य का स्वागत किया।
चलते-चलते यह साफ कहा जा सकता है कि दादरी से निकला यह पहला भारतीय कंटेनर सिर्फ सामान लेकर विदेश नहीं जा रहा है, बल्कि यह वैश्विक समुद्र के सीने पर उभरते हुए शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत की एक नई पहचान को दर्ज कराने जा रहा है।



